पुंसवन कर्म – मन माफिक पुत्र या पुत्री की प्राप्ति

पुंसवन कर्म 

” गर्भाद भवेच्च पुन्सुते पुन्स्त्वस्य प्रतिपादनम “
अर्थात स्त्री गर्भ से पुत्र प्राप्ति हो इसलिए पुंसवन संस्कार किया जाता है |
” पुमान् सूयते अनेन इति पुन्सवनम “

अर्थात जिस कर्म के द्वारा गर्भ में ही स्त्री लिंग का परिवर्तन कर पुरुष लिंग या पुलिंग को परिवर्तित कर स्त्री लिंग उत्पन्न किया जाता है उसे ही पुंसवन कर्म कहते है |
हमारे सनातन धर्म ग्रंथो में 16 संस्कार बताये गए है जिसमे से पुंसवन कर्म दूसरा संस्कार है | ये 16 संस्कार निम्न है 

पुंसवन कर्म का मुख्या उद्देश्य गर्भस्थ शिशु का सम्पूर्ण और  समुचित विकास है | पुंसवन कर्म से गर्भ में स्थित कन्या या बालक का लिंग परिवर्तित कर सकते है | पुंसवन कर्म हमेशा गर्भ में लिंग भेद प्रकट होने से पूर्व करना चाहिए | सामान्यतया गर्भ ठहरने के दुसरे महीने में लिंग भेद प्रकट होने लगता है | इसलिए पुंसवन कर्म हमेशा दुसरे महीने में करना चाहिए क्योकि तीसरे महीने से गर्भ में अंग – प्रत्यंग बनने शुरू हो जाते है |

पुंसवन कर्म की अवधि 

  • गर्भ के दुसरे महीने से पुंसवन कर्म करना चाहिए |
  • पुष्य नक्षत्र में पुंसवन कर्म करना चाहिए |
  • लगातार 12 रात्रि तक पुंसवन कर्म किया जा सकता है |
  • समतिथिया या युग्मतिथियाँ  अर्थात 2 – 4 – 6 -8 आदि में पुंसवन कर्म शुरू करना चाहिए |
  • इसके बाद प्रतिदी 2 महीने तक कर सकते है |

पुंसवन कर्म की विधि या तरीका 

  • सुश्रुत संहिता के अनुसार जब स्त्री का गर्भ 2 महीने का हो उस समय स्त्री को लक्ष्मणा, वट सुंग ( वट की कोमल पती), सहदेवी , विश्वदेवा आदि औषधियों में से किसी एक औषधि को गोदुग्ध के साथ महीन पीसकर दो या तीन बूंद की मात्रा में अगर पुत्ररत्न की इच्छा हो तो गर्भिणी के दाहिने नथुने में छोड़ दे | स्त्री को चाहिए की वह इस औषधि को थूके न |
  • पुष्य नक्षत्र में श्वेत वृहती की जड़ को गर्भिणी स्त्री स्वंय पिसकर अपनी नाक में डालना चाहिए | अगर पुत्र की इच्छा है तो दाहिने नासा छिद्र में और अगर पुत्री की इच्छा है तो बांये नासा छिद्र में डालना चाहिए |
  • गर्भिणी स्त्री को पुष्य नक्षत्र में अपामार्ग, जीवक, ऋश्भाक इनमे से किसी एक को पीसकर पीना चाहिए | 
  • वट वृक्ष के 2 अंकुर को लेकर 2 ब्रिही माष(मुंग की दाल) और 2 सफ़ेद सरसों को दही में मिला कर पुष्य नक्षत्र में पीना चाहिए |

इसके अलावा माता को आत्मिक रूप से सबल बनाना चाहिए | स्त्री को अपनी इच्छा अनुसार पुत्रभाव या पुत्री भाव को अपने मन में आत्मसात करना चाहिए | क्योकि इससे स्त्री के मन में बार – बार सोचने से और वह भाव गृहण करने से निश्चित ही भावानुसार संतान की प्राप्ति होती है |

अगर पूत्र की इच्छा हो तो निम्न लिखित मंत्र का जाप करवाए –

पुमानग्निः पुमानिन्द्रः पुमान् देवो बृहस्पतिः।
पुमांसं पुत्रं विन्दस्व तं पुमान्नु जायताम्।।

इसका अर्थ है कि अग्निदेवता पुरुष है , इन्द्र भी पुरुष है , गुरु ब्रहस्पति भी पुरुष है  तुजे भी पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी |

पुंसवन कर्म का उद्देश्य 

पुंसवन कर्म का मुख्या उद्देश्य शिशु के विकास और वर्द्धि में सहायता करना है | यह एक कर्म है जिसे हमें अवश्य ही करना चाहिए | यथा इच्छा पुत्र या पुत्री की प्राप्ति के लिए पुंसवन कर्म जरुरी है |
धन्यवाद
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