इरिमेदादि तेल / Irimedadi Oil in Hindi

इरिमेदादि तेल / Irimedadi Oil : – दांतों के रोगों के लिए यह बहुत ही विश्वनीय आयुर्वेदिक तेल है | इसका कुल्ला आदि करने से मसूडों की मवाद, पीव, सडन, दांतों में कीड़े की समस्या एवं जीभ की पीड़ा आदि रोग शांत होते है |

इरिमेदादि तेल

यह मुख रोगों की बहुत ही कारगर दवा है | इरिमेदादि तेल का वर्णन विभिन्न आयुर्वेदिक ग्रंथो में प्राप्त होता है | शार्गंधर संहिता के अनुसार इसका निर्माण किया जाता है | इस तेल का गंडूष धारण करने का विधान है |

अर्थात इरिमेदादि तेल का कुल्ला करने से मुंख पाक, दांतों एवं मसूड़ों के रोग, मुंह के छाले, मवाद, मुंह की दुर्गन्ध आदि समस्याओं में आराम मिलता है |

आयुर्वेद के विभिन्न आचार्यों ने तेल का गंडूष धारण करने को मुंह के रोगों के लिए अति उत्तम बताया है | इस तेल में प्रयोग होने वाली सभी जड़ी – बूटियां वर्णरोपक, व्रणशोधन, सुजाक को ख़त्म करने वाली एवं दांतों और मसूड़ों को मजबूती प्रदान करने वाली होती है |

अत: इन रोगों में इरिमेदादि तेल का प्रयोग विशिष्ट लाभ देता है |

अब चलिए जानते है इरिमेदादि तेल के घटक द्रव्य एवं बनाने की विधि के बारे में

इरिमेदादि तेल के घटक / Ingredients of Irimedadi Oil

  • इरिमेद छाल
  • लौंग
  • गेरू
  • अगर
  • पद्म्काष्ठ
  • मंजिष्ठ
  • लोध्र
  • मुलेठी
  • लाख
  • बड की छाल
  • नागरमोथा
  • नागकेशर
  • कायफल
  • दालचीनी
  • कपूर
  • शीतल चीनी
  • खादिर्काष्ठ
  • धाय के फुल
  • छोटी इलायची
  • जायफल
  • तिल तेल
  • जल

कैसे बनता है इरिमेदादि तेल / Manufacturing Process

इरिमेदादि तेल बनाने की विधि जानने से पहले ये जानलें कि यह विधि भले ही सरल एवं सीधी लगे लेकिन फिर भी कुछ न कुछ दोष रह जाते है अत: घर पर तैयार करने के लिए किसी योग्य वैद्य या फार्मासिस्ट की सहायता लेना उचित रहता है |

दूसरा बाजार में यह बना बनाया आसानी से उपलब्ध हो जाता है | विभिन्न फार्मेसी जैसे पतंजलि इरिमेदादि तेल, बैद्यनाथ इरिमेदादि तेल, डाबर, धन्वंतरी आदि का बना बनाया मिल जाता है |

चलिए अब जानते है कि यह कैसे बनता है ?

सबसे पहले इरिमेद छाल 5 किलो लेकर इसको हल्का दरदरा कूट कर यवकूट कर लिया जाता है | अब लगभग 25 लीटर जल में मन्दाग्नि पर इसका क्वाथ बनाया जाता है | जब जल आठवां हिस्सा बचता है तव इसे छान कर अलग रख लिया जाता है |

अब बाकि बची सभी जड़ी-बूटियों को (सिर्फ कपूर को छोड़कर) कल्क रूप में तैयार किया जाता है | अब कडाही में 1.5 लीटर तिल तेल लेकर मंद आंच पर गरम किया जाता है एवं साथ ही औषधियों का तैयार कलक डालकर तेल पाक विधि से पाक किया जाता है |

अच्छी तरह पाक होने के पश्चात इसे आंच से उतार कर ठंडा कर लिया जाता है एवं कपूर को डालकर सहेज लिया जाता है |

इस प्रकार इरिमेदादि तेल का निर्माण होता है |

इरिमेदादि तेल के फायदे / Uses & Benefits of Irimedadi Oil

  • इसका उपयोग गंदुष धारण करने अर्थात मुंह में कुच्छ समय के लिए तेल को धारण करके कुल्ला करना की तरह किया जाता है |
  • इसका मुंह में फाह रखने का विधान भी है |
  • साथ ही इस तेल की मालिश का वर्णन भी प्राप्त होता है |
  • इसे दांतों की समस्याओं के लिए उत्तम तेल माना जाता है |
  • दांतों में कीड़े लगे हो तो इरिमेदादि तेल का फोहा भरकर उस दांत पर रखना चाहिए | कीड़ो की समस्या से आराम मिलता है |
  • अगर मसूड़े कमजोर या घाव आदि है तो इसका कुल्ला करवाना चाहिए | फायदा मिलता है |
  • दांत हिलते हो तो भी इरिमेदादि तेल का गंडूष या कुल्ला करवाना फायदेमंद रहता है |
  • अगर आपके दांत कड़कते है तो इरिमेदादि तेल की मालिश दांतों पर करनी चाहिए |
  • मुंह की बदबू से परेशान है तो इसका नियमित कुच्छ समय के लिए उपयोग करें | लाभ मिलेगा |
  • दांतों से पीब पड़ती हो तो भी यह तेल काफी फायदेमंद साबित होता है | उपयोग के लिए इसकी मालिश मसूड़ों पर करनी चाहिए |
  • तेल से गंडूष करने सभी प्रकार के मुख रोगों में लाभ मिलता है |

इरिमेदादि तेल की प्रयोग विधि / How to Use

इस तैल का गन्डूष धारण करने एवं मुंह में फोहा रखने के रूप में मुख्यत: प्रयोग होता है | मालिश के लिए भी तेल का यथायोग्य व्यवहार किया जाता है |

सावधानियां / Precautions

इस तेल के कोई साइड इफेक्ट्स नहीं है | लेकिन इसका गंडूष धारण करते समय या मुंह में फोहा रखते समय सावधानी रखनी चाहिए कि तेल निगलना नहीं है |

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धन्यवाद ||

Ref : शा. संहिता, भैषज्य रत्नावली, आयुर्वेद सार-संग्रह

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