वरुण (Varun) का पौधा या वरुण छाल के फायदे

वरुणादि क्वाथ के बारे में तो अधिकतर आयुर्वेद प्रेमियों ने सुना होगा | दर:शल वरुणादि क्वाथ मूत्र संसथान के विकारों में विशेष लाभकारी आयुर्वेदिक दवा है | पत्थरी, प्रोस्टेट एवं मूत्र विकारों में प्रमुखता से प्रयोग की जाने वाली औषधि है |

वरुण का पौधा इस औषधि का मूल द्रव्य है अर्थात वरुण या जिसे वरना भी कहा जाता है | आज इसी औषधीय वनस्पति के बारे में हम बात करेंगे | तो चलिए आपको बताते है वरुण के बारे में आयुर्वेदिक विवरण

वानस्पतिक परिचय / Botanical Introduction of Varuna

हिंदी – वरुण, वरना

संस्कृत – वरुण, त्रिपर्ण, तिक्तशाक, बिल्वपत्र, बहुपुष्प, भ्रमरप्रिय, अश्मरीघन, वृंतफल |

मराठी – वायवरना

English – Three Leaved Caper

लैटिन – Cretaeva Nurvala Buch.

Family – Capparidaceae

इसे गुल्म आदि रोगों का नाश करने के लिए इस्तेमाल की जाती है इसलिए इसे वरुण कहते है | आयुर्वेदिक चरक संहिता में वरुण का उल्लेख “दशेमानी” में नहीं किया गया है | लेकिन सुश्रुत संहिता में ‘वरुणादिगण’ में अश्मरी और मूत्रकृछ की चिकित्सा के अंतर्गत वरुण का उल्लेख मिलता है |

वानस्पतिक वर्णन – वरुण का पौधा सम्पूर्ण भारतवर्ष में मिल जाता है | यह अधिक जलीय स्थानों पर अधिक होता है | इसका पौधा 25 से 30 फीट तक मध्यम आकार का होता है | पौधे की त्वचा धूसर रंग की एवं शाखाओं का रंग सफ़ेद चिन्ह युक्त होता है |

वरुण के पते बिल्व के पतों की तरह ही होते है | इसके पतों को मसलने पर एक तीव्र प्रकार की गंध आती है |

पुष्प पीले रंग के सुगन्धित एवं गुछाकर मंजरियो में लगते है |

वरुण के फल कागजी निम्बू के समान गोलाकार, पकने पर लालरंग का होता है उसकी फलमज्जा पीले रंग की, जिसमे कई बीज होते है |

वरुण का पुष्पकाल फरवरी एवं मार्च में और फल अगस्त माह में लगते है |

वरुण के औषधीय गुण धर्म

वरुण: पित्तलो भेदीश्लेष्मकृच्छशममारुतान ||

निहन्ति गुल्मवातास्त्रकृमिश्चोश्नोअग्निदीपन: |

कषायो मधुरस्तिक्त: कटुको रुक्ष्को लघु: ||

भा. नि. वटादिवर्ग

रस – तिक्त, कषाय, मधुर

गुण – लघु, रुक्ष

विपाक – कटु

वीर्य – उष्ण

प्रभाव – अश्मरीहर

दोषकर्म – कफ एवं वातशामक, पित्तवर्द्धक

वरुण के फायदे या स्वास्थ्य लाभ / Health Benefits of Varuna in Hindi

  • गुल्म रोग में यह दीपन, अनुलोमन एवं भेदन, कृमिघन होने से अग्निमंध्य, गुल्म एवं यकृतविकार में प्रयोग करते है |
  • अश्मरी अर्थात पत्थरी में मूत्रल एवं भेदन गुणों के कारण वरुण काफी लाभदायक सिद्ध होता है | साथ ही मूत्रल होने के कारण पेशाब की रूकावट में भी फायदा देता है |
  • नेत्र रोगों में इसकी छाल को पीसकर आँखों के बहार लेप करने से लाभ मिलता है |
  • रक्तविकार – तिक्त रक्त से रक्तशोधन गुणों से युक्त होती है | यह वातरक्त, गण्डमाला आदि रोगोंफ़ में इसकी छाल का क्वाथ बना कर सेवन करवाने से लाभ मिलता है |
  • मोटापे में भी यह फायदेमंद है | यह मेदक्षरण का कार्य करती है |
  • वरुण के पतों का क्वाथ बना कर बवासीर के रोगी को अवगाहन करवाना चाहिए |
  • गण्डमाला में इसकी जड़ के क्वाथ में शहद मिलकर सेवन करवाना फायदेमंद रहता है |
  • प्रोस्टेट (BPH) की समस्या में वरुण क्वाथ के साथ गोखरू चूर्ण का सेवन करवाने से लाभ मिलता है |
  • वरुण की छाल का चूर्ण वरुनादी क्वाथ के साथ प्रयोग करवाने से पत्थरी मिटती है |

प्रयोज्य अंग और मात्रा

वरुण की जड़, छाल एवं पतों का प्रयोग औषध उपयोग में लिया जाता है | सेवन के रूप में इसके चूर्ण को 1 से 2 ग्राम, क्वाथ 50 से 100 मिली तक किया जा सकता है |

इसके योग से बनने वाली विशिष्ट आयुर्वेदिक औषधियां

वरुणादि क्वाथ, वरुणादि घृत, वरुणादि तेल आदि |

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धन्यवाद ||

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