अश्वगंधा का सम्पूर्ण परिचय , गुण , लाभ एवं सेवन से होने वाले फायदे

Post Contents

अश्वगंधा / Withania Somonifera

परिचय :
भारत के समशीतोष्ण क्षेत्रों में अश्वगंधा के अधिकतर क्षुप पाए जाते है | भारत के राजस्थान , हरियाणा , मध्यप्रदेश , पंजाब और हिमाचल प्रदेश में अश्वगंधा का अधिकतर उत्पादन होता है , इन राज्यों में भी राजस्थान में सबसे अधिक अश्वगंधा पाया जाता है | देश में अश्वगंधा की मांग अधिकतर राजस्थान और मध्यप्रदेश ही पूरी करते है | अश्वगंधा का क्षुप 4 फीट तक  ऊँचा हो सकता है , जिसका तना स्वेताभ वृण का होता है | अश्वगंधा की पतियाँ गोलाईदार, रोमयुक्त सफ़ेद रोएँ  लिए हुए होती है | अश्वगंधा के पुष्प पत्र वृंत  के कोण में छोटे – छोटे गुच्छो में लगते है | इसके फल छोटे हरे , पीले और पकने पर लाल रंग के हो जाते है , फलो की आकृति मकोय के सामान पतली और चने के खोल के समान होती है |
अश्वगंधा के फायदे
आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में प्राचीन समय से ही अश्वगंधा का प्रयोग किया जाता रहा है | शारीरिक कमजोरी , यौन दुर्बलता , गठिया , गलगंड , स्त्री रोग और हृदय दौर्बल्य आदि रोगों में अश्वगंधा का व्यापक  रूप में प्रयोग किया जाता है | स्त्रियों में अश्वगंधा के सेवन से  स्तनपान के समय दूध को बढाता है | सूतिका रोगों में भी इसका इस्तेमाल फायदेमंद होता है | अश्वगंधा के सेवन से महिलाओ में हार्मोन संतुलित होते है | प्रसव के बाद महिलाओ में शारीरिक कमजोरी आ जाती है इसके सेवन से शरीर में स्फूर्ति और ताकत आती है |

अश्वगंधा का रासायनिक संगठन 

इसकी जड़ में एक उड़नशील तेल और वसा पायी जाती है  | इसके अलावा बिथेनिओल , शर्करा , राल , सोम्मिफेरिन नामक क्रिस्तेलाईन तत्व और फाईटोस्टेरोल तत्व भी पाए जाते है |

अश्वगंधा के गुण – धर्म और रोग्प्रभाव 

इसका रस कषाय, तिक्त और मधुर होता है | इसके  गुण लघु और स्निग्ध होते है | इसका वीर्य उष्ण और विपाक मधुर होता है | अश्वगंधा वात एवं कफ शामक होती है | यह बल्य , रसायन , बजिकारक, नाड़ी शक्ति वर्धक औषधि है | इसका रोग प्रभाव मांसक्षय , शोष , वातव्याधियों , शुक्रक्षय , शोथ , हृदयदौर्बल्य , अनिद्रा ,  गलगंड एवं अपच  जैसे रोगों में प्रयोग किया जाता है  |

अश्वगंधा के प्रयोज्य अंग और सेवन मात्रा 

इसके मूल का प्रयोग आयुर्वेद में किया जाता है | इसके चूर्ण का सेवन 3 से 6 ग्राम की मात्रा में करना चाहिए |

अश्वगंधा के विशिष्ट योग 

इससे आयुर्वेद में अश्वगंधा चूर्ण , अश्वगंधारिष्ट , अश्वगंधा गुगुलू , कामदेव घृत, अश्वगंधाव्लेह , सुकुमारघृत , महारासंडी योग और शौभाग्यसुठीपाक आदि का निर्माण किया जाता है |

विभिन्न भाषाओँ में अश्वगंधा के पर्याय 

संस्कृत – अश्वगंधा , वाराहकरणी,  कुष्ठगंधिनी |
हिंदी – असगंध , नागौरी असगंध |
बंगाली – अश्वगंधा |
मराठी – आसगंध, ढोरगूंज |
गुजराती – आसंध , घोडाआसंध |
तेलगु – अश्वगंधी, डोमडोलू |
मलयालम – अमुक्किरम |
कन्नड़ – अमुगुरे , अश्वगंधा |
पंजाबी – असगंधना गौरी
लेटिन – Withania Somonifera |

अश्वगंधा के फायदे एवं औषधीय प्रयोग 

गर्भावस्था के बाद अश्वगंधा सेवन के फायदे 

गर्भावस्था के बाद  महिलाओ में अश्वगंधा का सेवन फायदेमंद होता है | प्रसवोतर  काल में महिलाओ को अश्वगंधा सेवन की सलाह दी जाती है क्योकि यह उत्तम गर्भस्य शोधक होता है | जिन महिलाओ के स्तनों में दूध की कमी है उनको भी अश्वगंधा के सेवन से फायदा होता है | इसके सेवन से  सेवन से महिलाओ की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती  है और वे स्वास्थ रहती है |

उम्र को बढ़ने से रोकती है अश्वगंधा 

बढती हुई उम्र को रोकने के लिए भी अश्वगंधा उपयोगी है | इसके सेवन से उम्र बढ़ने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है क्योकि यह एंटी एजिंग है और इसके तत्व उत्तको के पुन: निर्माण में सहयोग करते है इसलिए जो व्यक्ति अश्वगंधा का सेवन करते है उनकी उम्र ठहरी से प्रतीत होती है |

शारीरिक कमजोरी में अश्वगंधा के फायदे 

कमजोर युवाओ के लिए अश्वगंधा एक अमृत टॉनिक है | जिन युवाओ की शारीरिक क्षमता कमजोर है उन्हें इसका इस्तेमाल करना चाहिए  | कृष शरीर वाले और  दुबले पतले व्यक्ति इससे मजबूत शरीर प्राप्त कर सकते है | 5 ग्राम अश्वगंधा चूर्ण को रोज  रात को सोते समय हल्के गरम दूध के साथ महीने भर तक इस्तेमाल कर के आप बेहतर शरीर पा सकते है |

गठिया रोग में अश्वगंधा के फायदे 

गठिया रोगियों के लिए भी यह एक उत्तम आयुर्वेदिक  औषधि है | एक शोध के अनुसार इसका सेवन गठिया रोग में राहत देता है क्योकि वात व्याधियो में अश्वगंधा बेहतर परिणाम देता है |
➤संधिवात में अश्वगंधा के 30 ग्राम ताजा पतों को 250 ml पानी में उबाले जब पानी आधा रह जाए तब इसका सेवन सप्ताह भर के लिए गठिया से दुखते जॉइंट्स ठीक हो जायेंगे |
➤गठिया रोग में अश्वगंधा 3 ग्राम चूर्ण का रात्रि के समय दूध के साथ नियमित सेवन करने से गठिया रोग में लाभ मिलता है |

मानसिक शांति के लिए कर सकते है प्रयोग 

मानसिक शांति में भी अश्वगंधा उपयोगी है | इसके तत्व दिमाग को शांत करने की क्षमता रखते है | वस्तुत: अश्वगंधा में स्टेरॉयड होता है जो प्राकृतिक स्टेरॉयड है और इसके सेवन से मन और दिमाग के संतुलन में लाभ पहुँचता है |

सम्पूर्ण कायाकल्प के लिए करे अश्वगंधा की चाय का इस्तेमाल 

भारत में आज भी आदिवासी इलाको में अश्वगंधा की चाय बना कर पि जाती है | वैसे तो यह एक प्रकार का क्वाथ परिकल्पना ही कह सकते है लेकिन इसके स्वास्थ्य लाभों के देखते हुए इसे चमत्कारिक चाय कहना कोई अतियोक्ति नहीं होगी |

शीघ्रपतन और नपुंसकता में अश्वगंधा के फायदे 

शीघ्रपतन और नामर्दी वाले युवाओ के लिए अश्वगंधा एक अच्छी औषधि है | इसके सेवन से वीर्य की मात्रा में बढ़ोतरी होती है एवं शीघ्रपतन का रोग भी मिटता है |
➤शीघ्रपतन के लिए अश्वगंधा के 3 ग्राम चूर्ण में बराबर मात्रा में चीनी मिलाकर सुबह के समय गाय के दूध के साथ निरंतर एक महीने तक इस्तेमाल करे | शीघ्रपतन जड़ से ख़त्म हो जायेगा |
➤नपुंसकता में अश्वगंधा के चूर्ण को चमेली के तेल में गूँथ ले एवं इसका इस्तेमल अपनी इन्द्रिय पर लेप के रूप में करे | नपुंसकता जाती रहेगी |

फोड़े – फुंसियो में अश्वगंधा 

अश्वगंधा के हरे पतों को पिस कर चेहरे पर लगाने से फोड़े-  फुन्सिया नहीं होती | अगर शरीर पर कंही घाव है तो इसके पतों को शिला पर पिस ले और और लुग्दी को घाव पर बंधे जल्दी ही घाव भर जावेगा |

क्षय रोग में अश्वगंधा के फायदे 

क्षय रोग में अश्वगंधा का सेवन फायदेमंद होता है | जिनको क्षय (टी बी ) का रोग है वे इसका इस्तेमाल शहद के साथ करे | इसके सेवन से शरीर में आयरन की पूर्ति होती है जिससे क्षय रोगों और अस्थमा आदि रोगों में लाभ मिलता है |
➤अश्वगंधा के 2 ग्राम चूर्ण को अश्वगंधा के 20 ml काढ़े के साथ इस्तेमाल करने से टी.बी. में आराम मिलता है |
➤2 ग्राम अश्वगंधा का चूर्ण के साथ 1 ग्राम बड़ी पिप्पल का चूर्ण मिलाकर ,  5 ग्राम घी और 10 ग्राम शहद के साथ प्रयोग करे | ध्यान दे घी और शहद की मात्रा बराबर नहीं होनी चाहिए |

गर्भधारण में अश्वगंधा 

 
➤जिन महिलाओ का गर्भ न ठहर रहा हो या गर्भ न लग रहा हो वे अश्वगंधा के काढ़े में घी और दूध मिलाकर 7 दिन तक प्रयोग करने से निश्चित रूप से गर्भधारण हो जायेगा |
➤मासिक धर्म के शुरू होने से 4 दिन पहले से ही अश्वगंधा के 4 -5 ग्राम चूर्ण का इस्तेमाल करना शुरू कर देना चाहिए | इससे गर्भ ठहर जाएगा |
अश्वगंधा का 20 ग्राम चूर्ण , 250 ml दूध और 1 लीटर पानी इन सभी को मिलाकर हलकी आंच पर गरम करते रहे जब दूध शेष रहे अर्थात क्वाथ 250 ml बचे | तब आंच से उतार कर ठंडा करले और इसमें 6 ग्राम देशी गाय का घी और 6 ग्राम मिश्री मिलाकर सेवन करे | इसका प्रयोग मासिक धर्म के जाने के 3 बाद करे और लगातार 3 दिन तक सेवन करे |

कैंसर की सम्भावना को कम करता है अश्वगंधा 

अश्वगंधा का सेवन से कैंसर का खतरा कम हो जाता है | एक शोध अनुसार अश्वगंधा में कैंसर रोधी तत्व विद्यमान होते है जो शरीर को कैंसर से बचाते है |

प्रदर रोग में अश्वगंधा 

महिलाओ के प्रदर रोग में भी अश्वगंधा सेवन लाभ देता है | नित्य अश्वगंधा सेवन से इससे छुटकारा पाया जा सकता है | इसमें आप चूर्ण या अश्वगंधारिष्ट उपयोग में ले सकती  है | या इन नुस्खो को अपनाये
➤अश्वगंधा और शतावरी का बराबर मात्रा में सेवन करने से भी प्रदर रोग में फायदा मिलता है |
➤अश्वगंधा , विधारा और लोध्र  – इन तीनो को 25 ग्राम की बराबर मात्रा में लेकर कूट कर चूर्ण बनाले | इस चूर्ण में से 5 – 5 ग्राम की मात्रा में सुबह – शाम गाय के कच्चे दूध के साथ इस्तेमाल करे | जल्द ही प्रदर  रोग से छुटकारा मिलेगा |

स्तनों के आकार में वर्द्धि करता है अश्वगंधा 

➤अश्वगंधा , गजपीपल और वच को बराबर मात्रा में पीसकर चूर्ण बना ले | इस चूर्ण में मक्खन मिलाकर स्तनों पर लगाने से स्तन कठोर और बड़े बनते है |
➤अश्वगंधा और शतावरी के चूर्ण को 2 – 2 ग्राम की मात्रा में मिलाकर शहद के साथ सेवन करे और ऊपर से दूध पीले | इस तरह से प्रयोग करने से आपके स्तन आकर्षक और मजबूत बनते है |

योनी विकारों में अश्वगंधा 

योनी विकारो में अश्वगंधा की जड़ को दूध में अच्छी तरह पका ले | पकने के बाद ऊपर से दूध में देशी घी मिलाकर महिला को पिलाने से सभी प्रकार के योनी व्यापद में लाभ पंहुचता है |

वीर्य विकार में अश्वगंधा के फायदे 

➤कमजोर वीर्य के पुरुषों को अश्वगंधा 25 ग्राम विधारा – 25 ग्राम और शतावरी – 25 ग्राम इन सभी को मिलाकर चूर्ण बना ले | इस चूर्ण में 75 ग्राम चीनी मिलादे और सुबह शाम 5 ग्राम की मात्रा में दूध के साथ सेवन करे | वीर्य के सभी प्रकार के विकारों में लाभ मिलेगा |
➤नित्य 250 ml दूध में 20 ग्राम अश्वगंधा चूर्ण मिलाकर काढ़ा बनाले | इसका सेवन चीनी मिलाकर करे | 10 दिन के ही प्रयोग से वीर्यवान हो जायेंगे |
धन्यवाद |

Related Post

कस्तूरी / kasturi : शुद्ध कस्तूरी की पहचान , प्रका... कस्तूरी / kasturi कस्तूरी के बारे में सभी ने कुछ न कुछ जरुर सुना होता है | भारत में प्राचीन समय से ही कस्तूरी के उपयोगों का ज्ञान था | कस्तूरी ...
चित्रकादी वटी – उपयोग एवं बनाने की विधि |... ↢ चित्रकादी वटी ↣ चित्रकादी वटी में मुख्यातया 9 द्रव्य होते है | चित्रक की मूल ( जड़ ) , पिपरा मूल, जवाखार, सज्जिखर, नमक, त्रिकटु चूर्ण, भुनी हु...
बूढों को जवान करने वाला प्रयोग – जरुर आजमाए... बूढों को जवान करने वाला घरेलू नुस्खा  - जरुर आजमाए एक उम्र के बाद मनुष्य को बुढ़ापा घेर लेता है | शारीरिक क्षमता में कमी आना ही एक प्रकार से ब...
कब्ज-हर चूर्ण बनाने की विधि... कब्ज-हर चूर्ण  विधि - सोंठ - सौंफ - सनाय - छोटी हरेड और सेंधा नमक | इन सभी को बराबर की मात्रा में लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बनाले और किसी ...
Content Protection by DMCA.com

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.