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हींग का पेड़

असली हींग की पहचान या परिचय – औषधीय गुण एवं उपयोग

हींग के स्वाद एवं घरेलु मासले के रूप में प्रयोग की जानकारी सभी को है | लेकिन क्या आप जानते है, कि यह आयुर्वेद चिकित्सा में भी बहुत सी औषधियों के निर्माण में प्रमुखता से प्रयोग की जाती है ?

हींग का पेड़
file: commons.wikimedia.org

आयुर्वेद में चरक एवं शुश्रुत के समय से ही हींग के प्रयोगों एवं गुणों की जानकारी प्राप्त होती है | यह अफगानिस्तान, इरान, बलूचिस्तान, पंजाब एवं जम्मूकश्मीर में मुख्यत: पाई जाती है | आज से हजारों वर्ष पुराने आयुर्वेदिक ग्रन्थ चरक संहिता में इसे छेदनीय एवं दीपनीय द्रव्य माना है एवं आचार्य सुश्रुत ने शिरोविरेचन में हींगु का उल्लेख किया है |

हींग के पौधे का वानस्पतिक परिचय

इसका 5 से 8 फीट ऊँचा बहुवर्षायु क्षुप होता है जो देखने पर सौंफ के पौधे के समान प्रतीत होता है | हींग का काण्ड मृदु अर्थात कोमल एवं बहुत सी शाखाओं से युक्त होता है |क्षुप की जड़ रालीय एवं तीव्रगंधी होती है | इसके पत्र रोमश, संयुक्त रूप से लगे हुए, 2 से 4 पक्षयुक्त होते है | पत्रधार काण्ड से संसक्त रहते है |

सितम्बर से ओक्टुबर में पुष्पकाल होता है | पुष्प शाखाओं के अंत में लगते है , ये छोटे, पीले रंग के 1 सेमी. लम्बे होते है एवं गुच्छों में लगते है | पौधे पर अक्टूबर के बाद फल लगते है |

हींग कैसे निकाली (प्राप्त) जाती है ?

पौधे के तने एवं जड़ में चीरा लगाकर हींग निकाली जाती है | चार वर्ष का पौधा होने पर उसपर फुल आने से पहले मुल (जड़) के ऊपर से अर्थात शीर्ष भाग से ही पौधे को काट दिया जाता है | काटने के बाद पौधे अनंतर ढंक दिया जाता है | कटे हुए भाग में से निरंतर रस झरता रहता है | कुच्छ समय बाद इस भाग को थोड़ा और काट देतें है , जिससे निचले भाग में से रस झरने लगता है, उसे भी इक्कठा कर लिया जाता है |

पहली बार काटने के तीन महीने बाद दुसर बार काटा जाता | इस प्रकार से निर्यास अर्थात गोंद को इक्कठा कर लिया जाता है | यही निर्यास हींग कहलाता है | हींग के एक पौधे को तीन बार छेदन करके अधिक हींग प्राप्त की जाती है |

हींग के पर्याय एवं निरुक्ति

इसे विभिन्न नामों से जाना जाता है जो इसके विशिष्ट गुण भी दर्शाते है जैसे –

  1. हिंगु – अपनी गंधविशेष के कारण नासिका में प्रविष्ट कर जाता है | अत: इसे हिंगु भी कहा जाता है |
  2. रामठ – रमठ नामक उत्तरदेश में अधिक उत्पन्न होती है | मसाले के रूप में यह भोजन को रुचिकारक बना कर आहार में रूचि उत्पन्न करता है एवं अग्नि को बढाता है |
  3. वाह्यीक – वाह्यीक नामक देश में विशेष रूप से पैदा होने वाली |
  4. जतुक – रस या निर्यास रूप में प्रयोग किया जाता है |
  5. सहस्रवेधि – अपने अनेक गुणों के समुदाय को उत्पन्न करने का स्वाभाव होने के कारण कहा जाता है |

असली हींग की क्या पहचान है ?

विभिन्न स्थानों पर भिन्न प्रकार की हींग होती है अत: इनका निर्यास भी अलग – अलग प्रकार का होता है | वैसे दो प्रकार की हींग मुख्यत: प्रयोग में ली जाती है – दुधिया सफ़ेद हींग और दूसरी लाल हींग |

बाजार में आजकल मिलावट करके अधिक मुनाफा कमाने की होड़ लगी हुई है अत: हींग में मिलावट होना आम बात सी हो गई है | इसमें कंकड़, बालू मिटटी, बबूल का गोंद एवं गोदंती आदि मिली हुई या मिलाई जाती है |

पहचान का तरीका –

  • ग्राह्य हींग रूमीमस्तगी सामान रंग वाली होती है |
  • गरम घी में डालने पर लावा के सामान खील जाती है एवं लालिमा लिए हुए भूरे एवं बादामी रंग की होने पर अच्छी मानी जाती है |
  • स्वाद में कडवी होती है |
  • इसमें लहसुन के सामान गंध आती है |
  • जब जल में घोली जाती है तो सफ़ेद रंग की दिखाई पड़ती है |

असली हींग की पहचान या परीक्षा

  • जल के साथ मिलाने पर पीताभ दुधिया (सफ़ेद) द्रावण बनता है | अगर इसमें क्षार मिला दिया जाए तो यह हरिताभ पिली हो जाती है |
  • गंधक के एसिड के सम्पर्क में आने से हिंग का लाल रंग का मिश्रण भूरे रंग में बदल जाता है | इस मिश्रण को जल में साफ़ करने से बैंगनी रंग का हो जाता है |
  • तीसरी विधि के रूप में जब ताज़ी कटी हुई हींग के टुकड़ो पर नाइट्रिक एसिड डाला जाता है तो यह हरे रंग की हो जाती है |

हींग के औषधीय गुण

इसका रस कटु होता है एवं गुणों में यह लघु, स्निग्ध, तीक्षण एवं सर प्रकार की होती है | पचने के बाद हींग का विपाक भी कटु ही रहता है एवं तासीर अर्थात वीर्य में उष्ण या गरम प्रकृति की होती है | अपने इन्ही गुणों के कारण यह कफ एवं वात का शमन करती है एवं शरीर में पित्त की व्रद्धी करती है |

दीपन, पाचन, अनुलोमन, संज्ञास्थापन, दर्द का शमन, कीड़ों को नष्ट करने एवं कफ को निकाले के गुणों से युक्त होती है | यह पेट के सभी रोग, दर्द, गुल्म, गैस की समस्या, कीड़ों की समस्या एवं आफरे जैसे रोगों में उपयोगी औषधि है |

हींग के फायदे या स्वास्थ्य उपयोग

हिंग का पौधा
File source: https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Ferula_communis5.JPG

दीपन एवं पाचन के लिए

हींग के कटु रस होने एवं तासीर में गरम होने के कारण अग्निदीपन का कार्य करती है अर्थात यह भूख को बढाने वाली होती है | पाचन को सुधारने में भी यह फायदेमंद साबित होती है |

कृमि रोग में

तीक्षण गुण, उष्ण वीर्य एवं कटु स्वाभाव के कारण पेट के कीड़ों का शमन करती है | गुदा के कीड़ों एवं उदावृत में इसकी वर्ती बनाकर गुदा में रखी जाती है | हींग का प्रयोग बस्ती स्वरुप भी करते है जिससे मलाशय में उपस्थित कीड़े खत्म होते है |

संज्ञास्थापन में हींग के फायदे

भ्रम, प्रलाप, पागलपन, मिर्गी एवं स्मृतिभ्रंश (याददास्त) में हींग के इस्तेमाल से संज्ञा की उत्पति होती है | संज्ञा से तात्पर्य ज्ञान या स्मृति से है | हीगु तीक्षण एवं उष्णता के अपने गुणों के कारण कफ और तम का आवरण दूर करके संज्ञावह: एवं प्राणवः स्रोतस का शोधन करती है , जिससे प्राणवायु और उदानवायु का अनुलोमन होता है एवं संज्ञा की प्राप्ति होती है |

हींग के साथ शहद को मिलकर सेवन करवाने से लाभ मिलता है |

वातव्याधियों एवं आमवात

गठिया, लकवा एवं अपतंत्रक आदि में हींग फायदे मंद रहती है | यह उष्ण होने से उतेजक और दर्द को दूर करने वाले गुणों से परिपूर्ण होती है | शरीर में वायु के कारण अधिकतर दर्द होता है | यह शरीर में वात का शमन करती है |अजवायन के साथ हींग को मिलाकर सेवन करना वातशमनार्थ उपयोगी है |

श्वास एवं कास

यह अमाशयगत दोषों का शमन करती है तथा प्रणवह: स्रोतस के विबंध को नष्ट करती है | अत: विशेषकर वातज तमक श्वास में हींग का प्रयोग लाभदायक होता है |यह जमे हुए कफ को निकालती है | क्योंकि उष्णता एवं तीव्रगंधी होने के कारण उर:स्थ (सीने) जमे कफ का शमन करती है | बच्चों में खांसी होने पर सीने पर इसका लेप करना फायदेमंद होता है |

हृदय रोगों के शमनार्थ

विशेष रूप से वातज एवं कफज हृदय रोगों में यह उपयोगी है | हृदय के आयाम, स्तम्भन, शूल में घृत के साथ इसका उपयोग करना चाहिए | हृदय विकारों के कारण उत्पन्न पार्श्वशूल , स्तम्भन आदि में यह फायदा करती है |

गर्भाशय शोधन

उष्ण एवं तीक्षण गुण की होने के कारण यह महिलाओं के कष्टार्तव को ठीक करती है | मासिक धर्म के समय को ठीक करने एवं प्रसव के उपरांत गर्भास्य का शोधन करने के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है |

सेवन की मात्रा एवं विशिष्ट योग

हींग के चूर्ण को 125 मिलीग्राम से 500 मिलीग्राम तक सेवन किया जा सकता है | आयुर्वेद चिकित्सा में इसके उपयोग से हिंगूकर्पुरवटी, हिंग्वाष्टकचूर्ण, रज: प्रवर्तनी वटी, चित्रकादी वटी, शंखवटी एवं लाशुनादी वटी आदि का निर्माण किया जाता है |

धन्यवाद |

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1 comment

  1. bahut achha lekh, asli hing ki pehchan v iske upyog ke bare me padkar achhi jankari prapt hui
    Dhanyvad

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