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वत्सनाभ / मीठा तेलिया / Aconite – परिचय, गुण, फायदे एवं उपयोग

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वत्सनाभ / Monks’s Hood

आयुर्वेद में कुच्छ औषध द्रव्य विष वर्ग में आते है | उन्ही में से वत्सनाभ एक प्रमुख औषध द्रव्य है | यह अतिविषैला होता है, इसकी जड़, पते एवं फुल सभी में विष उपस्थित रहता है | फूलों को सूंघने से मूर्च्छा आने लगती है | अगर इस औषध द्रव्य का सेवन बिना शौधित किये कर लिया जाए तो व्यक्ति की मृत्यु हो सकती है |

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इमेज – wikimedia.commons

इतना जहरीला होने के पश्चात भी इसे व्यर्थ न समझना चाहिए | क्योंकि आयुर्वेद चिकित्सा में इसे शौधित करके विभिन्न रोगों जैसे – बुखार, सुजन, दर्द एवं प्रमेह आदि में प्रयोग करवाया जाता है | अगर शौधन करने के पश्चात वैद्य के अनुसार ग्रहण किया जाए तो अति लाभकारी सिद्ध होता है |

वानस्पतिक परिचय

भारत में उत्तरी पश्चिमी हिमालय में इसके 3 से 6 फीट ऊँचे पौधे पाए जाते है | भारत में लगभग 26 प्रकार के वत्सनाभ की प्रजातियाँ पाई जाती है | इनमे से कुछ विषैली एवं कुच्छ विषरहित होते है | इसके फुल 6 से 12 इंच लम्बे एवं रोमश होते है | फुल नीले रंग के आकर्षक दिखाई पड़ते है | वत्सनाभ के फूलों में भी विष होता है | अगर इसके फूलों को सूंघ लिया जाए तो व्यक्ति बेहोश हो सकता है |

वत्सनाभ के पत्र निर्गुन्डी के पतों के समान, 3 – 6 इंच लम्बे एवं अनेक भागों में विभक्त होते है | फल में 5 खंड होते है एवं पौधे के बीज काले रंग के होते है |

इसकी जड़ें आयुर्वेद में चिकित्सा के लिए प्रयोग की जाती है | जड़े 1 से 3 इंच लम्बी, 1 इंच मोटी और बाहर से धूसर रंग की एवं तोड़ने पर पीलापन लिए कुच्छ सफ़ेद दिखाई पड़ती है | बाजार में इसे काला रंग कर बेचा जाता है, ताकि कीड़ों से बचाया जा सके | जड़ों का संग्रह ग्रीष्म ऋतू में किया जाता है |

प्राचीन आचार्यों ने वत्सनाभ के बारे में कहा है कि –

सिन्दुवारसदृक्पत्रो वत्स्नाभ्याकृतिस्तथा |
यत्पार्शेव:न  तरोवृद्धि वत्सनाभ: स उच्यते ||

अर्थात जिसके पते निर्गुन्डी के समान हो एवं जड़ की आकृति बछड़े की नाभि के समान दिखाई दे | उसके आस – पास और कोई वृक्ष न उगता हो , उसे वत्सनाभ समझना चाहिए

वत्सनाभ के पर्याय एवं निरुक्ति

  • वत्सनाभ – बछड़े की नाभि के समान इसकी जड़ होने के कारण इसे वत्सनाभ पुकारा जाता है |
  • क्ष्वेड – मादक होने के कारण यह मोह पैदा करता है अत: संस्कृत में इसे क्ष्वेड भी पुकारा जाता है |
  • विष – पुरे शारीर में फैलने के कारण इसे विष कहा जाता है |
  • गरल – यह जीवन को नष्ट करने वाला होता है अत: इसे गरल भी कहा जाता है |
  • अंग्रेजी में वत्सनाभ को Monk’s Hood कहा जाता है |
  • लेटिन में यह Aconitum Ferox के नाम से जाना जाता है | यह Ranunculaceae फैमिली का पौधा है |
  • हिंदी में इसे मीठा तेलिया, मीठा विष एवं बछनाग आदि नामों से पुकारा जाता है |

वत्सनाभ के औषधीय गुण

यह रस में मधुर | गुणों में रुक्ष, तीक्षण, लघु, व्यवायी एवं विकासी होता है | विपाक में मधुर एवं उष्ण वीर्य का अर्थात तासीर में गरम प्रकृति का होता है | अपने इन्ही गुणों के कारण इसे कफ एवं वात शामक माना जाता है | अति अल्प मात्रा में शरीर को बलवान एवं मजबूत बनाने का कार्य करता है |

इसे रसायन कर्म, बल्य, दर्ददूर करने एवं स्वेदजनन (पसीना लाने) के लिए आयुर्वेद चिकित्सा में प्रयोग करवाया जाता है | यह विभिन्न रोगों जैसे – ज्वर, कुष्ठ, सुजन, प्लीहा की वृद्धि, पेट के रोग, कंठ के रोग, मधुमेह एवं सन्निपातिक बुखार में उपयोगी औषधि है |

वत्सनाभ के फायदे एवं उपयोग

इस औषध द्रव्य को विधिपूर्वक शौधित करके सेवन किया जाये तो यह अतिउपयोगी औषधि बन जाती है | शौधित वत्सनाभ विष को नष्ट करने वाला एवं वीर्य का वर्द्धन करने वाला होता है | अगर कोई व्यक्ति अशुद्ध वत्सनाभ का सेवन करले तो उसे तुरंत ही उपचार की जरूरत होती है | उसे उत्तेजक एवं वमनकारी औषधियों का सेवन करवाना चाहिए एवं तुरंत चिकित्सक से सम्पर्क करना चाहिए |

ज्वर में वच्छनाग के फायदे एवं उपयोग

यह स्वेदजनन गुणों से युक्त होता है अत: इसका सेवन आयुर्वेदिक चिकित्सक ज्वर में करते है | विशेषकर बुखार के साथ सुजन एवं वेदना (दर्द) हो या वातकफज ज्वर हो इनमे भी इसका सेवन फायदेमंद रहता है | जीर्ण ज्वर, श्रम, फिरंग तथा अति तीक्षण और उष्ण द्रव्यों के निरंतर सेवन से बढ़ी हुई हृदयगति को वत्सनाभ के सेवन से नियमित किया जा सकता है |

यह आमवात में, ज्वरावस्था में, रसगत और संधिगत आम एवं कफ के पाचन-विलयनार्थ पर्योग किया जाता है | इसका सेवन करने से जोड़ों की सुजन, दर्द एवं बुखार नष्ट होती है |

सुजन में वत्सनाभ के उपयोग

शुद्ध किया हुआ वत्सनाभ सम्पूर्ण शारीरिक अंगों की सुजन को दूर करता है | सुजन दूर करने के ये गुण इसमें अपने स्वेदजनन (कर्म), मूत्रल क्रिया (पेशाब लगाना) एवं नाड़ी की तीव्र गति को कमजोर करने के कारण होते है |

इन्ही गुणों के कारण यह गले की सुजन, गलसुंडीका एवं कंठ के रोगों में बेहद लाभदायी सिद्ध होता है | यह हृदय की सुजन, फेफड़ों की सुजन एवं आँतों की सुजन में भी अनुभवी चिकित्सक के द्वारा प्रयोग करवाया जाता है |

प्रमेह रोग में

वत्सनाभ प्रमेह रोगों में उपयोगी होता है | यह मूत्र के अधिक आने, मधुमेह एवं उदकमेह में पेशाब के साथ अधिक सुगर आने के प्रमाण को कम करता है | साथ ही यह मूत्रकृच्छ अर्थात पेशाब के रुक रुक के आना या कष्ट के साथ आना में भी प्रयोग किया जाता है | इन रोगों के उपचार के लिए शुद्ध वत्सनाभ का सेवन अन्य औषध योगों के साथ सेवन करवाया जाता है |

श्वास एवं खांसी में मीठा तेलिये के फायदे

यह उष्ण एवं तीक्षण प्रकृति का होता है | अत: यह उत्तम कफहर गुणों से युक्त है |इसके सेवन से प्रणवह: स्रोतस अर्थात फेफड़ों के कफ से राहत मिलती है | श्वास एवं खांसी का मुख्य कारण क्लेदक कफ होता है जो अमाशय में रहता है | इसका सेवन अत्यल्प मात्रा में अन्य कफशामक औषधियों के साथ किया जाये तो कफज विकारों का शमन जल्दी होगा |

दर्द को दूर करने में

बढ़ी एवं कुपित वायु के कारण होने वाले दर्द एवं वेदनाओं को दूर करने में यह उत्तम द्रव्य है | इसके सेवन से अमाशय के ज्ञान तंतु संज्ञा शुन्य हो जाते है अर्थात पेट में होने वाले दर्द में यह राहत देता है |

शरीर के किसी भी भाग में दर्द की शिकायत में इसका सेवन वेदना दूर करने के लिए किया जा सकता है | इसका तेल बाहरी रूप से होने वाले दर्द जैसे – घुटनों का दर्द, जोड़ों का दर्द एवं आमवात शूल आदि में मालिश करने से लाभ मिलते है |

सिरदर्द एवं अन्य दर्द में वत्सनाभ का लेप करना भी फायदेमंद रहता है | लेप करने से दर्द एवं वेदना दोनों दूर हो जाते है |असहनीय पीड़ा को रोकने के लिए धतूरे के पतों के स्वरस में मीठे तेलिय का चूर्ण मिलाकर लेप करना अति लाभकारी होता है | इससे पीड़ा शांत हो जाती है |

अशुद्ध वत्सनाभ के सेवन करने से उत्पन्न होने वाले लक्षण

अशुद्ध वत्सनाभ का सेवन करने से शरीर में दाह, मूर्च्छा और हृदयगति रुक कर व्यक्ति की मृत्यु तक भी हो सकती है |इसके सेवन के कुच्छ मिनटों के बाद ही ये लक्षण प्रकट हो सकते है –

  • मुंह, होंठ, कंठ में तीव्र जलन, चुनचुनाहट और सुन्नता सी होने लगती है |
  • सेवन किये हुए व्यक्ति के मुंह से लार गिरने लगती है |
  • कुछ समय पश्चात गृहीत व्यक्ति के पेट में दर्द एवं उलटी होने लगती है |
  • झिनझिनी एवं सुन्नता पुरे शरीर में व्याप्त हो जाती है | व्यक्ति को देखने से एसा लगता है कि उसे लकवा होने वाला है |
  • रोगी बेहोश होने लगता है , उसका सर चकराने लगता है | देखने की क्षमता कमजोर हो जाती है | रोगी की खड़े होने व् चलने की क्षमता नहीं रहती |
  • हृदय गति धीमी पड़ जाती है |
  • सेवन के कुछ समय पश्चात ही श्वास की गति पहले तेज और फिर मंद होने लगती है |
  • शरीर का तापकर्म गिरने लगता है |

इन अवस्थाओं में अतिशीघ्र रोगी को उपचार देना चाहिए | उसे वामक द्रव्य एवं उत्तेजक द्रव्यों का सेवन करवाना चाहिए एवं नजदीकी चिकित्सालय में पहुँचाना चाहिए |

धन्यवाद |

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