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कचनार

कचनार ( Bauhinia variegata) का पूर्ण परिचय, औषधीय गुण एवं इसके फायदे जाने

कचनार (Bauhinia variegata)

परिचय – कचनार को संस्कृत में कांचनार , चमरिक (चमर के समान पुष्प वाला) एवं युग्मपत्रक आदि नामों से जाना जाता है | सम्पूर्ण भारत में इसके वृक्ष देखने को मिल जाते है | अधिकतर इसे सुन्दर पुष्प वाला वृक्ष ही मानते है , लेकिन इसके औषधीय गुण अत्यंत विस्तृत है जिनके कारण इसे आयुर्वेद में प्रमुखता से उपयोग किया जाता है | आज इस आर्टिकल में हम कचनार के औषधीय गुण, इसके फायदे एवं कचनार को घरेलु चिकित्सा में कैसे प्रयोग करे ? के बारे में बताएँगे |

कचनार

इसका वृक्ष मध्यम प्रमाण का होता है अर्थात वृक्ष की लम्बाई 10 से 15 मीटर तक होती है, छाल धूसरवर्णी एवं लम्बाई में फटी हुई होती है | शरद ऋतू में वृक्ष पर फुल लगते है जो बहुत ही सुहावने होते है , जिसकी कली लम्बी होती है | हेमंत ऋतू में वृक्ष पर फल लगते है | कचनार की पते 2.5 इंच से 6 इंच तक लम्बी एवं 3 से 6.5 इंच तक चौड़ी होती है | पतियों के ऊपर बारीक़ धारियां होती है | इसके पत्र गहरे हृद्याकृति के होते है |

पुष्प श्वेत, बैंगनी या गुलाबी रंग के होते है | वैसे फूलों के रंग भेद के अनुसार इसके पांच प्रकार माने जा सकते है | ये सफ़ेद, बैंगनी, लाल, गुलाबी एवं पीले रंग के होते है | फूलों पर एक अंतर्दल चित्रित होता है जो हलके पीले वर्ण का होता है | पुष्प का बहिर्दल सुर्वाकार होता है | पुष्प की पंखुड़िया दूर – दूर होती है | पुष्प की नलिका 1 इंच तक लम्बी हो सकती है | शरद ऋतू में वृक्ष पर फुल लगते है |

इसकी फली आधा से 1 फीट तक लम्बी हो सकती है | फली चौड़ाई में 0.75 इंच से 1 इंच तक चपटी होती है | यह चिकनी होने के साथ – साथ मुड़ी हुई भी होती है | हेमंत ऋतू (अप्रेल) में कचनार पर फली लगती है |

कचनार के औषधीय गुण – धर्म 

इसका रस कषाय होता है | गुणों में यह लघु एवं रुक्ष होती है | प्रकृति शीत होती है अर्थात कचनार शीत वीर्य होता है | पचने के बाद इसका विपाक कटु होता है | पौधे की छाल में टैनिन, शर्करा और भूरे रंग का गोंद प्राप्त होता है | गुणों में रुक्ष, कषाय एव लघु होने के कारण कफ का शमन करता है एवं शीत वीर्य होने के कारण पीत का शमन करता है |

कचनार के प्रयोज्य अंग एवं सेवन की मात्रा 

औषध उपयोग में कचनार की छाल एवं कचनार के फुल का उपयोग किया जाता है | इसके सेवन में चूर्ण को 3 से 6 ग्राम, क्वाथ के रूप में इसे 40 से 60 ml तथा इसके पुष्प स्वरस को 10 से 20 ml तक लिया जा सकता है | आयुर्वेद में इसके प्रयोग से विभिन्न आयुर्वेदिक दवाएं जैसे – कांचनार गुग्ग्लू, कान्च्नारादी क्वाथ, कान्च्नादी गुटिका आदि का निर्माण किया जाता है |

कचनार के फायदे एवं स्वास्थ्य लाभ 

घरेलु चिकित्सा में कचनार के सभी अंगो का प्रयोग किया जाता है | इस वृक्ष में बहुत से चमत्कारिक गुण विद्यमान होते है | आयुर्वेद में इसे गण्डमालनाशक माना जाता है | सभी प्रकार के ग्रंथि रोग (गांठो) में इसका प्रयोग चमत्कारिक लाभ देता है | कचनार की छाल, इसके पते , कचनार के फुल आदि से विभिन्न घरेलु नुस्खे तैयार किये जाते है | कचनार की जड़ से एक प्रकार का शक्तिवर्द्धक पेय बनाया जाता है , जो शरीर में शक्ति का संचार करता है |

विभिन्न रोगों में कचनार का सेवन 

गलगंड में कचनार का प्रयोग 

 

गलगंड रोग भोजन में आयोडीन की कमी के कारण होता है | गर्भवती महिलाऐं एवं बच्चों को यह अधिक परेशान करता है | कचनार के सेवन से गलगंड एवं सामान्यत: होने वाली गण्डमाला जैसी समस्या में लाभ मिलता है | आयुर्वेद में इसे गण्डमालानाशक कहा गया है | गण्डमाला या गलगंड रोग में इसके काढ़े का इस्तेमाल करना चाहिए | कचनार की छाल के साथ सोंठ मिलाकर इसका काढ़ा बना ले | इस काढ़े का इस्तेमाल नियमित करने से गण्डमाला जल्द ही ठीक हो जाती है |

कब्ज की समस्या में कचनार के फायदे 

कब्ज एक आम और गंभीर समस्या है | इस रोग से ग्रषित होने पर अन्य रोग अपने आप ही पीड़ित को घेर लेते है | लम्बे समय तक की कब्ज – अजीर्ण, अपच, गैस, बवासीर जैसे रोगों को जन्म देती है | अत: कब्ज की समस्या होने पर थोड़ी सी कचनार की छाल को चावलों के पानी में पिसलें | इसका सेवन चार तोले के मात्रा में करें | कब्ज की समस्या जाती रहेगी | और पढ़ेंकब्ज की आयुर्वेदिक दवाएं

महिलाओं की समस्या श्वेत प्रदर में फायदेमंद 

श्वेत प्रदर भी एक गंभीर रोग है | लम्बे समय तक श्वेत प्रदर से पीड़ित महिला का शरीर कटने लगता है | महिला कमजोर एवं विभिन्न समस्याओं से ग्रषित हो जाती है | श्वेत प्रदर में कचनार की पतियों को पानी में उबाल ले | अब इन्हें दही के साथ या दही के रायते के साथ सेवन करने से श्वेत प्रदर रोग में आराम मिलता है |

मुंह के छालों एवं टॉन्सिल्स में 

मुंह के छालों एवं टॉन्सिल्स में कचनार का घरेलु प्रयोग लाभदायक होता है | अगर आप भी मुंह के छालों एवं टॉन्सिल्स की समस्या से ग्रषित है तो कचनार की छाल, बबुल की छाल एवं अनार के छिल्को इन सभी को सामान मात्रा में लेकर पका ले | अब इसके पानी से कुल्ला करे मुंह के छाले एवं टॉन्सिल्स की समस्या में राहत मिलेगी |

बवासीर 

बवासीर में कचनार फायदेमंद होती है | अगर बवासीर की समस्या से गुजर रहे है  तो कचनार की छाल को पिसलें और इसे छाछ के साथ दिन में दो बार सेवन करे | बवासीर में आने वाले रक्त से छुटकारा मिलेगा | साथ ही आंतों के कीड़ों में भी लाभ मिलेगा | और पढ़ेंबवासीर का आयुर्वेदिक इलाज 

फोड़े – फुंसियों 

फोड़े – फुंसियो , रसौली एवं स्तनों की गांठो में कचनार का सेवन लाभदायक सिद्ध होता है | इन सभी रोगों में कचनार की छाल का चूर्ण बना ले एवं इसमें सोंठ और चावल का पानी के साथ मिलाकर सेवन करें | फोड़े – फुंसियाँ एवं स्तनों की गांठे भी ठीक हो जाती है |

कुच्छ अन्य नुस्खे 

  • जले हुए स्थान पर कचनार की छाल या फुल का पुल्टिस तैयार करके लगाने से आराम मिलता है |
  • पित के कारण अगर लीवर में सुजन हो तो कचनार की जड़ की छाल का क्वाथ बना कर सेवन करना लाभदायक होता है |
  • रक्त पित की समस्या में कचनार के फूलों का साग 5 – 6 टोला गाय के घी में भुनकर शहद के साथ खाने से लाभ मिलता है |
  • नींद न आती हो तो कचनार के 100 ग्राम फुल एवं 100 ग्राम गुलाब के फुल इन दोनों की एक पोटली बना ले | अब गरम पानी में इन पोटलियों को थोड़ी देर के लिए डूबा दे | इस पानी से स्नान करने से मानसिक तनाव दूर होता है एवं जल्द ही नींद आती है |
  • कफज विकारों में इसके क्वाथ का सेवन शहद के साथ करने से आराम मिलता है |
  • भूख की कमी में कचनार के फूलो की कलियों को को घी में भुनकर खाने से खुल कर भूख लगती है |
  • इसकी जड़ का काढ़ा पेट की गैस , आफरा, कृमि आदि से निजत देता है |

धन्यवाद |

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