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पार्किसंस रोग इन हिंदी

पार्किंसंस रोग / Parkinson’s Disease – इसके कारण, लक्षण और इलाज |

पार्किंसंस रोग रोग / Parkinson’s Disease in Hindi

परिचय – पार्किंसंस रोग को हिंदी में कम्पाघात कहते है | यह एक मानसिक विकार है जो केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र से जुड़ा हुआ रोग है | चिकित्सा शब्दावली में इसे  Paralysis agitans भी कहा जाता है | इस रोग की खोज सन 1817 में पार्किन्सन द्वारा की गई थी , इसिलिय इसे पार्किंसंस रोग कहते है | यह धीरे – धीरे बढ़ने वाला रोग है , जिसका शुरुआत में पता नहीं चलता |

पार्किंसंस रोग
पार्किंसंस रोग इन हिंदी

जब यह रोग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो वह दैनिक दिनचर्या भी ठीक ढंग से करने में अक्षम हो जाता है | क्योंकि इस रोग में रोगी व्यक्ति का शरीर कंप – कंपता रहता है | व्यक्ति का पूरा शरीर कांपता रहता है | ये कंप – कपाने के लक्षण साधारणत: नहीं दिखाई देते , लेकिन जब रोगी कोई कार्य करता है तो उसके हाथ या पैर कांपने लगते है | वैसे अगर रोग तीव्र अवस्था में है तो आसानी से व्यक्ति को पहचाना जा सकता है |

पार्किंसंस रोगव्यक्ति की अंतिम अवस्था में दिखाई पड़ती है अर्थात बुढ़ापे में इस रोग के होने के चांस अधिक होते है | रोग उत्पन्न होने के बाद यह रोगी को अक्षम करने वाला होता है | यह रोग विभिन्न नशीली दवाइयों के सेवन से या अधिक नशा करने से भी बुढ़ापे में होने का खतरा बना रहता है |

पार्किंसंस रोग के कारण / Causes of Parkinson’s Disease 

  • विभिन्न नशीली दवाओं जैसे – रोऊल्फीया, हेलोपेरीडॉल या नींद लाने वाली दवाओं के अधिक सेवन से |
  • शराब का अधिक सेवन , तम्बाकू , भांग , चरस या अन्य किसी मादक पदार्थो के सेवन से |
  • किसी चोट के कारण भी इस रोग के होने की असंका रहती है |
  • किटनाशकों के अधिक सम्पर्क में रहने से भी पर्किसंस रोग से प्रभावित होने की आशंका रहती है | आजकल कीटनाशक का उपयोग किये गए खाद्य पदार्थो की बाजार में भरमार है , इनका सेवन भी कारण बन सकता है |
  • अधिक मानसिक कार्य करने वाले या अधिक सोच – विचार करने वाले लोगों को भी बुढ़ापे में इस रोग से पीड़ित होने का खतरा रहता है |
  • शरीर में स्थित त्रिदोषों के गडबड़ाने के कारण भी रोग का खतरा रहता है |

पार्किंसंस रोग रोग के लक्षण / Symptoms of Parkinson’s Disease in Hindi

इस रोग में रोगी की विशिष्ट दिखावट, चाल एवं शरीर की थरथराहट से ही रोग की पहचान हो जाती है | इसके अलावा इसके लक्षण आप निचे देख सकते है –

  • रोगी के शरीर की दिखावट और हलचल में विशिष्ट सख्तपन होता है |
  • पीड़ित के चहरे के हाव – भाव गायब हो जाते है और चेहरा भी मास्क जैसा हो जाता है |
  • पीड़ित छोटे – छोटे क़दमों से चलता है एवं चलते समय अपने पैर घसीट – घसीट कर रखता है |
  • रोग की अवस्था में व्यक्ति कोई लिखावट का कार्य ठीक ढंग से नहीं कर पाता |
  • रोगी की भुजाएँ अन्दर की तरफ दबी हुई व चलने पर हिलती नहीं है |
  • शरीर में थरथराहट सामान्य देखी जा सकती है |
  • प्राय: हाथों एवं पैरों में अधिक देखी जा सकती है |
  • अधिक गंभीर स्थिति में थरथराहट भी तीव्र होती है जो भुजाओं और सिर में भी देखने को मिलती है |
  • रोगी की भावना के आधार पर शरीर में थरथराहट बढ़ भी सकती है |
  • व्यक्ति की उच्चारण की शक्ति क्षीण हो जाती है अर्थात रोगी ठीक ढंग से शब्द का उच्चारण करने में सक्षम नहीं होता है | उसके द्वारा बोले गए वाक्य अस्पष्ट उच्चारण युक्त और एक स्वर हो जाते है |

पार्किंसंस रोग का आयुर्वेदिक इलाज / Ayurvedic Treatments of Parkinson’s Disease in Hindi 

  • ब्राह्मी का सेवन इस रोग में लाभ देता है | ब्राह्मी सभी प्रकार के मानसिक विकारों में एक अचूक आयुर्वेदिक इलाज है | इसमें पाए जाने वाले हायड्रोकोटलीन एवं एशियाटिकोसाइड नामक तत्व पार्किसन्स रोग में फायदा पंहुचाते है | इस रोग में ब्राह्मी के बीजों से बने चूर्ण का इस्तेमाल किया जा सकता है |
  • अगर रोग किसी नशीली दवाई के सेवन से होने की आशंका हो तो ईस दवाई को छोड़ते ही रोग के लक्षण भी कम हो जाते है |
  • केंवाच या कौंच के चूर्ण का इस्तेमाल भी इस रोग में चमत्कारिक लाभ देता है | अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति में L-Dopa नामक दवाई को 4 से 6 ग्राम की मात्रा में इस रोग की थरथराहट रोकने के लिए दी जाती है | कौंच में लेवडोपा / L – Dopa पाया जाता है इसलिए इसका इस्तेमाल कम्पाघात में काफी लाभ देता है | कौच की अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे 
  • पार्किंसंस रोग से ग्रसित व्यक्तियों को दूध में थोड़ी सी हल्दी , सोंठ और दालचीनी डालकर अच्छी तरह दूध को उबालकर सेवन करना चाहिए, लाभ मिलता है |
  • छुहारे और सफ़ेद प्याज का रस भी लाभदायक है |
  • शरीर पर विषगर्भ तेल या सरसों के तेल की मालिश करते रहना चाहिए |
  • तिल को बकरी के दूध के साथ सेवन करने से भी रोग में फायदा मिलता है |
  • रोगी को हरी पत्तेदार सब्जियों और फलों के ज्यूस का सेवन अधिक करना चाहिए |
  • किसी अच्छे पंचकर्म स्पेशलिस्ट से सम्पर्क करके शारीर का शोधन करवाके वैद्य द्वारा बताई गई औषधि का सेवन करने से अधिक लाभ मिलता है |
  • पीड़ित को नशीले पदार्थो से दुरी बना लेनी चाहिए | क्योंकि इनके सेवन से रोग के ठीक होने के चांस न के बराबर होते है |

पार्किंसंस रोग की गंभीर अवस्था में ऑपरेशन के द्वारा उपचार / Treatment by Operation in Crisis

पार्किंसंस के कुछ रोगी जो चिकित्सकीय उपचार से ठीक नहीं हो सकते और इस रोग की गंभीरता के कारण पूर्ण रूप से अक्षम है | उनके लिए न्यूरोसर्जरी एक उपाय बचता है | रोग की गंभीरता में एक ऑपरेशन किया जाता है जिसमे मस्तिष्क में स्थित पेशीय स्फूर्ति को नियंत्रित करने वाले Globus pallidus को काट दिया जाता है | इसको काटने से रोगी के शरीर का सख्तपन और थरथराहट की समस्या दूर हो जाती है |

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