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गलगंड (Goiter) / Thyroid Treatment

निभद्ध: श्वयथुर्यश्य मुष्कवल्लभते गले |

महान वा यदि वा हृश्वों गलगंड तमादी शेत ||

इस श्लोक के अर्थो में जिसके गले में बड़ा या छोटा सूजन युक्त , अंडकोष के समान लटकता है उसे गलगंड कहा जाता है | आचार्य चरक ने भी शोथ प्रकरण में इसे एक सूत्र में बताया है –

“गलस्य पार्श्वें गलगंड एक: स्यात गण्डमाला बहुभिस्तु गंडै |”

आचार्य चरक का अर्थ है की गले के पार्श्वभाग में एक शोथ होता है उसे ही गलगंड कहते है | आयुर्वेद के अनुसार वायु, कफ और मेद दूषित होकर गले और मन्या में पंहुचकर अपने-अपने लक्षणों से युक्त धीरे – धीरे बढ़ने वाले गंड अर्थात गाँठ को उत्पन्न करते है जिसे घेंघा कहते है |

गलगंड

आधुनिक मतानुसार गलगंड रोग 

जिन क्षेत्रों के भोजन या पानी में आयोडीन की कमी होती हैं , वंहा यह रोग अधिक पनपता है | जब आहार में आयोडीन का ग्रहण किया जाता है , तब हमारी थाइरोइड ग्रंथि के द्वारा थ्य्रोक्सिन हार्मोन का सरवन होता है जो भोजन के मेटाबोलिज्म को नियंत्रित करती है | इस ग्रंथि की क्रिया इन्सुलिन के ठीक विपरीत होती है | जब कभी लम्बे समय तक आहार में आयोडीन की कमी रहती तब इस ग्रंथि की स्थाई व्रद्धी हो जाती है जिसे Hyper Thyroidism कहते है | इसके अलावा अधिक मोटापा, चुने का अधिक सेवन , विटामिन ए व बी की कमी, फास्फेट की कमी और आंतो में पाचक जीवाणुओं की कमी होने से भी गलगंड (Goiter) / Thyroid की समस्या हो जाती है |

गलगंड (Goiter) के लक्षण 

आयुर्वेद मतानुसार गलगंड 3 प्रकार का होता है जिनके सभी के लक्षण भिन्न – भिन्न है

  1. वातज गलगंड के लक्षण – इस प्रकार के गलगंड में सुई चुभने जैसी पीड़ा होती है | यह काले रंग की सिराओं से युक्त होते जिन्हें स्पर्श करने पर भारी महसूस होता है | इस प्रकार का  धीरे – धीरे बढ़ने वाला होता है जो पाकरहित होते है, लेकिन कभी – कभार पक भी जाता है | रोगी का मुख हमेशां नीरस होता है , रोगी का तालू और गला हमेशां सुखा रहता है |
  2. कफज गलगंड के लक्षण – कफज गलगंड भारी, बड़ा और छूने पर ठंडा लगता है | इस प्रकार का घेंघा त्वचा के रंग का ही होता है | इसमें दर्द कम होता है लेकिन यह अधिक खुजली वाला होता है | कफज गलगंड को बढ़ने में काफी समय लगता है एवं पाक भी लम्बे समय बाद होता है | रोगी के मुख में हमेशां माधुर्य बना रहता है एवं तालू और गले में प्रलेप सा बना रहता है |
  3. मेदाज गलगंड – मोटापे के कारण उत्पन्न होने वाला घेंघा रोग है | जो चिकना , मुलायम, भूरे रंग का एवं तुम्बी के सामान लटकता रहता है | यह Goiter शरीर की धातुओं की क्षय और वृद्धि के साथ – साथ छोटा या बड़ा होता रहता है | मेदाज गल-गंड के रोगी का मुख हमेशां चिकना रहता है एवं मुंह से हमेशा अश्पष्ट ध्वनि निकलती रहती है |

गलगंड (Goiter) / Thyroid का घरेलु इलाज 

रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले अपने आहार में आयोडीन युक्त आहार एवं नमक का प्रयोग करना चाहिए | अगर आयुदीन युक्त नमक को आहार में शामिल किया जाये तो घेंघा रोग की सम्भावना न के बराबर हो जाती है |

  1. कांचनार की छाल को पानी में घिस कर इसका लेप गले पर करने से घेंघा रोग में फायदा मिलता है |
  2. घेंघा की गांठो पर गर्म पानी की भाप देकर उनपर मिट्टी की पट्टी बांधना भी फायदेमंद होता है |
  3. देवदारु और इन्द्रायण को साथ पीसकर इसका लेप  प्रभावित अंग पर करने से कफज-गलगंड में लाभ मिलता है |
  4. एरंड की जड़ का लेप करने से भी इस रोग में फायदा मिलता है |
  5. इस रोग में अमलतास की जड़ को पीसकर किया गया लेप / घरेलु इलाज भी लाभ देता है |
  6. गूंजातेल और तुम्बी के तेल की मालिश घेंघा में लाभकारी होती है |
  7. अपराजिता के जड़ का एक ग्राम की मात्रा में चूर्ण इसे घी के साथ मिलाकर सेवन करने से घेंघा रोग में लाभ होता है |

आयुर्वेद के चिकित्सक इस रोग में ताम्रभस्म , कांचनार गुग्ग्लू, चन्द्रप्रभावटी , मन: शिला एवं स्वर्णबसंतमालती रस का प्रयोग करते है | Thyroid Treatment in Hindi

धन्यवाद |

 

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