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सत्यानाशी / स्वर्णक्षीरी / Mexican Prickly Poppy

भारत के प्रत्येक राज्य में सत्यानाशी के पौधे देखने को मिल जाते है | ये खाली पड़ी जमीन, जंगल, बंजर भूमि एवं मैदानों में अपने आप ही उग आते है | राजस्थान, पंजाब, हरियाणा में गर्मियों में सत्यानाशी के पौधों की बहुतायत रहती है |

सत्यानाशी का वानस्पतिक परिचय

इसे संस्कृत में स्वर्णक्षीरी, कटुपर्णी, हेमक्षीरी आदि नामों से पुकारा जाता है | आयुर्वेद चिकित्सा में प्राचीन समय से ही इसके उपयोग का वर्णन प्राप्त होता है | सत्यानाशी का पौधा 2 से 4 फीट तक लम्बा अनेक शाखाओं वाला होता है | इसके सम्पूर्ण पौधे पर कांटे लगे रहते है |

satyanashi
Vinayaraj [CC BY-SA 4.0 (https://creativecommons.org/licenses/by-sa/4.0)]

सत्यानाशी का पौधा – 2 से 4 फीट लम्बा, अनेक शाखाओं वाला एवं काँटों से युक्त |

पत्र (पते) – स्वर्णक्षीरी के पते 3 से 7 इंच लम्बे, तीखे काँटों से युक्त एवं पतों पर सफ़ेद रंग के धब्बे दिखाई पड़ते है |

फुल – पीले रंग के 5 से 7 पंखुड़ियों वाले होते है |

फल – लम्बे एवं गोल होते है ; जिनमे से काले रंग के बीज निकलते है |

सत्यानाशी के अन्य नाम

सत्यानाशी का वानस्पतिक नाम :- Argemone mexicana Linn. है | यह Papaveraceae फैमिली का पौधा है |

india biodiversity
https://indiabiodiversity.org/species/show/32953

हिंदी – सत्यानाशी

संस्कृत – स्वर्णक्षीरी, कटुपर्णी, हैमवती, हिमावती, पितदुग्धा आदि |

मराठी – काटे धोत्रा |

असामी – सियाल-कांटा, कुहुम कांटा |

तेलगु – ब्रह्मदंडी |

English – Mexican Prickly Poppy

सत्यानाशी के औषधीय गुण धर्म

हेमाहा रेचनी तिक्ता भेद्न्युत्क्लेशकारिणी |

कृमिकंडूविषानाह कफपित्तास्त्रकुष्ठनुत ||

भावप्रकाश निघंटु

रस :- कटु एवं तिक्त

गुण :- लघु एवं रुक्ष

विपाक :- कटु

वीर्य :- उष्ण

दोषकर्म – कफ एवं पितहर

अन्यकर्म – तृषानिग्रहण, ग्राही

सत्यानाशी के फायदे एवं सेवन की विधि

सत्यानाशी कौनसे रोगों में उपयोगी है ?

बुखार (Fever)
तृषा / अधिक प्यास लगना (thirst disease)
रक्तपित रोग (blood-borne disease)
अतिसार / दस्त (Diarrhea)
छर्दी (Cardiovascular disease)
त्वचा के रोग (Skin Disease)
मानसिक विकार (Mentol Disorder)
पुराना घाव (Chronic wound)
कुष्ठ रोग (leprosy)
अस्थमा (Asthma)

सत्यानाशी के उपयोगी अंग कौनसे है ?

इसकी जड़, पते, फुल, तना एवं बीज सभी उपयोगी है | अर्थात सत्यानाशी का पंचांग चिकित्सार्थ उपयोग में लिया जाता है |

सत्यानाशी का इस्तेमाल कैसे किया जाता है अर्थात सेवन की मात्रा ?

इसके पंचांग का इस्तेमाल किया जाता है |
चूर्ण का सेवन :- 1 से 3 ग्राम
दूध :- 5 से 10 बूंद
तेल :- 5 से 15 बूंद
स्वरस – 5 मिली.
काढ़ा :- 10 मिली.

सत्यानाशी के सेवन में कौनसी सावधानियां बरतनी चाहिए ?

आयुर्वेद चिकित्सक के देख – रेख में इसका सेवन करना चाहिए | इसके बीज विषैले होते है अत: इनका उपयोग आन्तरिक रूप अर्थात खाने के काम में नहीं लेना चाहिए | बीजों का उपयोग केवल बाहरी रूप में ही करना चाहिए |

किसी भी प्रकार से स्वयं द्वारा किया गया नुस्खा नुकसान दायक हो सकता है अत: सर्वप्रथम सत्यानाशी का प्रयोग करने से पहले वैद्य या उपवैद्य से सलाह अवश्य लेनी चाहिए |

धन्यवाद |

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