वाराहीकंद / Dioscorea Detail in Hindi

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वाराहीकंद जिसे जिमीकंद, डुक्करकंद एवं रतालू आदि नामों से जाना जाता है यह अफ्रीका एवं चीनी क्षेत्रों का देशज पौधा है | हमारे यहाँ इसकी सब्जी बना कर एवं आयुर्वेद चिकित्सा में चिकित्सार्थ काम में लिया जाता है |

वाराहीकंद
वाराहीकंद – ebay.com

वैसे आयुर्वेद के ग्रन्थ चरक संहिता में वाराहीकंद का जिक्र नहीं मिलता लेकिन सुश्रुत संहिता में इसे मूत्रघात, कुष्ठ एवं विसर्प आदि में उपयोगी बताया है | आयुर्वेद चिकित्सा में सर्वप्रथम सुश्रुत ने इसे अन्य द्रव्यों के साथ प्रयोग करना बताया था |

आयुर्वेद के साथ – साथ इसे पश्चिमी आधुनिक चिकित्सा पद्धति की दवाओं में भी प्रचुरता से प्रयोग में लिया जाता है क्योंकि इसमें पाया जाने वाला Diosgenin तत्व इसे आधुनिक चिकित्सा पद्धति की दवाओं के लिए उपयोगी बनाता है | यह sex harmons / oral contraceptive एवं rheumatic Arthritis आदि की दवाएं बनाने के लिए उपयोग में लिया जाता है |

वाराहीकंद के पर्याय

हिंदी – वाराहीकंद , रतालू, जिमीकंद |

संस्कृत – शौकरी, वाराहवदना, गृष्टि, वरदा, क्रोडकंद एवं चर्मकारालुक आदि |

अन्य भाषा – चमालू, सुरण, पिताआलू आदि |

मराठी – डुक्करकंद |

अंग्रेजी – Wild Yam

Scientific Name – Dioscorea bulbifera Linn.

Family – Dioscoreaceae

वानस्पतिक परिचयवाराहीकंद का पौधा अर्थात इसकी लता (बेल) होती है जो अपने आस – पास के अन्य पौधों पर चढ़ी हुई रहती है | वाराहीकंद की बेल का कांड चिकना होता है जिसपर पत्र निकलने वाली जगह कंदाकार रचना होती है |

वाराहीकंद के पते एकांतर 2.5″ से 6″ तक लम्बे, 1.5″ से 4″ तक चौड़े होते है | ये पतले, आगे से पुच्छ के आकार के, लम्बे नोकयुक्त होते है | इनपर 9 रेखाएं होती है |

वाराहीकंद के फुल 5 से 10 सेमी. लम्बे लम्बी मंजिरियों में लगते है | इसके फल त्रिकोण आकार के होते है |

वराहीकंद की जड़ अर्थात इसका कंद छोटे आकार का भूरे रंग का होता है | जिस पर सुवर की तरह बाल होते है इसीलिए इसे वाराह (सूअर) कंद कहा जाता है | यह अन्दर से पीले एवं सफ़ेद रंग का होता है |

वाराहीकंद के औषधीय गुण

आयुर्वेद के अनुसार इसका रस मधुर, कटु एवं तिक्त होता है | गुणों में यह लघु एवं स्निग्ध होती है | पाचन के पश्चात इसका विपाक कटु रहता है | यह उष्ण वीर्य की होती है अर्थात वाराहीकंद की तासीर गरम होती है |

यह वात एवं पित का शमन (ठीक) करने वाली, बृहन, वृष्य, स्वर्य, मूत्रल एवं बल्य होती है | इसका उपयोग क्षय, शुक्रमेह, मूत्रकृच्छ, दाह, प्रमेह, कृमि एवं रसायन रूप में किया जाता है |

वाराहीकंद के फायदे / Benefits of VarahiKanda in Hindi

इसमें कार्बोहायड्रेट, एसेंशियल एमिनो एसिड, मिनरल्स, पोलीफिनॉल एवं Glycoprotein आदि उपयोगी तत्व होते है जो इसे विभिन्न रोगों के लिए उपयोगी औषधि साबित करती है |

वाराहीकंद में पाया जाने वाला Steroid saponin एक महत्वपूर्ण कंपाउंड है; जिसके कुच्छ महत्वपूर्ण बायोलॉजिकल फंक्शन होते है जो इसे Anticarcinogenic, Antithrombotic, एंटीवायरल, Hemolytic, Hypoglycemic और Hypocholesterolemia आदि बनाते है |

रक्तपित में वाराहीकंद के फायदे

वाराहीकंद पित्तशामक एवं रक्तशोधक होने के कारण विशेष रूप से मूत्रमार्गगत रक्तपित में काफी फायदेमंद होता है | इससे निर्मित क्वाथ का सेवन करने से रक्तपित्त की समस्या दूर होकर रक्त का शोधन होता है |

रसायन गुणों से युक्त है वाराहीकंद

मधुरता से रस, स्तन्य, मांस, शुक्रादी धातुओं का वर्धन होकर रसायनकर्म होता है | वाराहीकंद धातुओं का वर्द्धन करता है | अत: जिन – जिन व्याधियों में बलक्षीण होता है, उनमे इसका प्रयोग शहद और शक्कर या घी के साथ करना चाहिए |

यौन शक्ति वृद्धि

वाराहीकंद का सूक्षम चूर्ण बना कर इसे गरम दूध में मिलाकर अच्छी तरह मंथन किया जाता है | मंथन करने से जो घी ऊपर आता है उसे शहद के साथ खाने से एक महीने में कामशक्ति में वृद्धि होकर यौन कमजोरियों से मुक्ति मिलती है |

कुष्ठ रोग में वाराहीकंद के फायदे

वाराहीकंद के पौधे के पतों का स्वरस निकाल लें | इस स्वरस को कुष्ठ से प्रभावित स्थान पर लगाने से लाभ मिलता है | नासूर की समस्या में वाराहीकंद चूर्ण को तेल में मिलाकर नाडीव्रण अर्थात नासूर पर लेप करना चाहिए | यह नासूर को जल्द ठीक कर देता है |

धन्यवाद |

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