हरताल का शोधन – मारण एवं स्वास्थ्य उपयोग

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हरताल जिसे अंग्रेजी में Arsenic Trisulfide कहते है | यह एक धात्विक खनिज पदार्थ है | आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्रों में चरक एवं सुश्रुत संहिता काल से ही लगातार चिकित्सा उपयोग में लिया जाता रहा है |

इसके विभिन्न पर्याय बताये गए है | इसे आल, ताल, तालक, पीतनक, पिन्जर तथा वंगारी आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है | हरताल आयुर्वेदिक मेडिसिन है |

हरताल का रासायनिक सूत्र AS2S3 है | आयुर्वेद चिकित्सा की द्रष्टि से यह खुजली, कुष्ठ, रक्तविकार, वात-पित शामक, मिर्गी एवं बवासीर जैसे रोगों में उपयोगी होती है |

हरताल के औषधीय गुण

यह पीले रंग की होती है | स्वाद में कषाय एवं उष्ण वीर्य की होती है | गुणों में रक्तविकार दूर करने वाली, मोटापा, मस्से, बवासीर, कुष्ठ, वात एवं कफ का शमन करने वाली, पेट के कीड़े और मिर्गी रोग में लाभदायक होती है |

हरताल को अशुद्ध सेवन करने का निषेध है | अशुद्ध हरताल प्राणघातक साबित होती है |

हरताल की पहचान

हरताल
image creadit – indiamart.com

यह खनिज एवं कृत्रिम दोनों रूपों में पाया जाता है | इसके दो भेद पत्रताल एवं पिंडताल मुख्य रूप से पाया जाता है | इसमें से पत्रताल उत्तम किस्म का हरताल होता है जो अनेक परतो वाला होता है इसमें एक के उपर एक परत रहती है | रंग में सोने जैसा चमकीला पीले रंग का होता है |

पिण्डताल हरताल पिंड के जैसा होता है | इसे अग्राह्य माना जाता है | यह चमकविहीन उबड़ – खाबड़ पिंड के सद्रश होता है |

हरताल के चार मुख्य भेद माने जाते है –

  1. तबकिया हरताल
  2. वंशपत्री हरताल
  3. गुव्रिया हरताल
  4. गोदंती हरताल (सर्वाधिक चिकित्सा उपयोगी)

हरताल का शोधन कैसे होता है ?

इसका शोधन करने के लिए १०० ग्राम हरताल को कूटकर चावल जैसा मोटा चूर्ण बना लें | इसे सूती कपडे की पोटली में बांधकर दौलायन्त्र में लटकाए |

अब दौलायंत्र में चुना मिश्रित कांजिक स्वरस में एक प्रहर तक स्वेदन करें | अब इसके बाद कुष्मांड स्वरस में एक प्रहर, तिल तेल में एक प्रहर एवं त्रिफला जल में एक प्रहर तक स्वेदन करें |

इस प्रकार से इन सभी में एक – एक प्रहर तक स्वेदन करने के पश्चात इसे गरम जल से धोलें | इस प्रकार से हरताल का शोधन हो जाता है |

शोधन करने के लिए उपयोग में लिए गए सभी स्वरस की मात्रा हरताल से प्रत्येक 8 गुना राखी जाति है |

यहाँ एक प्रहर का मतलब लगभग 3 घंटे से है | दौलायंत्र आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का एक यंत्र है जिसे मिटटी के घड़े के मुख में लकड़ी की सलाका फंसाकर बनाया जाता है; इसमें द्रव्य भरने के पश्चात ऊपर से कपड मिटटी से मुख को बंद किया जाता है | इससे औषधियों अर्थात रस, उपरस, पारद आदि का शोधन किया जाता है |

हरताल का मारण अर्थात हरताल की भस्म बनाने की विधि

इसकी भस्म बनाने के लिए सबसे पहले पलास की जड़ की छाल को 2 किलो की मात्रा में लेकर 8 किलो जल में डालकर क्वाथ का निर्माण किया जाता है | जब जल 1 किलो बचे तब उतार कर छान लिया जाता है |

अब इसे छने हुए पलास के क्वाथ को फिर से अग्नि पर पकाया जाता है | जब यह शहद की तरह गाढ़ा हो जाये तब इसे निचे उतार लिया जाता है |

१०० ग्राम शुद्ध हरताल को खरल में रखकर महीन चूर्ण बना लिया जाता है | अब तैयार पलाश क्वाथ की तीन (3) भावनाएं दी जाती है | भावना देने का अर्थ है सूखे चूर्ण में इसे मिलाकर फिर से खरल में चलाना एवं सुखाने पर फिर से पलास क्वाथ को मिलाकर इसे गिला करना एवं खरल में घोट कर सुखाना | एसे तीन बार करना होता है |

इसके बाद भैंस के मूत्र की भावना देकर छोटी – छोटी टिकिया बना ली जाती है | इन्हें सराव सम्पुट में रखकर १० जंगली उपलों की आग में पकाया जाता है |

अब इसे निकल कर फिर से पलास मूल क्वाथ की तीन भावना देकर १० उपलों की आग में फिर से पाक करें |

इस प्रकार से १२ बार करने पर हरताल की भस्म बन जाती है | इस भस्म की परीक्षा की जाती है |

भस्म परीक्षा के लिए निर्मित भस्म को अग्नि पर डाला जाता है | अगर धुंवा दिखाई दे तो यह अपक्व भस्म है एवं धुंवा नहीं उठे तो इसे पूर्ण पक्व भस्म माना जाता है जिसे चिकित्सा उपयोग में लिया जा सकता है |

हरताल के स्वास्थ्य उपयोग एवं औषध योग

इसके उपयोग से आयुर्वेद चिकित्सा में कस्तूरी भैरव रस, ताल सिंदूर, नित्यानंद रस एवं रक्तपित्तान्तक रस आदि औषधियों का निर्माण किया जाता है |

यह विभिन्न रोगों में उपयोगी है –

  1. फिरंग / Syphilis
  2. कुष्ठ
  3. अर्श
  4. अपस्मार
  5. भगन्दर
  6. नाडीव्रण
  7. खून की खराबी
  8. अस्थमा
  9. फोड़े – फुंसियाँ
  10. वात एवं पित दोष का शमन

सेवन की विधि एवं मात्रा

इसका सेवन 1/8 रति से 1/4 रति तक किया जा सकता है | अधिक मात्रा में सेवन नुकसानदायी हो सकता है | हरताल का सेवन वैद्य के दिशा निर्देशों के अनुसार किया जाना चाहिए |

इसे विभिन्न रोगों के अनुसार विभिन्न अनुपानो के साथ प्रयोग करवाया जाता है | अनुपन स्वरुप शहद, घी, दूध या किसी औषधि स्वरस के साथ लिया जा सकता है |

धन्यवाद |

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