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भारत में काश्मीर, नेपाल एवं हिमालय के मध्य भाग में होने वाली औषधीय वनस्पति है | इसका क्षुप (झाड़ी) नुमा पौधा होता है | पत्थरीले क्षेत्रों में अधिकतर होती है , इसीलिए इसे पाषाणभेद कहा जाता है |

पाषाणभेद
image – wikipedia.org

पाषाणभेद का पौधा – के पते मोटे, हरे व्रण के एवं आगे से कटीले आकर के होते है | आयुर्वेद चिकित्सा में पाषाणभेद के मूल (जड़) का प्रयोग चिकित्सार्थ किया जाता है | यह पत्थरी, यौनीगत विकार, मूत्रकृच्छ, गुल्म, हृदय रोग, प्रमेह एवं प्लीहा रोगों आदि में प्रयोग की जाती है |

इसे पत्थरी किलर कहा जा सकता है, क्योंकि पाषाणभेद के सेवन से पत्थरी कट – कट कर शरीर से बाहर आ जाती है | नित्य 5 ग्राम पाषाणभेद चूर्ण का सेवन करने से अश्मरी की समस्या से छुटकारा मिलता है |

पाषाणभेद के बारे में अधिक जानने के लिए इसके औषधीय गुणों के बारे में जानना आवश्यक है | इसलिए यहाँ हम इसके औषधीय गुणों के बारे में बता रहें है |

पाषाणभेद के औषधीय गुण

अश्मभेदो हिमस्तिक्त: कषायो बस्ती शोधन:|
भेद्नो हन्ति दोषार्शोगुल्मकृछ्राश्मह्र्य्दुज ||
योनिरोगान प्रमेहान्स्च प्लीहशूलव्रणान च |

यह रस में कषाय एवं तिक्त, गुणों में लघु एवं स्निग्ध होती है | पाषाणभेद शीत वीर्य अर्थात ठंडी तासीर की होती है | पचने के पश्चात इसका विपाक कटु होता है | अपने इन्ही गुणों के कारण यह त्रिदोष शामक औषधि साबित होती है | मूत्रविरेचन एवं भेदन जैसे कर्मों से युक्त आयुर्वेदिक औषधीय द्रव्य है |

रोग्घ्नता – मूत्रकृछ, अश्मरी, गुल्म (आफरा), हृदय रोग, योनिगत रोग, प्रमेह, प्लीहा रोग, शूल (दर्द) एवं व्रण (घाव) आदि में उपयोगी औषधि है |

पाषाणभेद / Pashanbheda के फायदे

1 . शूल – दर्द होने पर इसके चूर्ण को गुनगुने पानी के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है | इस चूर्ण के साथ थोड़ी मात्रा में सैन्धव लवण मिलाकर सेवन किया जाए तो पेट दर्द जैसी समस्या दूर होती है |

2. गुल्म (वायु गोला) – पेट में गैस बनना या गुल्म अर्थात आफरा की शिकायत हो तो पाषाणभेद के पंचांग से निर्मित चूर्ण का प्रयोग करने से गुल्म की समस्या से राहत मिलती है |

3. मूत्रकृछ – पेशाब में जलन या रूकावट की समस्या में भी पाषाणभेद का सेवन फायदेमंद रहता है | इसके साथ गोखरू एवं सोंठ मिलाकर पाषाणभेद का क्वाथ बना लें | इसमें यवक्षार मिलाकर सेवन करें मूत्रकृछ में लाभ मिलेगा |

4. हृदय रोग – पाषाणभेदादी चूर्ण का सेवन करने से हृदय विकारों में अत्यंत लाभ मिलता है | पाषाणभेद के साथ अर्जुन क्वाथ का काढा बना कर सेवन करने से हृदय विकारों में लाभ मिलता है | यह रक्तवाहिनियों को खोलने का कार्य करती है |

5. योनीगत रोग – योनी रोगों में पाषाणभेद चूर्ण का सेवन फायदेमंद रहता है | सुजन एवं दाह में इसके क्वाथ या चूर्ण का सेवन उपयोगी सिद्ध होता है |

6. पत्थरी – अश्मरी की शिकायत में यह अत्यंत लाभदायक सिद्ध होता है | गुर्दे की पत्थरी एवं अन्य अश्मरी की शिकायत में इसके क्वाथ या चूर्ण का सेवन करने से पत्थरी कट कर बाहर निकल जाती है |

आयुर्वेद चिकित्सा में इसके सहयोग से पाषाणभेदादी घृत एवं पाषाणभेदादी चूर्ण आदि का इस्तेमाल किया जाता है |

सेवन का तरीका – चूर्ण का सेवन सुबह शाम 3 से 6 ग्राम तक किया जाना चाहिए | वहीँ इससे निर्मित क्वाथ (काढ़ा) का प्रयोग 50 से 100 मिली तक किया जाना चाहिए |

धन्यवाद

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