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अभ्रक भस्म आयुर्वेद की शास्त्रोक्त दवा है | इसका निर्माण विभिन्न आयुर्वेदिक कंपनियां जैसे – पतंजलि, बैद्यनाथ, श्री मोहता, डाबर आदि करती है | निर्माण विधि के रूप में यह तीन प्रकार की होती है – साधारण अभ्रक भस्म, शतपुटी (100 गजपुट) एवं सहस्रपुटी (1000 गजपुट) |

अभ्रक भस्म

यह दवा ज्वर, श्वास, कास, त्रिदोष (वात, पित एवं कफ की बढ़ोतरी), अग्निमंध्य (भूख न लगना), गृहणी, यकृत एवं प्लीहा के रोग, प्रमेह (सभी प्रकार के), एनीमिया एवं पुरुषों के रसायन कर्मनार्थ (पौरुष शक्ति ) आदि रोगों में प्रमुखता से उपयोग ली जाती है | शीघ्र स्खलन, नपुंसकता, कमजोर नशें, हृदय रोग, उन्माद (पागलपन) आदि रोगों में भी रोग एवं रोगी की स्थिति के आधार पर विभिन्न अनुपानों के साथ प्रयोग करवाई जाती है |

अभ्रक भस्म के गुण

यह स्वाद में कशैली, मधुर एवं गुणों में शीत वीर्य होती है | ठंडी तासीर की होने के कारण पुरुषों के यौन रोगों जैसे शीघ्रपतन जैसे रोगों में उपयोगी होती है , यह धातुओं को गाढ़ा करती है, रसायन कर्म में उपयुक्त है , आयु को बढाने वाली है एवं सभी प्रकार के दोषों का हरण करने वाली होती है | साधारण अभ्रक भस्म से शतपुटी एवं शतपुटी से सहस्रपुटी अभ्रक भस्म अधिक गुण कारी होती है |

अभ्रक भस्म की निर्माण विधि / बनाने की विधि

इसके निर्माण की आयुर्वेद में बहुत सी विधियाँ बताई गई है |यहाँ हम साधारण अभ्रक भस्म को बनाने की विधि के बारे में बताएँगे | सबसे पहले इसके निर्माण से पहले अभ्रक में पाई जाने वाली हानिकारक अशुद्धियों को दूर करना होता है | क्योंकि अभ्रक में कई प्रकार की अशुद्धियाँ होती है जो व्यक्ति के लिए मारक का काम करती है |

अशुद्धियाँ दूर करने के लिए सबसे पहले अभ्रक के तप्त पत्रों को गोदुग्ध, गोमूत्र, कान्जिक या त्रिफला क्वाथ में सात बार बुझाना होता है | सात बार तप्त पत्रों को बुझाने से अभ्रक शुद्ध हो जाता है | शुद्ध करने के बाद अभ्रक के बड़े – बड़े पत्र 1 भाग और धान्य चौथाई भाग लेकर कम्बल या किसी मोटे वस्त्र में बांध कर कांजिक में रखकर तीन दिन तक छोड़ दिया जाता है |

तीन दिन पश्चात इसे अच्छे से मसलते है जिससे रगड़ के कारण अभ्रक का सूक्षम चूर्ण कम्बल या वस्त्र के छिद्रों से बाहर निकलता है उसे निथारकर एकत्र कर लेते है | इसे धान्याभ्रक कहते है | इस धान्याभ्रक को चौलाई के स्वरस में तीन दिन तक सम्यक मर्दन करके चक्रिकाएं बना कर अच्छी तरह सुखा लिया जाता है | अब सराव सम्पुट में रखकर गजपुट में पका लें | स्वांगशीत होने पर सम्पुट को खोलकर चक्रिकाओं को पिसलें | अब इस प्रकार यह प्रक्रिया करके चौलाई के स्वरस, पुनर्नवा स्वरस एवं बड के कोंपल के स्वरस में तीन – तीन दिन मर्दन करके गजपुट में 10 पुट दिए जाते है | इस प्रकार से अभ्रक भस्म का निर्माण होता है |

मात्रा एवं सेवन विधि

125 से 250 मि.ग्रा. दिन में दो से तीन बार सेवन करनी चाहिए | इसका सेवन विभिन्न रोगों में मधु, घृत, मक्खन एवं दूध आदि के अनुपान के साथ लिया जाता है |

अभ्रक भस्म के फायदे या स्वास्थ्य उपयोग

  • यह आयुर्वेदिक दवा बलवर्द्धक एवं रसायन रूप में प्रतिष्ठित है | शारीरिक कमजोरी एवं पौरुष यौन कमजोरियों को दूर करने के लिए इसका सेवन करवाया जाता है |
  • शीघ्रपतन एवं नपुंसकता आदि रोगों में यह उपयोगी औषधि है |
  • यकृत एवं प्लीहा रोगों में फायदेमंद है |
  • ज्वर एवं जीर्ण ज्वर आदि की समस्या में अभ्रक भस्म का सेवन करवाया जाता है |
  • खांसी एवं दमे के रोग में मधु या पिप्पली के अनुपान के साथ प्रयोग करवाया जाता है |
  • यह औषधि पाचन को सुधरती है अत: अग्निमंध्य जैसे रोगों में फायदेमंद है |
  • शरीर में धातुओं एवं रक्त का वर्द्धन करती है |
  • अभ्रक भस्म में मुख्य रूप से लौह तत्व होता है , इसलिए यह पांडू रोग (Anemia) में फायदेमंद है |
  • गृहणी रोगों में लाभदायी है |
  • सभी प्रकार के प्रमेह में प्रयोग करवाई जाती है |
  • सन्निपातज (वात, पित एवं कफ तीनो दोषों के कुपित होने) की स्थिति में भी इसका आमयिक प्रयोग करवाया जाता है |
  • हृदय दुर्बलता एवं मानसिक विकारों में लाभप्रद है |
  • यह अत्यंत ठन्डे तासीर की है अत: उष्णता से उत्पन्न रोगों में प्रयोग करवाई जा सकती है |
  • यौन कमजोरियों को दूर करके कामेच्छा में बढ़ोतरी करती है |
  • टीबी, कुष्ठ एवं गृहणी रोगों में लाभदायक औषधि है |
  • आयुर्वेद चिकित्सा में इसे अन्य औषधियों के साथ प्रयोग करवाई जाती है | क्योंकि अपने योगवाही गुणों के कारण अन्य औषधियों के साथ सेवन करवाने से या अधिक फायदेमंद सिद्ध होती है |

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धन्यवाद |

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