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दालचीनी (Cinnamon in Hindi) – भारतीय रसोई में भोजन का स्वाद एवं रूचि बढ़ाने के लिए दालचीनी का उपयोग प्रमुखता से किया जाता है | लेकिन दालचीनी को एक मसाला ही मानना गलत होगा क्योंकि, आयुर्वेद चिकित्सा में पुराने समय से ही दालचीनी का उपयोग रोगों के चिकित्सार्थ किया जाता रहा है |

दालचीनी

दक्षिणी पूर्वी एशिया के समुद्री टापुओं पर इसके वृक्ष उगते है | जावा, सुमात्रा, कोचीन, केरल एवं मालाबार के तटों पर दालचीनी के वृक्ष होते है | इनकी बनावट तज के वृक्ष के सामान होती है | इन पेड़ों की के तनों पर कई पतले – पतले स्तर लिपटे रहते है जिनसे ही दालचीनी को प्राप्त किया जाता है | इन छालों को उतार कर सुखा लिया जाता है | जिसका उपयोग चिकित्सार्थ एवं मसाले के रूप में किया जाता है |

इसका पौधा सदाहरित रहने वाला होता है जिसकी पतियाँ गोलाकार एवं आगे से कुछ लम्बी होती है | तेजपत्र के पतों के आकार की एवं चमकीली होती है | फुल भूरे एवं रेशम की तरह कोमल होते है जो आगे चलकर नील या लाल रंग के करोंदे के समान फलों में परिवर्तित हो जाते है |

दालचीनी (Dalchini) के औषधीय गुण धर्म 

इसका रस मधुर होता है | गुणों में यह लघु, दीपन, पाचन, उष्ण, शुक्रल एवं बल्य होती है | दालचीनी की तासीर गरम होती है अर्थात इसका वीर्य उष्ण होता है | पचने के बाद विपाक कटु हो जाता है |

अगर साधारण शब्दों में कहा जाए तो यह मधुर, कड़वी, चरपरी, सुगन्धित, वीर्यवर्द्धक, त्वचा के वर्ण को निखारनेवाली तथा वात, पित्त, मुख का सुखना एवं तृष्णा का शमन करने वाली होती है |

रोगप्रभाव एवं आयुर्वेदिक विशिष्ट योग

यह वात एवं पित्त का शमन करने वाली होती है | इसका उपयोग मुखशोष, तृषा, छर्दी (उल्टी) एवं अरुचि में किया जाता है | दालचीनी के तेल का प्रयोग कफ एवं वात का शमन करने वाले नुस्खों में किया जाता है | आयुर्वेद में विभिन्न औषधियों के निर्माण में दालचीनी का सहयोग लिया जाता है | आसव एवं अरिष्ट के निर्माण में यह प्रक्षेप द्रव्य के रूप में प्रयोग की जाती है | कई प्रकार की स्नेह कल्पनाओं में भी इसका प्रयोग किया जाता है | आयुर्वेदिक चूर्ण जैसे – सितोपलादि चूर्ण, तलिशादी चूर्ण के निर्माण में भी इसका प्रयोग सहायक द्रव्य के रूप में किया जाता है | च्यवनप्राश एवं कई प्रकार के अव्लेहों में भी दालचीनी को प्रक्षेप द्रव्य के रूप में डाला जाता है |

आयुर्वेद में इसकी छाल या छाल से निर्मित तेल का औषध उपयोग किया जाता है |

दालचीनी के स्वास्थ्य उपयोग या लाभ 

इसका उपयोग हमेशां सिमित मात्रा में किया जाता है |  इसके तेल को कफ एवं वातशमन के लिए प्रयोग में लेते है | यह कई प्रकार की होती है | जो सबसे अधिक मीठी होती है वह पितशामक होती है | यह अपने उष्ण एवं तीक्ष्ण गुणों के कारण वृक्कों, स्नायविक संस्थान और ह्रदय को उतेजित करती है | संकोचक और वाजीकारक होने से स्त्री एवं पुरुषों के यौनांगो के लिए उत्तम होती है | चिकित्सार्थ मुखशोष, अधिक प्यास लगना, बार उल्टी होना एवं भोजन में अरुचि के लिए प्रयोग की जाती है |

दालचीनी के घरेलु प्रयोग से होंगे फायदे 

  • दस्त – दस्तों की समस्या में दालचीनी का चूर्ण करले एवं इसमें समान मात्रा में कत्था मिलाकर पानी के साथ सुबह्फ़ एवं शाम दो समय प्रयोग करें | इससे अपच के कारण होने वाले दस्तो में फायदा मिलता है |
  • अजीर्ण – दालचीनी, सौंठ और इलायची का चूर्ण आधा – आधा ग्राम मिलाकर भोजन से पहले फांक लेने से अजीर्ण मिटता है एवं भोजन में रूचि बढती है +|
  • तुतलाना – दालचीनी का छोटा सा टुकड़ा मुंह में रख कर चूसने से तुतलाने छुटकारा मिलसकता है |
  • खांसी – माजूफल एवं दालचीनी का महीन चूर्ण करले | इन दोनों को समान मात्रा में मिलकर सुबह एवं शाम गले के अन्दर के कौवे पर लगायें और लार को थूकते रहें | जल्द ही गले के अन्दर का कौवा बढ़ने से हुई खांसी में आराम मिलेगा |
  • सर्दी के कारण होने वाला सिरदर्द – अगर सिरदर्द सर्दी के कारण हो रहा है तो बाजार से दालचीनी का तेल ले आयें यह लम्बे समय तक काम आता है | इस तेल की 1 या दो बूंदों से कपाल पर मालिश करने से जल्द ही सिरदर्द ठीक हो जाता है |
  • पुरुषों – वीर्य की कमी में दालचीनी को महीन पिसलें | इस चूर्ण को 3 ग्राम की मात्रा में रात में सोते समय दूध के साथ प्रयोग करें | वीर्य की व्रद्धी होगी |
  • कैंसर नियंत्रण – दालचीनी एवं शहद को मिलाकर कुच्छ दिनों के लिए सेवन किया जाये तो यह कैंसर के खतरे को कम करता है |
  • त्वचा के विकारों में दालचीनी के साथ शहद को मिलाकर त्वचा पर लगाने से त्वचा के संक्रमण से छुटकारा मिलता है |

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धन्यवाद |

 

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