तालिसादी चूर्ण की निर्माण विधि एवं इसके फायदे

तालिसादी चूर्ण / Talisadi Churna 

आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में चूर्ण कल्पना का विशिष्ट स्थान है | तालिसादी चूर्ण का उपयोग रोचन और पाचन जैसे गुणों के कारण श्वास, कास, ज्वर, छर्दी, अतिसार एवं दीपन पाचन में उपयोग किया जाता है | इसका निर्माण तालिसपत्र एवं अन्य 7 द्रव्यों के मिलाने से होता है | अस्थमा , सुखी खांसी, कफ की अधिकता, प्रतिश्याय एवं भूख न लगना जैसी समस्याओं में इसका उपयोग करने से जल्द ही इन रोगों में लाभ मिलता है |

तालिसादी चूर्ण

तालिसादी चूर्ण के घटक द्रव्य एवं निर्माण विधि 

इसका मुख्य द्रव्य तालिसपत्र होता है | इसी के आधार पर इसे तालिसादी चूर्ण कहते है | इसके निर्माण में निम्न द्रव्य काम में आते है –

1. तालिसपत्र   –  12 ग्राम


2. मरिच (कालीमिर्च) – 24 ग्राम


3. शुण्ठी – 36 ग्राम


4. पिप्पली – 48 ग्राम


5. वंशलोचन – 60 ग्राम


6. एला (इलाइची) – 6 ग्राम


7. त्वक – 6 ग्राम


शर्करा – 384 ग्राम

निर्माण की विधि – सबसे उपर बताये गए सभी औषध द्रव्यों को उनकी मात्रा में ले आये | अब इन्हें प्रथक – प्रथक पीसले और इनका महीन चूर्ण बना ले | इन सभी चूर्ण को आपस में मिलाले | यह तालिसादी चूर्ण तैयार है | इसकी वटी अर्थात गुटिका भी बनायीं जा सकती है | वटी बनाने के लिए इन चूर्णों को शर्करा के साथ पाक करना पड़ता है उसके बाद इनकी गुटिका बना सकते है |

सेवन की मात्रा 

तालिसादी चूर्ण का इस्तेमाल 2 से 4 ग्राम की मात्रा में शहद के अनुपान के साथ करना चाहिए | इस चूर्ण के कोई भी साइड इफेक्ट्स नहीं है अत: इसे आसानी से प्रयोग किया जा सकता है | बच्चों में यह मात्रा आधा कर देनी चाहिए |

तालिसादी चूर्ण के फायदे एवं स्वास्थ्य उपयोग 

  1. अस्थमा रोग में आयुर्वेदिक चिकत्सक तालिसादी चूर्ण के प्रयोग का कहते है | अस्थमा रोग में दिन में दो बार या अपने चिकित्सक के परामर्शनुसार सेवन करना चाहिए |
  2. जीर्ण ज्वर या कफज ज्वर में भी इसका प्रयोग किया जाता है |
  3. बुखार, अतिसार और उल्टी में तालिसादी चूर्ण का प्रयोग किया जा सकता है |
  4. प्लीहा रोग एवं गृहणी रोग में भी तालिसादी चूर्ण का सेवन लाभदायक होता है |
  5. कास, श्वास रोग, छर्दी और पांडू रोग में इसका प्रयोग किया जाता है |
  6. कफ विकार के कारण पाचन बिगड़ा हुआ हो तो भी इसका  इस्तेमाल बताया जाता है |

तालिसादी चूर्ण के साइड इफेक्ट्स 

अगर इस चूर्ण को निर्देशित मात्रा में सेवन किया जाए तो इसके कोई भी दुष्प्रभाव नहीं है | वैसे स्वास्थ्य की द्रष्टि से इसके कोई भी साइड इफेक्ट्स नहीं है | कभी – कभार अधिक मात्रा में सेवन करने से सीने में जलन जैसी समस्या हो सकती है |

 

Related Post

गोमुखासन – गोमुखासन करने की विधि , प्रकार और... गोमुखासन  गोमुखासन का अर्थ है गाय के मुख के समान आकृति वाला आसन। इस आसन में गाय के मुहं के समान एक सिरे पर पतला और दूसरे सिरे पर चैड़ा जैसी आकृति बनान...
बला (खरैटी) / Sida Cordifolia – खरैटी के गुण... बला (खरैटी) / Sidda Cordifolia in Hindi परिचय - प्राय: सम्पूर्ण भारत में पायी जाने वाली औषधीय उपयोगी वनस्पति है | इसका झाड़ीनुमा क्षुप होता है जो 2 से...
लोध्र (लोध) औषधि परिचय, गुण धर्म एवं स्वास्थ्य उपय... लोध्र (लोध) क्या है - यह एक आयुर्वेदिक औषध द्रव्य है जिसका उपयोग अनेक आयुर्वेदिक दवाओं में किया जाता है | उत्तरी एवं पूर्वी भारत के राज्य जैसे आसाम, ब...
त्रिभुवनकीर्ति रस (Tribhuvan Kirti Ras) – के... त्रिभुवनकीर्ति रस / Tribhuvan Kirti Ras In Hindi  आयुर्वेद रस रसायनों में वर्णित यह औषधि सभी प्रकार के तरुण ज्वर, वात एवं कफ प्रधान ज्वर आदि में प्रय...
Content Protection by DMCA.com

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.