जटामांसी (Jatamansi) के औषधीय गुण एवं फायदे – मानसिक दुर्बलता में लाभकारी औषधि

जटामांसी / Nardostachys jatamansi

हिमालयी पहाड़ों पर 11 हजार से 17 हजार फुट की ऊंचाई पर अपने आप (स्वयंजात) पौधा है | इसे बालछड भी कहते है | मानसिक दुर्बलता या रूकावट एवं सभी प्रकार के मानसिक विकारों के लिए आयुर्वेद में इसकी बहुत प्रशंसा की गई है | जटामांसी को अगर एयरटाइट डिब्बे में बंद रखा जाए तो 1 साल तक इसके गुणों में परिवर्तन नहीं आता |

जटामांसी

इसका क्षुप 1 से 1.5 फीट तक लम्बा होता है | इसके पते 15 सेमी. तक लम्बे होते है एवं फुल कुच्छ हल्के गुलाबी एवं नील वर्ण के होते है, ये गुच्छों में लगते है | इसके पत्र भी गुच्छो में लगे रहते है | आयुर्वेद में जटामांसी की जड़ों का इस्तेमाल किया जाता है | इसकी जड़ कुच्छ कठिन और जड़ के अंत में रोम सद्र्श होते है , साथ ही इसका तना भुसर्पी होने के कारण रोमों से युक्त रहता है |

जटामांसी के औषधीय गुण धर्म 

यह स्वाद में तिक्त, कषाय और मधुर रस की होती है | गुणों में यह लघु, तीक्षण और स्निग्ध होती है | इसका वीर्य शीत होता है अर्थात यह ठंडी प्रकृति की होती है | पाचन के बाद इसका विपाक कटू होता है | मानसिक विकारों में इसके रोग प्रभाव सबसे अधिक होते है | यह स्मरण शक्ति को बढाने , मिर्गी जैसे रोगों को दूर करने एवं त्वचा पर कान्ति प्रदान करने में भी फायदेमंद होती है |

जटामांसी बलवर्द्धक, दाह, कुष्ठ, दीपन, पाचन, बल्य, रक्ताभिसरक, उत्तेजक, मूत्रल, मृदु विरेचक, संज्ञा स्थापक एवं त्रिदोषों का शमन करने वाली होती है | बालों के स्वास्थ्य , वेद्नाहर, हृदय को बल प्रदान करने, सौम्यता पैदा करनेवाली, पाचन क्रिया सुधरने वाली, भूख बढाने वाली, कब्ज तोड़ने वाली, मिर्गी, अपस्मार एवं आक्षेप रक्त व्याधियों में भी यह लाभकारी होती है |

इसका उपयोग स्नायविक एव मानसिक दुर्बलता को दूर करने में अधिक किया जाता है | अगर इसका सेवन अल्प मात्रा में लम्बे समय तक सेवन किया जाए तो मन की चंचलता के साथ साथ एकाग्रता भी बढती है | शरीर को स्फूर्ति देने व काम में उत्साह के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है | इसका सेवन 1 से 2 ग्राम तक चूर्ण के रूप में प्रयोग करना चाहिए एवं इसके बने काढ़े को 10 ML तक लिया जा सकता है | Patanjali की फार्मेसी में भी जटामांसी का चूर्ण बनाया जाता है |

जटामांसी के फायदे एवं विभिन्न रोगों में घरेलु प्रयोग 

विभिन्न रोगों में जटामांसी के लाभ हम यहाँ निचे बता रहे है | भले ही सभी प्रयोग डॉ राजीव शर्मा द्वारा लिखे गए एवं परीक्षित है , लेकिन फिर भी इनका उपयोग करने से पहले अपने वैध्य से परामर्श जरुर ले क्योंकि हर एक व्यक्ति की प्राकृत भिन्न होती है एवं औषधियां भी भिन्न प्रकृति के लोगों पर भिन्न प्रकार से कार्य करती है | यहाँ लिखी गई जानकारी महज आपके ज्ञान वर्द्धन के लिए है |

हिस्टीरिया व मासिक धर्म की समस्या में 

जटामांसी की जड़ 20 ग्राम और बच 10 ग्राम – दोनों का कूट पीसकर चूर्ण बना ले | इस चूर्ण का सेवन सुबह – शाम शहद के साथ करने से कुछ दिनों में हिस्टीरिया रोग ठीक होने लगता है , साथ ही इस चूर्ण के प्रयोग से मासिक धर्म की समस्या में भी लाभ मिलता है | मासिक धर्म में होने वाली रूकावट या अवरोध से पीड़ित को लाभ मिलता है |

मानसिक उदासीनता 

जटामांसी 40 ग्राम, हिंग 20 ग्राम और लौह भस्म 10 ग्राम – इन तीनो को बारीक़ पीसकर आपस में मिलालें | अब इस चूर्ण की दो – दो रति की गोलिया बना ले | सुबह – शाम 1 या 2 गोली पानी के साथ लेने से यह सब विकार दूर होने लगते है | मानसिक उदासीनता के साथ अगर कब्ज भी रहता हो तो गर्म दूध के साथ आधा चम्मच बादाम का तेल या स्वादिष्ट विरेचक चूर्ण का एक चम्मच लेना चाहिए | इससे कब्ज भी टूटेगी और मानसिक उदासीनता भी दूर होगी |

जीर्ण ज्वर 

अगर जीर्ण ज्वर के साथ प्रदाह भी हो तो जटामांसी के सेवन से रक्ताभिसरण की क्रिया सुधरती है एवं वात संसथान ठीक होता है | इससे ज्वर में होने वाली दाह या जलन में लाभ मिलता है |

घाव होने पर 

जटामांसी के तेल को घाव पर लगाने से घाव जल्दी ठीक होने लगता है एवं घाव पर आई सुजन भी उतरने लगती है | साथ ही जलन होना भी रुकता है |

मासिक-धर्म के समय दर्द होना 

आजकल की महिलाओं में मासिक धर्म के समय दर्द होना एक आम बात सी हो गई है | ऐसे में इन महिलाओं को  जटामांसी के अर्क का सेवन करने से मासिक स्राव के समय होने वाले दर्द से छुटकारा दिलाता है | मोनोपोज में आई महिलाओं के लिए भी जटामांसी के अर्का सेवन लाभ देता है |

मधुमेह 

मधुमेह रोग मेटाबोलिज्म की प्रक्रिया के बिगड़ने के कारण होता है | इससे पीड़ित रोगियों के पेशाब में सुगर आने लगती है | अत: ऐसे में मधुमेह से पीड़ितों को अगर जटामांसी की जड़ का सेवन करवाया जाए तो उनके मूत्र में आने वाली शुगर आना बंद हो जाती है |

रक्त विकृति में जटामांसी का उपयोग 

रक्त विकारों में रक्त के विकार को दूर करने के लिए जटामांसी 10 ग्राम और मंजिष्ठ 20 ग्राम लेकर दोनों को दरदरा कूट ले | अब एस क्वाथ को 125 ml पानी में तब तक उबाले जब तक पानी आधा न रह जाए | अब इसे ठंडा करके दो भागों में बाँट ले | इसका सेवन भूखे पेट सुबह – शाम दो समय करने से कुच्छ दिनों में रक्त विकार दूर हो जाते है |

विकृत रक्ताभीसरण में जटामांसी के लाभ

रक्ताभिसरण की अनियमितता के कारण मस्तिष्क में रक्त का दबाव बढ़ता है , जिससे सिर में भारीपन, व्याकुलता और घबराहट आदि लक्षण प्रकट होने लगते है | चक्कर आना, मूर्च्छा छाना और सिरदर्द भी इसमें प्रकट होते है | इस व्याधि को दूर करने के लिए नियमित रूप से 2 – 2 ग्राम जटामांसी के चूर्ण का सेवन करना चाहिए | नियमित सेवन से हृदय को भी लाभ मिलता है हृदय की रक्त वाहिनियाँ , वात नाड़ियाँ ठीक होने लगती है |

वातज उदरशूल 

उदर में वायु का प्रकोप होने से हृदय में स्थिलता आती है , धड़कन कमजोर होती है एवं उदरशूल होने लगता है | इस समस्या में जटामांसी के साथ नौसादर और इलायची इन तीनो को पीसकर चूर्ण बना ले | इस चूर्ण का इस्तेमाल शहद के साथ करे | जल्द ही उदरशूल ठीक होगा एवं पाचन भी बढेगा |

किसी भी प्रकार के सवाल के लिए आप निचे कमेंट बॉक्स में कमेंट कर के पूछ सकते है | यथाशीघ्र जानकारी उपलब्ध करवाई जायेगी | 

धन्यवाद |

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