वचा / बच (Acorus Calamus) – वच के फायदे पढ़ ले कभी भी काम आ सकते है |

वचा / बच / Acorus Calamus

यह नम जमीन में बारहों महीने पैदा होने वाला पौधा होता है | यह मूल रूप से मध्य एशिया और यूरोप का पौधा है | भारत में प्राचीन समय से ही बच का प्रयोग औषध रूप में होता आया है | हमारे देश में यह मणिपुर , उत्तर प्रदेश और नागालैंड आदि राज्यों में बहुतायत से पाई जाती है | वचा के गुल्म प्राय साढ़े चार से छ: फीट तक ऊँचे हो सकते है |

वचा / बच के फायदे
वचा के फायदे

इसके पत्र लम्बे , गोल ईख के सामान होते है | इस पौधे पर फुल नहीं लगते एवं पुरे पौधे में एक विशिष्ट प्रकार की गंध आती रहती है | वचा की मूल ही औषध उपयोगी होती है | इसकी जड़ शाखा – प्रशाखा एवं कई पतले रेशों वाली होती है | जड़ से एक तीव्र गंध आती रहती है इसलिए इसे उघ्रगंध भी कहते है | वचा दो प्रकार की होती है –

  1. घोड़ा बच
  2. बाल बच

वचा का रासायनिक संगठन

इसकी जड़ में असारिल , एर्डीहाईड , एकोरिन , केफीन , केलामाइन आदि तत्व पाए जाते है | इसके अलावा इसमें स्टार्च , गौंद और एक प्रकार का कैसला द्रव्य होता है |

वचा के गुण धर्म

बच का रस तिक्त और कटु होता है | यह उष्ण , दीपन और पाचन गुणों से युक्त होती है | बच उष्ण वीर्य की होती है अर्थात यह गरम प्रकर्ति की होती है इसलिए कफज रोगों में काफी लाभदायक होती है | बच के पचने के बाद इसका विपाक कटु ही होता है | यह वात एवं कफ विकारों में फायदेमंद होती है | बच का इस्तेमाल आयुर्वेद में अपस्मार , उन्माद , कृमि , स्मरण शक्ति आदि रोगों में किया जाता है |

प्रयोज्य अंग और सेवन की मात्रा

बच का भौमिक काण्ड अर्थात भूमि में दबा हुआ काण्ड और इसकी मूल ही औषध उपयोगी होती है | इसे 250 mg से 1 ग्राम तक इस्तेमाल किया जा सकता है | इसके इस्तेमाल से आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में वचा घृत और सारस्वत चूर्ण आदि का निर्माण किया जाता है |

वचा के विविध प्रयोग एवं सेवन से होने वाले फायदे

 

स्मरणशक्ति को  बढाने में वचा का उपयोग 

जिन छात्र – छात्राओं की स्मरण शक्ति कमजोर हो , पढ़ा – लिखा याद न रहता हो , दिमाग जल्दी थक जाता हो , वे आधा चम्मच वचा का महीन चूर्ण थोड़े से घी में मिलाकर सुबह और रात्री में सोते समय चाट कर ऊपर से गुनगुना मीठा दूध पी ले | इस प्रयोग को 2 से 3 महीने तक लगातार सेवन करने से जल्द ही स्मरण शक्ति बढ़ने लगेगी |

सिरदर्द में वचा के फायदे 

सिरदर्द में वचा का इस्तेमाल काफी फायदेमंद होता है | सिरदर्द होने पर वचा को पानी में चन्दन की तरह पत्थर पर घिस कर माथे पर लेप करने से सिरदर्द में लाभ प्राप्त होता है | दुसरे प्रयोग के तौर पर आप वचा के पंचांग (जड़ ,पत्र , तना ,फल आदि) का लेप बना कर मश्तक पर इस्तेमाल कर सकते है | यह प्रयोग भी सिरदर्द में काफी आराम देता है |

उदर कृमि में वचा का उपयोग 

पेट में कीड़े पड़ने पर आधा ग्राम भुनी हुई हिंग और 3 ग्राम बच का चूर्ण एक कप पानी के साथ 3 से 4 दिन तक इस्तेमाल करने से पेट के कीड़े मर कर बाहर निकल जाते है | इस चूर्ण का प्रयोग आप दिन में किसी भी समय कर सकते है |

सुखी खांसी में वचा का प्रयोग 

सुखी खांसी होने पर 25 ग्राम बच को जौ कूट करले , इसे एक गिलास पानी में डालकर अच्छी तरह उबाले और जब पानी आधा रह जाए तो इसे उतर कर ठंडा करले | इस पानी को छान कर दिन में 3 से 4 बार 20 ml की मात्रा में इस्तेमाल करने से सुखी खांसी ठीक हो जाती है | इस प्रयोग से खांसी के अलावा पेट का अफरा एवं पेट दर्द भी ठीक हो जाता है |

बवासीर में वचा के फायदे 

वर्तमान समय में बवासीर से बहुत से व्यक्ति ग्रषित रहते है | बवासीर एक अत्यंत पीड़ादाई रोग है | बच और अजवायन को बराबर मात्रा में मिलाकर आग पर डाले | जब धुंवा उठे तब गुदा में इस धुंवे की धुनी देने से बवासीर रोग में लाभ मिलता है | इस प्रयोग को निरंतर करने से बवासीर में काफी फायदा पंहुचता है |

बच्चो की खांसी 

नवजात बच्चो को खांसी होने पर , माँ अपने दूध में बच को घिसकर आधा चम्मच की मात्रा में दिन में दो या तीन बार बच्चे को पिलाने से जल्द ही नवजात की खांसी ठीक हो जाती है | अगर बच्चे को ज्वर हो तो वह भी इसके इस्तेमाल से उतर जाती है |

आधे सिर का दर्द 

आधे सिर में होने वाले दर्द को सामान्य भाषा में आधासीसी भी कहा जाता है | यह दर्द  सूर्य चढ़ने के साथ – साथ बढ़ता जाता है | इसलिए यह अत्यंत पीड़ादायी बन जाता है | आधासीसी में बच और पीपल को बराबर मात्रा में लेकर इसका महीन चूर्ण बना ले | इस चूर्ण की एक चुटकी मात्रा को सूंघने से आधे सिर का दर्द दूर हो जाता है |

अपस्मार (मिर्गी)

अपस्मार रोग में बच का महीन चूर्ण बना ले और इसे कपड़छान करके 1 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ सुबह – शाम चाटने से उन्माद और मिर्गी जैसे रोग का नाश होता है |

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सारस्वत चूर्ण का निर्माण करना 

सारस्वत चूर्ण का निर्माण करने के लिए ब्राह्मी , शंखपुष्पी और बच तीनो को समान मात्रा में लेकर इन सभी को महीन पीसकर चूर्ण बना ले | इस तैयार चूर्ण में ब्राह्मी रस की तीन भावना देकर अच्छी तरह सुखा ले | यह चूर्ण ही सारस्वत चूर्ण कहलाता है |

दिमागी बुखार , थकावट , कमजोरी , स्नायु दुर्बलता , स्मरण शक्ति की कमी और हक्लाना आदि रोगों में सारस्वत चूर्ण को 3 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ सुबह और शाम निरंतर 2 – 3  महीने  प्रयोग करने से इन रोगों का नाश होता है | शारीरिक स्थिलता और स्मरण शक्ति आदि रोगों को दूर करने के लिए सारस्वत चूर्ण बहुत ही फायदेमं साबित होता है |

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