नागरमोथा / Nagarmotha – नागरमोथा के फायदे

 

नागरमोथा /  Cyperus Scariousus

 
परिचय
नागरमोथा के क्षुप प्राय भारत के सभी राज्यों में पाए जाते है | ये अधिक पानी वाली जगहों पर आसानी से देखने को मिल जाते है | राजस्थान जैसे शुष्क प्रदेश में भी बरसात के मौसम में एवं जलाशयों और पोखर के किनारों पर यह घास अधिक देखने को मिलती है | वस्तुत: कृषक की द्रष्टि से देखा जाए तो नागरमोथा एक खरपतवार है जिसको नियंत्रित करने का पूर्ण रूप से कोई ठोस उपाय नहीं है | क्योकि नागरमोथा के क्षुप की मूल ग्रंथिनुमा होती है जो नागरमोथा के क्षुप से 3 से 4 इंच निचे जमीन में होती है | इस ग्रंथि की खासियत होती है की यह लम्बे समय तक सुरक्षित रहती है और अपने अनुकूल वातावरण होने पर फिर से पनप जाती है | इसलिए कृषि के लिए एक प्रकार की समस्या है |
 
नागरमोथा के फायदे
नागरमोथा का क्षुप एवं जड़
 
लेकिन अगर इसके गुणों को देखा जाए तो यह बहुत महत्वपूर्ण औषधि है जिसका उपयोग आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में प्राचीन समय से किया जाता रहा है | नागरमोथा के क्षुप 1 से 2 फीट तक ऊँचे हो सकते है , इसका कोई ठोस तना नहीं होता लेकिन यह पतली पतियों के जोड़ (डंडियों) से बड़ा होता रहता है | नागरमोथा की पतियाँ 6 इंच तक लम्बी और पतली होती है | इसके पुष्प मंजरियों के रूप में लगते है जो क्षुप के सबसे उपरी पतों के बीच में एक डंडी के सहारे लगते है , इनका रंग कुच्छ पिला होता है |
 
नागरमोथा की जड़ अधिक गहरी होती है | इसकी जड़ के निचे गहराई में एक कंद लगता है जो अंडाकार आकृति में काले या गहरे भूरे रंग का होता है | इस कंद के ऊपर कई रोएँ होते है एवं अंदर सुगन्धित मज्जा होती है जिसका उपयोग चिकित्सा और इत्र आदि के निर्माण में किया जाता है |
 
नागरमोथा का रासायनिक संगठन 
 
नागरमोथा की जड़ की ग्रंथि में एक प्रकार का उड़नशील तेल पाया जाता है , इसके अलावा इसमें एल्बुमिन , वसा , शर्करा एवं एंटीसेप्टिक तत्व पाए जाते है |
 
नागरमोथा के गुण – धर्म एवं रोगप्रभाव 
 
नागरमोथा का रस तिक्त , कषाय और कटु होता है | यह लघु एवं रुक्ष गुणों से युक्त होता है | इसका वीर्य शीत और पचने पर विपाक कटु होता है | शीत वीर्य होने के कारण पित्तशामक और रुक्ष होने के कारण कफशामक होता है | इसके अलावा तृषादाहशमन , रक्तशोधक , मूत्रल, कृमी नाशक , स्तन्य शोधन और विषघ्न होता है |
 
नागरमोथा का प्रयोज्य अंग एवं सेवन की मात्रा 
 
नागरमोथा की जड़ की ग्रंथि औषध उपयोगी होती है | इसका सेवन  1  से 3 ग्राम की मात्रा तक किया जा सकता है |
 
विशिष्ट योग – धान्यपंचक क्वाथ , मुश्तादी क्वाथ और षडंगपानीय क्वाथ आदि |
 

नागरमोथा के फायदे एव घरेलु प्रयोग 

1  . प्रसूता स्त्री के स्तन्य विकारो में नागरमोथा के फायदे 
 
नागरमोथा को पीसकर स्त्री के स्तनों पर लेप करने से प्रसूता के स्तनों की कठोरता और गांठे ठीक हो जाती है एवं इसको अच्छी तरह पीसकर 5 ग्राम की मात्रा में  दूध के साथ मिलाकर प्रसूता को पिलाने से स्तनों में दूध की वृद्धि होती है | इसके अलावा नागरमोथा को पानी में घिसकर भी पिलाया जा सकता है |
2. उदर कृमियों में नागरमोथा का उपयोग 
 
पेट में अगर कीड़े हो  तो 1 ग्राम की मात्रा में नागरमोथा का चूर्ण नित्य पानी के साथ पिने से जल्द ही पेट के कीड़े मर जाते है |
 
अगर पेट में कीड़ो के साथ साथ  दर्द भी रहता हो तो नागरमोथा के चूर्ण , अजवायन , कालीमिर्च और भुना हुआ जीरा और वायविडंग – इन सभी को बराबर की मात्रा में लेकर चूर्ण बना ले | अब इस चूर्ण से दुगुनी मात्रा में इसमें सेंधा नमक मिलाकर रखले | तैयार चूर्ण से 3 ग्राम की मात्रा में छाछ के साथ सेवन करने से पेट के कीड़े मर जाते है एवं पेट दर्द भी नहीं होता | यह नुस्खा आपके पाचन को भी ठीक करेगा |
 
3. खांसी 
 
खांसी होने पर नागरमोथा , अतिस , कर्कटश्रंगी और पिप्पली – इन सभी को बराबर मात्रा में लेकर कूट कर चूर्ण बना ले | इस चूर्ण को शहद के साथ चाटने से जल्द ही खांसी में आराम मिलता है |
 
4. अतिसार ( दस्त ) में नगमोथा के फायदे 
 
दस्त होने पर नागरमोथा , आंवला , अदरक इन सभी को 10 – 10 ग्राम की मात्रा में ले और इसमें 30 ग्राम सौंठ मिलाकर चूर्ण बना ले | इसका प्रयोग करने से दस्त बंद हो जाते है एवं प्लीहा के रोगों में भी फायदा पहुँचता है |
 
 नागरमोथा और बेलगिरी का चूर्ण सामान मात्रा में पानी के साथ सेवन करने से भी अतिसार रुक जाते है |
 
5. अनियमित मासिक धर्म में नागरमोथा का उपयोग 
 
जिन महिलाओं का मासिक धर्म रुक रुक के आता हो अर्थात अनियमित मासिक धर्म होता हो तो वे नागरमोथा के चूर्ण में गुड मिलाकर गोलियां बना ले | नित्य सुबह – शाम एक गोली का सेवन करने से अनियमित मासिक धर्म की समस्या से छुटकारा मिलता है |
 
6. प्रमेह 
 
प्रमेह के रोगियों के लिए भी नागरमोथा उपयोगी होता है | प्रमेह में नागरमोथा , दारूहल्दी ,देवदारु और त्रिफला को बराबर की मात्रा में लेकर कूट कर काढ़ा बना ले | इस काढ़े का सेवन करने से प्रमेह में काफी लाभ मिलता है |
7. गठिया रोग में नागरमोथा का प्रयोग 
 
गठिया रोगी को नागरमोथा और गोखरू का चूर्ण समान मात्रा में लेकर मिलकर चूर्ण बनाके सेवन करवाने से गठिया के रोग में लाभ मिलता है |
 
8. बुखार में नागरमोथा के फायदे 
 
बुखार में नागरमोथा के साथ समान मात्रा में गिलोय को मिलाकर काढ़ा बना कर  पिने से जल्दी राहत मिलती है |
 
नागरमोथा , पितपापड़ा , चन्दन, खस और सौंठ को सामान मात्रा में लेकर – इनका काढ़ा बना कर सेवन करने से जल्दी ही ज्वर उतर जाता है |
9. शोथ एवं दर्द में नागरमोथा का उपयोग 
 
जिस जगह पर सुजन हो वंहा नागरमोथा को पीसकर लगाने से सुजन जल्द ही ख़त्म हो  जाती है | अगर कहीं पर दर्द हो तो नागरमोथा , चन्दन और मुलहठी को पीसकर स्थानिक प्रयोग करने से दर्द से छुटकारा मिलता है |  अगर शरीर पर कहीं घाव हो जाए तो नागरमोथा को पीसकर इसमें दूध मिलाकर घाव पर लगाने से जल्दी ही घाव भरता है |
 
10. नागरमोथा मूत्रल होता है अत: इसके चूर्ण का सेवन छाछ के साथ करने से मूत्र में वृद्धि होती है |
 
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