शिरोधारा एक प्राकृतिक मैडिटेशन – जानें शिरोधारा करने की विधि |

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शिरोधारा / Shirodhara

updated on – 23/12/2019

शिरोधारा मुख्यतया धाराक्रम का एक भाग है, जिसे आयुर्वेद शास्त्रों में शिरोसेक के नाम से भी जाना जाता है | आयुर्वेद चिकित्सा में उर्ध्व्जत्रूगत (गर्दन से ऊपर ) रोगों में लाभ के लिए जब किसी औषध क्वाथ, तेल , घी या छाछ को सिर पर एक धारा के रूप में गिराया जाता है तो उसे शिरोधारा कहते है |

https://swadeshiupchar.in/2017/05/benefits-of-shirodhara.html

शिरोधारा में आपके सिर के अग्र भाग यानी दोनों आँखों के एयेब्रो के बीच में  औषधीय द्रव्यों की एक पतली गुनगुनी धारा प्रवाहित की जाती है जिसके कारण आपको असीम शांति का अनुभव होता है , यह आपके केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र पर असर डालती है और आपको मैडिटेशन का अनुभव करवाती है |

सिरदर्द , माइग्रेन , असमय बालो का गिरना या पकना ( सफ़ेद होना ), तनावग्रस्त, आँखों के रोग ,अनिद्रा, मानसिक रोग जैसे – भूलने की बीमारी , पागलपन, कमजोर याददास्त आदि रोगों में शिरोधारा बहुत अच्छा प्रभाव डालती है | शिरोधारा करवाते समय आप मैडिटेशन का अनुभव करेंगे जो आपको तनावमुक्त रखता है |

आधुनिक चिकित्सा विज्ञानं अनुसार अगर देंखे तो शिरोधारा के दौरान जो तेल या औषध द्रव्य आपके मष्तिष्क पर एक निश्चित ऊंचाई ( 4 अंगुल ऊपर ) से गिराए जाते है वो आपके मस्तिष्क में दबाव और कम्पन पैदा करते है , शिरोधारा में द्रव्य मस्तिष्क के अग्र भाग  में गिराया जाता है इस जगह खोखले सायनस से यह कम्पन और अधिक तीव्र हो जाता है | अब अधिक तीव्र कम्पन प्रमस्तिष्क द्रव (Cerebrospinal fluid) के माध्यम से शरीर के अन्दर तक प्रवाहित हो जाते है | यह कम्पन और दबाव थेलेमस और प्रमस्तिष्क के अग्र भाग को सक्रीय करते है , जिससे सेरेटोनिन्न और केथेकोलामाइन की मात्रा को संतुलित होती है जो हमें गहरी नींद में ले जाती है और हमारा शरीर असीम शांति और स्वस्थता महसूस करता है |

शिरोधारा में उपयोग होने वाले औषध द्रव्यों के आधार पर शिरोधरा के चार प्रकार है |

1. तक्रधारा – शिरोधारा में जब चिकित्सकीय प्रक्रिया के लिए विशेष विधि से निर्मित औषधयुक्त तक्र ( छाछ) का इस्तेमाल किया जाता है तो यह तक्रधारा कहलाती है | इसका प्रयोग मोटापा, बालो की समस्याओ में , रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए, सिरदर्द और त्रिदोषज रोगों में किया जाता है |

2. तेलधारा – शिरोधारा के इस प्रकार में किसी विशेष रोग के लिए औषध युक्त तेल प्रयोग में लिया जाता है जिसकारण इसे तैलधारा कहते है |

3. क्षीरधारा – क्षीर दूध को कहते है | क्षीरधारा को  बलामूल, शतावरी मूल और दूध से बनाया जाता है | इसका इस्तेमाल उन्माद, अपस्मार,अनिद्रा और दाह रोगों में किया जाता है |

4. जलधारा – औषधि युक्त गुनगुने जल से जब शिरोधारा की जाती है तो यह जलधारा कहलाती है |

शिरोधारा कैसे करें ?

सबसे पहले शिरोधारा के उपयुक्त रोगी को सांत्वना देकर उसके सिर और शरीर पर मालिश की जाती है | अब उसके सिर पर कपडे की लम्बी पट्टी को बांधा जाता है ताकि धारा आँखों के बोहों के बीच से न निकल पाए |

अब रोगी को शिरोधारा टेबल (द्रोणी) पर लेटातें है और औषध द्रव्य का परिक्षण करते है | शिरोधारा में काम आने वाला औषध द्रव्य अधिक गर्म एवं अधिक ठंडा नहीं होना चाहिए | धारा पात्र में द्रव्य को डालकर रोगी के मष्तिष्क से चार अंगुल ऊपर से धारा गिराई जाती है | इस प्रकार से शिरोधारा की जाती है |

शिरोधारा के लाभ / Shirodhara Benefits

1. सिरदर्द में लाभकारी
2. तंत्रिका तंत्र को मजबूत बनाती है |
3. अनिद्रा के रोग का शमन |
4. बालो के झड़ने और पकने से रोकती है |
5. रोगप्रतिरोधक क्षमता बढती है
6. रक्तचाप को सामान्य करती है
7. तनावमुक्त मस्तिष्क
8.याददास्त और एकाग्रता में वृद्धि होती है
9.त्वचा मुलायम और चिकनी होती है
10. जरा को हरने वाली अर्थात बुढ़ापा देर से आता है
11. शरीर के शुक्र और धातुओ को पुष्ट करती है
12. दिमाग शांत होता है एवं शरीर मजबूत बनता है
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