🩺वातरक्त रोग क्या है? स्थान, कारण, लक्षण एवं आयुर्वेदिक दवा (Gout in Hindi)

वातरक्त ➯वात यानि वायु और रक्त इन दोनों के दूषित होने से उत्पन्न होने वाला एक रोग है जो अधिकतर पैर के अंगूठे से या उंगलियों से प्रारंभ होकर ऊपर गुल्फ और जानू की सन्धियों में फैल जाता है। हाथ, पैरों में झनझनाहट, सूनापन और संन्धिस्थलों में दर्द होना इस रोग का प्रमुख लक्षण है।

जी हां ,आज हम इस लेख में आयुर्वेद में वातरक्त के नाम से जानने वाले रोग के बारे में विस्तार से जानकारी देंगे जिसे आधुनिक भाषा में गाउट के नाम से जाना जाता है।

इस रोग का वातव्याधि से निकट का रिश्ता है अर्थात शरीर में अत्यधिक वात (वायु) बढऩे से वह पूरे शरीर में दर्द उत्पन करती हैं और रक्त को दूषित कर देती है जिससे वातरक्त रोग हो जाता है।

वातरक्त क्या है

आधुनिक चिकित्सा अनुसार यह रक्त में यूरिक एसिड की मात्रा अधिक बढ़ने के कारण होता है | यूरिक अम्ल की बढ़ी हुई मात्रा क्रिस्टल के रूप में जोड़ो पर, संधि स्थानों पर एवं कंडरा के आसपास जमा हो जाती है जो तीव्र संधिशूल (जोड़ो में दर्द) का कारण बनती है | जिसे Gout या acute inflammatory arthritis के नाम से जानते है |

लेकिन इस लेख में हम आयुर्वेद अनुसार वातरक्त की जानकारी आपको उपलब्ध करवाएंगे –

वात रक्त यानी गाउट । शरीर में दूषित वायु दवारा रक्त को दूषित करने से होने वाला एक रोग है। जिसमें वात और रक्त दोनों दूषित हो जाते हैं तथा अपनी मात्रा से अधिक बढ़ जाते हैं। बढे हुए दूषित रक्त के द्वारा वायु का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है और रुकी हुई वायु पुनः संपूर्ण शरीर में जाकर रक्त को दूषित कर देती है तब वात रक्त होता है।

वात प्रकोप कारणों के सेवन तथा विदाही भोजन का सेवन करने वाले व्यक्ति के भोजन का विदग्ध परिपाक संपूर्ण रक्त को दूषित कर देता है। वह दुष्ट रक्त खिसक कर नीचे पैरों में इकट्ठा हो जाता है और प्रकुपित वायु से मिलकर वात रक्त को उत्पन्न करता है।

वातरक्त कहाँ होता है ❓

यह रोग विशेषकर छोटी संधियों में होता है। सामान्य भाषा में जाने तो दूषित रक्त पैरों में इकट्ठा हो जाता है जिसके कारण अधिकतर पैर के अंगूठे और उंगलियों से प्रारंभ होकर ऊपर जानू संधि में फैल जाता है। उसी प्रकार हाथ की अंगुली और अंगूठे से शुरू होकर ऊपर कंधे तक पहुंच जाता हैं। संधियों में होने के कारण यह रोग शरीर के किसी भी हिस्से अर्थात संधि या जोङ में हो सकता है।

वातरक्त क्या है और कहां होता है यह जानने के बाद अब हम यह जानेंगे कि यह किन-किन कारणों से होता है तो चलिए जानते हैं-

वातरक्त किन- किन कारणों से होता है ❓

वातरक्त रोग में साथ ही वात और रक्त दोनों का प्रकोप होता है तथा इस रोग में कुछ कारण वातप्रकोप और कुछ कारण रक्तप्रकोप के होते हैं। जैसे

  • गरम, तीखे और रुक्ष आहार से वात का प्रकोप होता है।
  • अल्प भोजन और अनशन से शरीर में वात बढ़ता है।
  • ऊंट और घोड़े की अधिक सवारी करने से शरीर में वायु का प्रकोप होता है।
  • अधिक कूदना और पानी में तैरना भी शरीर में वायु को बढ़ावा देते हैं।
  • गर्मी के मौसम में अधिक पैदल चलना भी शरीर में वायु बढ़ाते हैं।
  • अतिमैथुन, वेगधारण करना और रात्रि जागरण करना यह भी वायु को बढ़ाने वाले होते हैं।
  • लवण ,अम्ल ओर चिकने आहार से शरीर में रक्त का प्रकोप होता है।
  • अत्यधिक मांस का सेवन करने से शरीर में रक्त बढ़ता है।
  • दही ,कांजी ,सिरका और छाछ का अधिक सेवन शरीर में रक्त का प्रकोप करता है।
  • विरुद्ध आहार का सेवन और अजीर्ण होने पर भी भोजन करने से शरीर में रक्त दूषित हो जाता है।
  • व्यायाम न करना और आरामदायक स्वभाव के कारण शरीर में रक्त और वायु बढ़ जाते हैं।
  • मिथ्या आहार-विहार, अधिक मिठाई खाना, और मोटापे के कारण वातरक्त रोग हो जाता है।
  • किसी तरह की चोट लगना या शरीर का कभी भी शोधन न करने से रक्त दूषित हो जाता है जिससे वातरक्त रोग उत्पन्न होता है।

वातरक्त के लक्षण | VatRakta Symptoms in Hindi🤒

👉सिराओं में तनाव, दर्द, फङकन और सूई चुभने जैसा दर्द, शरीर में रूक्षता का घटना – बढ़ना, धमनी- अंगुली एंव सन्धियों में संकोच, अंगों में जकङन, अतिपीङा, खिंचाव और शीतल आहार – विहार हार से द्वेष होता है। ये वातादि दोष प्रधान वातरक्त के लक्षण हैं।

👉पित्त प्रधान वात रक्त में जलन, दर्द, मूर्छा, पसीना अधिक आना, प्यास अधिक लगना, भ्रम, लालिमा, ज्वर, शरीर का टूटना और गर्मी का अत्यधिक अनुभव होना आदि पित्तज प्रधान वात रक्त के लक्षण हैं।

👉रक्त प्रधान वात रक्त में खुजली ,कलेदयुक्त सूजन, दर्द और त्वचा का रंग तांबे के रंग जैसा हो जाता है।

👉कफप्रधान वातरक्त में शरीर गीले कपड़े से ढका हुआ जैसा अनुभव होना, शरीर में भारीपन, चिकनापन, शरीर में सूनापन और मन्द वेदना आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं।

वात रक्त पांच प्रकार का होता है। किन्ही दो दोषों से द्वन्द्वज और तीनों दोषों के मिलने से त्रिदोषज वातरक्त होता है। जिस दोष की प्रधानता होगी उसे उसी दोष के नाम से जाना जाता है। इनमें दोषों के अनुसार ही लक्षण मिलते हैं।

वातरक्त की सामान्य चिकित्सा🩺

  • हरीतकी चूर्ण 3 ग्राम को 3 ग्राम गुड़ के साथ सुबह-शाम दें।
  • जीवनीयगण के कल्क से तथा दूध से घी पकाकर मालिश करनी चाहिए।
  • मोम, मंजीठ, राल और अनंत मूल के कल्क तथा दूध से सिद्ध पिंडतेल का अभ्यंग करें।
  • गुरुच का स्वरस ,कल्क या क्वाथ दो-तीन महीने तक लगातार पीना लाभदायक होता है।
  • अमलतास का गूदा, गुरुच और अरुस प्रत्येक को 10:10 ग्राम लेकर क्वाथ बनाकर 15 ग्राम एरंड तेल डालकर सुबह शाम – पीना वातरक्त का शमन करता है।
  • पीपल की छाल 10 ग्राम लेकर क्वाथ बनाकर सुबह-शाम शहद के साथ पीना लाभदायक रहता है।
  • शुद्ध शिलाजीत आधा ग्राम की मात्रा में गुडूची क्वाथ के साथ सुबह – शाम पीना चाहिए।
  • गोरखमुंडी का चूर्ण 5 ग्राम, 10 ग्राम घी और 20 ग्राम शहद से सुबह – शाम लेना चाहिए।
  • तिल को भुनकर, गाय के दूध के साथ पीसकर लेप करना चाहिए।
  • भेड़ के दूध या घी (घृत) का लेप करें या राल चूर्ण को घी के साथ मिलाकर वातरक्त ग्रसित स्थान पर लेप करना चाहिए।
  • गुडूची तैल, मरिचादि तैल, महापिण्ड तैल, सुकुमार तैल, मधुपण्यादि तैल आदि से वात रक्त ग्रसित स्थान पर मालिश करनी चाहिए।

आयुर्वेद के अनुसार वातरक्त व्याधि में रोगी का पूर्ण रूप से पंचकर्म करना चाहिए जिससे दूषित रक्त शरीर से बाहर निकल जाए या जलौका से रक्तमोक्षण करवाना चाहिए।

वातरक्त की आयुर्वेदिक दवाएं | Ayurvedic Medicine of Gout💊

सामान्य चिकित्सा के साथ-साथ बड़े हुए वातरक्त को नियंत्रण में लाने के लिए रोगी को औषध का भी प्रयोग करना चाहिए। जिससे जल्द ही लाभ मिले तो चलिए जानते हैं वातरक्त की आयुर्वेद अनुसार कौन-कौन सी औषधियां काम में ली जाती है।

  • महामंजिष्ठादि क्वाथ वातरक्त रोग की बहुत प्रसिद्ध औषध है।
  • पटोलादि क्वाथ, लघु मंजिष्ठादि क्वाथ और हरीतकी क्वाथ को दिन में दो बार 10-10 ml की मात्रा में लेना चाहिए।
  • महासुदर्शन चूर्ण, भृंगराज चूर्ण और निम्बादि चूर्ण वातरक्त की उत्तम चूर्ण योग है।
  • अमृता गुग्गुलु ,कैशोर गुग्गुलु और गोक्षुरादि गुग्गुलु का प्रयोग करना चाहिए।
  • घृत – जीवनीय घृत, अमृतादि घृत या गुडूची घृत का प्रयोग करे।
  • आसवारिष्ट- खदिरारिष्ट, मंजिष्ठारिष्ट, सारिवाधरिष्ट और चन्दनासव का प्रयोग करना चाहिए।
  • वातरक्तान्तक रस, विश्वेश्वर रस, महातालेश्वर रस, सर्वेश्वर रस और पितान्तक लौह का आवश्यकतानुसार प्रयोग करना चाहिए।

वातरक्त की चिकित्सा और औषध के बारे में जानने के बाद पथ्य और अपथ्य के बारे में जानना भी जरूरी होता है। यदि औषध और चिकित्सा के साथ पथ्य – अपथ्य का भी ध्यान रखा जाए तो रोगी जल्द ही स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करता है।

वातरक्त में क्या खाना चाहिए✅ और क्या नहीं?❎

पथ्य (खाना चाहिए): पुराना चावल, जौ, गेहूं, मूंग, मसूर, करेला, परवल, बथुआ, आंवला, मुनक्का, किसमिस, मक्खन, घृत, गाय- बकरी – भैंस का दूध, चना- गेहूं की रोटी और दूध उत्तम पथ्य है वात रक्त रोग में।

अपथ्य (नहीं खाना चाहिए): उड़द ,कुलथी, सेम, तिल, दही, अमल – लवण- कटु रस वाले द्रव्य, क्षारीय पदार्थ, गरम और विदाही अर्थात जलन उत्पन करने वाले पदार्थ अपथ्य है वातरक्त रोग में। क्योंकि ये सब शरीर में वायु को बढ़ाते हैं जिससे बड़ी हुई वायु दूषित होकर शरीर में रक्त को भी दूषित कर देती है।

धन्यवाद

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