कज्जली क्या है? – बनाने की विधि एवं उपयोग | Kajjali in Hindi

आज हम यहां आपको आयुर्वेद की एक क्लासिकल मेडिसन के बारे में बताएंगे। यदि आप आयुर्वेद के विधार्थी हैं या आयुर्वेद को जानते हैं तो आपने कज्जली के बारे में अवश्य सुना होगा। तो इस लेख में कज्जली क्या है, कज्जली बनाने की विधि और कज्जली का उपयोग किन-किन रोगों में होता है इसकी विस्तार से जानकारी देंगे तो चलिए जानते हैं

कज्जली क्या है? | Kajjali in Hindi

कजली आयुर्वेदिक कल्प है जिसका निर्माण गंधक एवं पारद को मर्दन करने से होता है। यह कृष्ण रंग की कीचड़ के सामान दिखाई देने वाली औषधि है। आप इसे इस प्रकार की समझ सकते हैं की गंधक पारद का मर्दन करने पर जो काजल के समान प्राप्त होता है उसे कजली कहते हैं | आयुर्वेद चिकित्सा में इसका प्रयोग औषधियों के गुण वर्द्धन एवं अन्य औषधियों के निर्माण के लिए किया जाता है |

कज्जली बनाने की विधि | Kajjali Preparation

कज्जली बनाने के लिए पारद के साथ गन्धक का संयोग आवश्यक है। गन्धक पारद के बराबर, आधा भाग गन्धक, द्विगुण, त्रिगुण, चतुर्गण, षडगुण, अष्ट गुण, षोडश गुण तथा बत्तीस गुण और चौसठ गुण गंधक देने की परंपरा है। शुद्ध पारद और शुद्ध गंधक को खरल में 3 से 4 दिन लगातार इतना घोटे अर्थात मर्दन करें की वह काजल के समान बारिक हो जाए और कृष्ण वर्ण का हो जाए उससे ही कजली कहते हैं।

गन्धक या रसो – उपरसों के साथ खरल में बिना किसी द्रव के ही मर्दन किया जाता है अर्थात घोटा जाता है। इस प्रकार घोटने के बाद काले रंग का कीचड़ के सामान जो प्राप्त होता है उसे कज्जली कहते हैं । कज्जली पारद की प्रथम मूर्च्छना है अतः गुण कर्म की दृष्टि से इसमें गन्धक की मात्रा कम या ज्यादा करने का विधान है।

कज्जली के उपयोग | Uses of Kajjali in Hindi

कज्जली क्या है और इससे बनाने की विधि के बारे में जानने के बाद अब हम कजली का प्रयोग किन- किन रोगों में किया जाता है उसके बारे में विस्तार से जानेंगे । कज्जली का प्रयोग किसी रोग में सीधे रूप में ना करके अन्य औषधियों की कार्य क्षमता बढ़ाने में किया जाता है। तो चलिए जानते हैं कज्जली के उपयोग के बारे में

  • औषधियों की कार्य क्षमता बढ़ाने में सहायता करती है।
  • दवा को सड़ने से बचाने के लिए कज्जली का प्रयोग किया जाता है।
  • कज्जली उत्तेजक गुणों से युक्त होती है इस कारण यह है ह्रदय को उत्तेजित करती है।
  • यह अन्य औषधियों के साथ मिलकर उनके गुणों में वृद्धि करती है।
  • कज्जली अकेली अनेक विकारों को दूर करने की क्षमता रखती है और इसमें भिन्न-भिन्न औषधियों के स्वरस की भावना देने से इसकी शामक शक्ति अर्थात रोगों को शमन करने की शक्ति और भी बढ़ जाती है।
  • कज्जली सप्त धातुओं को व्यवस्थित करके शरीर को पुष्ट बनाती है।
  • यह गले की गांठ पर सूजन आना, जुखाम, खांसी और गले में स्थित कफ आदि को पूरी तरह से शरीर से बाहर कर देती है।
  • यह स्त्रियों के समस्त प्रकार के प्रदर रोगों को दूर करती हैं।
  • छोटे बच्चों द्वारा खाए गए भोजन का ठीक प्रकार से पाचन न होना और अतिसार की स्थिति में कजली का प्रयोग करने से बहुत फायदा होता है।
  • कुछ रोगों में कज्जली का प्रयोग मुख द्वारा न करके बाहरी रूप से करने पर भी बहुत फायदा मिलता है। जैसे कज्जली को घी में मिलाकर मलहम बनाकर खाज, दाद, मस्तक के फोड़े फुंसी पर लेप की तरह लगाने में बहुत फायदा होता है।

Note: अधिकतर इस औषध कल्पना का प्रयोग औषधियों के गुण वर्द्धन एवं औषधियों के निर्माण में किया जाता है | इसे सामान्य खाने की औषधि के रूप में बिना चिकित्सकीय सलाह प्रयोग नहीं करना चाहिए | क्योंकि गंधक एवं पारद में मारक गुण विद्यमान होते है अत: आन्तरिक सेवन से बचे | बाहरी प्रयोग में दाद-खाज खुजली के लिए मलहम के रूप में अल्प मात्रा में प्रयोग किया जा सकता है |

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