गंगाधर चूर्ण के उपयोग एवं घटक | Gangadhar churna uses in hindi

गंगाधर चूर्ण आयुर्वेद की शास्त्रोक्त दवा है | इसका प्रयोग अतिसार, संग्रहणी एवं प्रवाहिका जैसे रोगों की रोकथाम के लिए किया जाता है | यह चूर्ण बिल्वादी चूर्ण की तरह ही IBS (Irritable bowel syndrome) के लिए उपयोग होने वाली के प्रमुख दवा है |

यह दवा अपने जीवाणु रोधी गुणों के कारण शरीर में उपस्थित सूक्ष्म जीवों एवं विषाक्त पदार्थों को शरिर से बाहर निकालने का कार्य करती है | साथ ही यह ग्राह्यी गुणों से युक्त होने के कारण दस्त को रोकने का कार्य भी करती है |

गंगाधर चूर्ण सभी प्रमुख आयुर्वेदिक दवा निर्माता कंपनियों द्वारा निर्मित की जाती है | बाजार में आपको यह पतंजलि गंगाधर चूर्ण, बैद्यनाथ गंगाधर रस या चूर्ण एवं धूतपापेश्वर आदि फार्मसी की आसानी से उपलब्ध हो जाती है | इस लेख में हम Gangadhar Churna uses in hindi की सम्पूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाएंगे |

तो चलिए सबसे पहले निम्न टेबल के माध्यम से इस दवा के बारे में थोड़ी जानकारी प्राप्त करते है |

  • Name of the Medicine (नाम) – Gangadhar Churna
  • Form (फॉर्म) – Powder
  • Type (टाइप) – Classical Ayurvedic
  • Used for (उपयोग) – IBS, Indigestion, Loss motion
  • Availability (उपलब्धता) – Store / Online Pharmacy
गंगाधर चूर्ण

गंगाधर चूर्ण के घटक द्रव्य | Ingredients of Gangadhar Churna in Hindi

  • नागरमोथा – 1 भाग
  • इंद्रजौ – 1 भाग
  • बेलगिरी – 1 भाग
  • पठानी लोध्र – 1 भाग
  • मोचरस – 1 भाग
  • धाय के फुल – 1 भाग

बनाने की विधि: गंगाधर चूर्ण में ये सभी घटक द्रव्य समान मात्रा में होते है अर्थात इसमें पड़ने वाली सभी जड़ी – बूटियां समान मात्रा में लेकर इनका महीन चूर्ण बना लिया जाता है | इस चूर्ण को महीन कपडे से छान कर इन सभी को मिलाकर सहेज कर रख लिया जाता है | इस प्रकार से तैयार चूर्ण गंगाधर चूर्ण कहलाता है | यह वृहद् से जड़ी – बूटियों के आधार पर भिन्न है |

गंगाधर चूर्ण के उपयोग | angadhar churna uses in hindi

इस आयुर्वेदिक चूर्ण के निम्न रोगों में उपयोग होते है | यहाँ हमने गंगाधर चूर्ण के विभिन्न रोगों में होने वाले फायदों एवं उपयोगो के बारे में बताया है |

ग्रहणी रोग (Irritable Bowel Syndrome): ग्रहणी रोग में आंते विशेष कर प्रभावित होती है | इसमें बार – बार मल त्याग की प्रवृति होती है | रोगी पीड़ित रहता है | यह रोग मुख्यत: कमजोर ग्रहणी अवयव एवं मन्दाग्नि के कारण होता है | इस रोग में गंगाधर चूर्ण का उपयोग करने से ग्रहणी अवयव की कार्यक्षमता बढती है एवं बार – बार लगने वाले दस्त रुकते है |

अतिसार (diarrhea): अतिसार भी एक पीड़ादायक स्थति है | इसमें रोगी को बार – बार लेट्रिन जाना पड़ता है | यह रोग वायरस के संक्रमण के कारण होता है | गंगाधर चूर्ण के उपयोग से अतिसार में लाभ मिलता है | क्योंकि इसमें ग्राह्यी गुण होते है जो दस्त रोकने एवं वायरस को खत्म करने का कार्य करते है |

पेचिस (Dysentery): यह भी पाचन संसथान की गड़बड़ी से जुड़ा एक दूसरा रोग है जिसमे बार – बार दस्त लगते है | दस्त बिलकुल पतले लगते हैं एवं पता भी नहीं चलता | अत: इस रोग में भी गंगाधर चूर्ण Clinical uses पेचिस को रोकने का कार्य करता है | लम्बे समय से चली आ रही समस्या में भी यह लाभदायक है |

पाचन विकार (Digestive Problems): Gangadhar Churna में नागरमोथा, इंद्रजौ, मोचरस एवं लोध्र जैसे घटक द्रव्य है जो ख़राब पाचन को सुधार कर ठीक करने का कार्य करते है | अत: पाचन की गड़बड़ी में इस औषधीय चूर्ण का उपयोग करने से लाभ मिलता है |

भूख न लगना (Loss of Appetite): ख़राब पाचन, बदहजमी, अग्नि की कमी के कारण भूख मर जाती है | इस रोग में गंगाधर चूर्ण के साथ अविपत्तिकर एवं पाचन चूर्ण का उपयोग करने से लाभ मिलता है |

खुराक एवं सावधानियां

वैसे यह आयुर्वेदिक चूर्ण पूर्णत: सुरक्षित है | लेकिन निर्धारित खुराक एवं अनुपान अनुसार ही इसका सेवन करना चाहिए | इसकी सेवन की विधि में 2 से 4 ग्राम चूर्ण सुबह शाम ठन्डे जल या छाछ के साथ वैद्य सलाह अनुसार लेना चाहिए | सेवन के समय निर्धारित मात्रा से सम्बंधित सावधानियां रखनी चाहिए |

गंगाधर चूर्ण के कोई भी ज्ञात दुष्प्रभाव नहीं है | परन्तु किसी भी आयुर्वेदिक औषधि का सेवन वैद्य परामर्श अनुसार ही करना चाहिए | क्योंकि रोग एवं रोग की गंभीरता के आधार पर वैद्य आपके लिए औषधियों का निर्धारण करते है | अत: सेवन से पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह अवश्य लें |

गंगाधर चूर्ण के प्रकार

आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसके दो प्रकार बताये गए है | बाजार में यह दोनों प्रकार का प्राप्त हो जाता है गंगाधर चूर्ण वृहद् एवं लघु | दोनों प्रकार के गंगाधर चूर्ण में घटक द्रव्यों की थोड़ी भिन्नता होती है |

  1. गंगाधर चूर्ण वृहद्
  2. गंगाधर चूर्ण लघु

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