धारणीय – अधारणीय वेग क्या है ? 13 प्रकार के वेग जिन्हें नहीं रोकना चाहिए |

नमस्कार ! स्वदेशी उपचार में आपका स्वागत है | मित्रों आयुर्वेद में धारणीय एवं अधारणीय वेग का उल्लेख किया गया है | आज इस आर्टिकल में हम आपको इनकी परिभाषा एवं इनका वर्गीकरण बताएँगे कि कौनसे वेग है जिनको धारण करना चाहिए एवं कौनसे एसे वेग है जिनको धारण अर्थात रोकना आपको बहुत बीमार बना सकता है |

तो चलिए सबसे पहले जानते है कि वेग क्या होते है ? / What is Natural Urge

वेग आप उनको कह सकते हो जो शारीरिक एवं मानसिक संवेदनाए होती है जिनकी उत्पत्ति स्वाभाविक होती है | जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं इर्ष्या आदि स्थितियां मानसिक वेग है एवं मूत्र, मल, पसीना, जम्भाई, उल्टी एवं छींक आदि स्वाभाविक प्रकट होना शारीरिक वेग होते है |

अब आप वेग को समझ गए होंगे की सामान्य रूप से उत्पन्न होने वाली शारीरिक एवं मानसिक संवेदनाओं को वेग कहा जाता है | इनमे से मानसिक संवेदनाओं को रोका जा सकता है एवं इन्हें रोकना भी चाहिए लेकिन शारीरिक संवेदनाओं को रोकना मुश्किल होता है एवं इन्हें रोकना रोग का कारण भी बनता है |

अत: यहाँ हम आपको धारणीय एवं अधारणीय वेगों (Urges) की परिभाषा से भी अवगत करवाते है कि कौनसे वेग धारणीय है एवं कौनसे अधारणीय वेग है |

आधारणीय वेग

धारणीय वेग की परिभाषा : मानसिक संवेदनाएं जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, इर्ष्या, अहंकार, अभिद्या (दूसरों के धन की इच्छा) आदि वेग धारणीय वेग होते है क्योंकि इन मानसिक वेगों को रोकना हमारे लिए फायदेमंद रहता है | अत: आयुर्वेद में इन्हें धारणीय वेग कहा गया है अर्थात जिनका धारण किया जा सके या जिनको रोका जा सके |

अधारणीय वेग की परिभाषा : शारीरिक अवस्थाएं जैसे मूत्र आना, मल आना, अपानवायु (गैस), जम्भाई, उल्टी, छींक आदि को अधारणीय वेगों में गिना जाता है | क्योंकि इनको कभी भी रोकना नहीं चाहिए | इन्हें रोक कर व्यक्ति रोग की तरफ बढ़ता है अत: आयुर्वेद में इन्हें अधारणीय वेग कहा गया है | अर्थात जिनको धारण नहीं करना चाहिए | ये आयुर्वेद अनुसार 13 प्रकार के माने गए है |

धारणीय वेग / Dharniya vega in Hindi

ऊपर हमने धारणीय वेग की परिभाषा से आपको अवगत करवा दिया है | ये वे वेग होते है जिनको मनुष्य को नियंत्रण में रखना चाहिए | क्योंकि इनको नियंत्रण में रहने से समाज में आपकी इज्जत होती है | धारणीय वेग मनुष्य की मानसिक प्रवर्तिया होती है जिनको अगर नहीं रोका जाये तो मनुष्य का खुद का एवं समाज का नुकसान होता है |

ये वेग निम्न लिखित है –

  1. क्रोध : – इसको रोकना चाहिए क्योंकि क्रोध के कारण खुद का एवं सामने वाले व्यक्ति का नुकसान हो जाता है | अत: इस मानसिक स्थिति को नियंत्रण में रखना चाहिए | आयुर्वेद में इसे धारण करने योग्य ववेग माना है |
  2. लोभ / लालच :- लोभ एवं लालच को भी धारणीय वेगों में गिना जाता है | क्योंकि यह भी मानसिक परवर्ती है जिसे आसानी से रोका जा सकता है | इसे रोकना भी चाहिए क्योंकि लोभ लालच में आकर मनुष्य अपना विवेक खो देता है |
  3. इर्ष्या :- दूसरों की प्रगति से जलन होना इर्ष्या कहलाता है | यह धारणीय वेगों में आता है | अत: मनुष्य को अपनी इस मानसिक परवर्ती को रोकना जरुरी है | क्योंकि इर्ष्या स्वयं को जलाती है | दूसरों का इससे कोई नुकसान नहीं होता |
  4. अहंकार :- अहंकार सबसे बुरी मानसिक परवर्ती है | आयुर्वेद में इसे धारणीय वेगों में गिना है क्योंकि मनुष्य इसको आसानी से रोक सकता है एवं इसे रोकने से खुद का लाभ होता है | आपने कथा सुनी भी होगी की ‘मैं’ ने अर्थात अहंकार ने रावण को भी डुबो दिया था |
  5. काम :- अत्यधिक कामवाशना मनुष्य के लिए नुकसान दायक होती है | अत: इस वेग को भी रोकना चाहिए |

आधारणीय वेग / Adharniya Veg in Hindi

आयुर्वेद में आधारणीय वेगों की संख्या 13 बताई है | इनको कभी भी धारण नहीं करना चाहिए अर्थात अगर शरीर में इनका वेग बने तो इनसे जल्द ही निवर्त हो जाना ही फायदेमंद रहता है | क्योंकि इन वेगो को धारण करने से शरीर में रोग की स्थति उत्पन्न होती है | यहाँ हमने 13 प्रकार के वेगों के बारे में आपको संक्षिप्त में जानकारी दि है |

  1. मूत्र :- पेशाब के वेग को रोकने से पेडू और लिंगेद्रिय में दर्द होता है | मूत्र रुक – रुक कर एवं पीड़ा के साथ होता है | साथ ही सरदर्द एवं आफरा की शिकायत होती है | अत: इस वेग को कभी भी धारण अर्थात रोकना नहीं चाहिए |
  2. मल :- मल का वेग अधारणीय वेग है इसको कभी भी नहीं रोकना चाहिए | माधवाचार्य के अनुसार इसे रोकने से पेट में दर्द, गैस, आफरा, गुदा में काटने जैसी पीड़ा एवं कब्ज जैसे रोग हो सकते है |
  3. अधोवायु (गैस) :- गैस को रोकने से मल, मूत्र रुक जाते है | शरीर में अतिरिक्त वात की उपस्थिति हो जाती है | पेट में वायु के कारण दर्द रहता है | आफरा एवं गैस की समस्या बढ़ जातिक है | अत: अधोवायु (गुदा मार्ग से निकलने वाली वायु) को कभी भी धारण नहीं करना चाहिए |
  4. डकार :- डकार भी आधारणीय वेगों में आती है | इसको रोकने से कंठ एवं मुख का भारी होना, हिचकी, खांसी एवं अरुचि जैसे रोग हो सकते है | इसे धारण नहीं करना चाहिए |
  5. छींक :- छींक आने के वेग को रोकने से गर्दन के पीछे की मन्या नामक नस जकड़ जाती है, सिर में दर्द रहता है | मुंह टेढ़ा हो जाता है | इन्द्रियां दुर्बल हो जाती है | आधे शरीर में वात की व्रद्धी हो जाती है | अत: इसे भी रोकना रोगों को निमंत्रण देना है |
  6. वमन :- आयुर्वेद में उल्टी को वमन कहते है | अगर उल्टी की इच्छा हो तो इसे रोकना नहीं चाहिए स्वाभाविक आने वाली उल्टी को करना ही लाभप्रद रहता है | इसे रोकने से अजीर्ण, अरुचि, सुजन, पीलिया, विसर्प आदि रोग हो जाते है | स्वाभाविक आने वाली उल्टी अमाशय का शोधन करती है एवं वात – पित्त एवं कफ का शमन करती है | अत: इसे भी धारण नहीं करना चाहिए |
  7. शुक्र :- शुक्र के वेग को रोकने से मूत्राशय में सुजन, गुदा एवं अंडकोष में पीड़ा, पत्थरी जैसे रोग हो सकते है |
  8. भूख :- इस अधारणीय वेग को रोकने से तन्द्रा, आलस, शरीर टूटना, अरुचि, थकान तथा नजर कमजोर हो जाती है | शरीर में निर्बलता, कमजोरी एवं रोगों से लड़ने की शक्ति कम हो जाती है | अत: भूख लगते ही खाना खा लेना चाहिए |
  9. प्यास :- आयुर्वेद में प्यास को भी अधारणीय वेगों में गिना गया है | क्योंकि इसे रोकने से कंठ एवं मुंह सुख जाते है | हृदय में पीड़ा होती है, आचार्य चरक श्रम एवं श्वांस का होना भी बताते है |
  10. जम्भाई :- जम्भाई या उबासी को रोकने से गर्दन के पीछे की नस और गले का जकड़ जाना जैसी समस्या होती है | इसे रोकने से नासा रोग, नेत्र रोग, मुख रोग एवं कानों के रोग हो जाते है |
  11. आंसू :- आंसुओं के वेग को भी धारण नहीं करना चाहिए | आंसुओं को रोकने से दिमाग का भारीपन, आँखों के रोग, पीनस आदि रोग हो जाते है अत: इस अधारणीय वेग को भी धारण नहीं करना चाहिए |
  12. साँस :- इस स्थिति में रोगी को आराम देना चाहिए तथा बाड़ी का नाश करने वाली क्रियाये करवानी चाहिए |
  13. निद्रा :- निद्रा को रोकने से जम्भाई आना, अंग टूटना, नेत्रों व मस्तक का जड़ हो जाना आदि समस्याएँ हो जाती है | अत: नींद आये तो सो जाना चाहिए |

सामान्य सवाल – जवाब / FAQ

धारणीय वेग क्या है ?

जिन वेगों को धारण अर्थात रोका जा सकता है वह धारणीय वेग कहलाते है | जैसे – गुस्सा, इर्ष्या, अहंकार आदि

अधारणीय वेग क्या है ?

जिन वेगों को रोकने से शारीरिक नुकसान हो सकता है अर्थात जिन्हें नहीं रोकना चहिये वह अधारणीय वेग कहलाते है | जैसे – पेशाब, मल, उल्टी एवं जम्भाई आदि |

धारणीय वेग कितने प्रकार के है ?

इसमें मुख्यत: 7 प्रकार के वेग आते है | जैसे कामवासना, क्रोध, लोभ, मोह, इर्ष्या, द्वेष, अहंकार आदि

अधारणीय वेग कितने प्रकार के होते है ?

आयुर्वेद ग्रंथो में अधारणीय वेगों की संख्या 13 बताई है जिनका वर्णन हमने ऊपर इसी लेख में किया है |

क्या इनका पालन करना आवश्यक है ?

निश्चित रूप से आपको एवं हम सभी को इनका ध्यान रखना चाहिए |

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