Ayurvedic Medicine, जड़ी - बूटियां, मोटापा, स्वास्थ्य

गुग्गुल अनेक रोगों की अमूल्य औषधि || जानें गुग्गुल के फायदे एवं शोधन की विधि

वैदिक काल से ही गुग्गुल के बारे में वर्णन मिलता है | वैदिक काल में इसे धुप आदि करने एवं सुगन्धित द्रव्य के रूप में प्रमुखता से धार्मिक अनुष्ठानो में प्रयोग का वर्णन मिलता है | आयुर्वेदिक ग्रन्थ चरक संहिता में पेट की बिमारियों एवं वात व्याधियों में इसका उपयोग बताया गया है |

अगर आप गुग्गुल के बारे में अधिक नहीं जानते है तो इस आर्टिकल में हमने आपके लिए गुग्गुलु के बारे में सम्पूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाई है | गुग्गुल क्या है ; इसका पौधा कैसा होता है ; कहाँ होता; गुग्गुल कौन – कौन से रोगों में फायदेमंद है आदि |

वानस्पतिक परिचय

गुग्गुल क्या है जानने से पहले आप इसके गुग्गुल के पौधे के बारे में जानले | यह राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, आसाम आदि जगहों पर पाया जाता है | इसका पौधा 4 से ८ फीट तक ऊँचा होता है | यह झाड़ीनुमा वनस्पति है | जो अधिकतर उष्ण प्रदेशों में बारह महीने हरे रहते है |

पौधे की शाखाओं से एवं डंडियों पर से हमेशां भूरे रंग का पतला छिलका उतरता हुआ दिखाई देता है | इस छिलके के निचे की छाल का रंग हरा दिखाई पड़ता है | गुग्गुल के पते दलदार नीम के पतों के समान चिकने एवं चमकीले होते है |

गुग्गुल के छोटे और लाल रंग के फुल आते है | इसके फल चिकने और चमकदार होते है इनका रंग भूरा एवं लाल होता है |

गुग्गुल कैसे प्राप्त होता है / क्या है ?

यह कोई पेड़ पर लगने वाला फल आदि नहीं है | गुग्गुल के पौधे के निर्यास अर्थात गोंद को ही गुग्गुल कहा जाता है | इसे प्राप्त करने के लिए इस पौधे की छाल में घाव कर दिया जाता है |

इस घाव से के प्रकार का तैलीय, रालदार गोंद निकलता है जिसे गुग्गुल कहा जाता है | यह गाढ़ा, सुगन्धित, अनेकवर्ण वाला होता है | अग्नि में जलता है, धुप में पिघलता है तथा उष्णजल में डालने पर दूध जैसे रंग का हो जाता है |

गुग्गुल को कब इक्कठा किया जाता है ?

इसका संग्रह काल नवम्बर से जनवरी महीने तक होता है | गरमियों में सूर्य की किरणों से इसके वृक्ष से गोंद प्रचुर मात्रा में निकलता है | जब यह सर्दियों में जम जाता है तब इसको इक्कठा किया जाता है |

असली गुग्गुल का रंग नए रहने पर पीलापन लिए हुए रहता है | जब यह पुराना पड़ जाता है तब इसका रंग काला हो जाता है | असली गुग्गुल की एक और पहचान है – इसे तोड़ने पर यह टुकड़ो में टूट जाता है एवं पानी में डालने पर हरी झाई लिए हुए सफ़ेद रंग का हो जाता है |

गुग्गुल का पौधा
iamge – wikipedia.com

गुग्गुल के औषधीय गुण

गूगल कड़वा, उष्ण वीर्य, पित्त कारक, मृदु विरेचक, पाक में चरपरा, रुखा, हल्का , हड्डी को जोड़ने वाला वीर्य वर्द्धक, स्वर को सुधारने वाला उत्तम रसायन दीपक एवं कफ वात, व्रण, अजीर्ण, मेद वृद्धि, प्रमेह आदि में उपयोगी है |

यह बवासीर, गण्डमाला, कृमि रोग (कीड़े) को नष्ट करने वाला है | यह मीठा मधुर रसयुक्त होने से वात को नष्ट करने वाला, कसैला होने से पित्त को एवं कड़वा होने से कफ का नष्ट करता है |

इसलिए गूगल को त्रिदोष नाशक औषध द्रव्य माना जाता है |

गुग्गुल के विभिन्न भाषाओँ में पर्याय

हिंदी – गुग्गुल , गूगल |

संस्कृत – गुग्गुलु, कौशिक, कुम्भोलुख, देवधुप, देवेष्टा, कालनिर्यास, शिवा, वायुघन |

गुजराती – गूगल |

मराठी – गूगल, कणगूगल |

बंगाली – गुगूल |

तेलगु – महिषाक्षी |

लेटिन – Commiphora Mukul.

English – Indian Bedelium.

शब्द निरुक्ति / क्यों पुकारा जाता है ?

गुग्गुल – यह शरीर की वात रोगों से रक्षा करता है | शरीर की वात व्याधि से रक्षा करता है अत: इसे गुग्गुल पुकारा जाता है |

२. कुम्भोलुख – कुम्भ एवं उलूख जैसे पेड़ के कोशों से निकलता है अत: कुम्भोलुख कहा जाता है |

३. कौशिक – इसकी उत्पति कौशल देश में होती है अर्थात इसकी उत्पति वृक्ष के कोशों से होती है |

४. पुर: – रोगों को हटाने के लिए अगमनशील है |

६. पलंकषा – मोटापे का नाश करने वाला होने से अर्थात यह मांस का भी कृशन करता है |

७. महिषाक्ष – कृष्ण (काले) वर्ग से होने से इस नाम से पुकारा जाता है |

विभिन्न रोगों में गुग्गुल के फायदे या उपयोग

इसे आयुर्वेद की दिव्य औषधि कहा जाता है | आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसे गण्डमाला, वात व्याधि, वातरक्त, बवासीर, कफज विकार, गठिया, प्रमेह, अम्लपित एवं स्त्री समस्याओं में प्रमुखता से उपयोग में लिया जाता है |

वैदिक काल से ज्ञात जानकारी के अनुसार यक्ष्मा अर्थात टी.बी के रोग में इसके धूम्र (धुंए) से इलाज किया जाता था | इसके धुंए को टी.बी. के कीटाणु नष्ट करने में उत्तम बताया गया है | यहाँ से आप इसके विभिन्न रोगों में उपयोग की जानकारी प्राप्त कर सकते है |

घाव, शोफ़ एवं पेट के विकार

शोफ़ एवं उदर विकारों में गुग्गुल उपयोगी है | हरीतकी, गिलोय, पुनर्नवा, देवदारु एवं गुगुल के क्वाथ को शोफ़ एवं पेट के विकारों का शमन करता है | आयुर्वेद के अनुसार मेदो धातु के दौर्बल्य एवं शिरा की दुर्बलता के कारण शोफ़ उत्पन्न होता है |

घाव में इसको नारियल के तेल में घिसकर इसका लेप जैसा स्वरुप बना कर घाव पर प्रयोग करवाया जाता है | घाव जल्दी ही ठीक होने लगता है |

गण्डमाला

यह मेदोगत दोषों का पाचन करके, धातुओं का प्रसादन करता है | गण्डमाला में इसे पानी में घिसकर लेप बना कर गले पर दिन में २ से ३ बार लगाना चाहिए |

गण्डमाला के लिए इसका सेवन भी किया जा सकता है | १२५mg से २५०mg तक गुड़ के साथ मिलाकर सेवन किया जा सकता है |

मोटापे में गुग्गुल के फायदे

गुग्गुल त्रिदोषनाशक द्रव्य है | यह सभी धातुओं पर कार्य करता है | मेदोधातु पर इसका प्रभाव ओर अधिक देखने को मिलता है | यह इसका पाचन करके अपने रुक्ष गुणों के कारण अतिरिक्त चर्बी को ख़त्म करती है |

१ से २ ग्राम तक गुग्गुलु को पानी के साथ नियमित सेवन करने से मोटापे की समस्या में काफी राहत मिलती है |

प्रमेह रोग में

गुग्गुलु द्रवकफ एवं कंदु का नाश करता है और शैथिल्य नाशक है | अत: संतर्पण जन्य प्रमेह में गुगुल उपयोगी है |

आमवात / गठिया में गुग्गुल के फायदे

यह उष्ण वीर्य होता है अत: शरीर में आम का पाचन करता है | गठिया रोग में आम वृद्धि एक प्रमुख विशेषता होती है | जोड़ो के दर्द एवं सुजन में गुग्गुल का उपयोग फायदेमंद रहता है | गठिया रोग में गिलोय, सौंठ एवं गोखरू के साथ गुग्गुल से निर्मित क्वाथ का प्रयोग लाभदायक रहता है |

कृमि रोग में (कीड़ो की समस्या)

अगर कफज कृमि है तो गुग्गुल लाभदायक रहता है | कफ जन्य कीड़ो की समस्या में इसका उपयोग करवाया जाता है |

फेफड़ो के क्षय (टीबी) में यह एक उत्तेजक एवं कृमिनाशक के रूप में कार्य करता है | कफ के कीड़े इसके सेवन से नष्ट होते है | बुखार कम होती है एवं जीवनी शक्ति को बल मिलता है |

गुग्गुलु के अन्य रोगों में उपयोग

कुक्कर खांसी, सांस नाली की जलन, वायु नलियों की जलन एवं निमोनिया आदि में प्रत्येक 4 से 6 घंटे के अन्तराल से इसका सेवन करवाने से लाभ मिलता है |

गूगल धुप देने के लिए भी उपयोग में लिया जाता है | इसकी धुप देने मात्र से ही बुखार, नजला एवं श्वांस नलियों की जलन में राहत मिलती है |

महिलाओं में भी यह अत्यंत लाभ दायक है | यह स्त्रियों में गर्भाशय के उतेजित करता है और मासिक धर्म को नियमित कर देता है |

आयुर्वेद चिकित्सा में इसके इस्तेमाल से कई प्रशिद्ध योग का निर्माण किया जाता है अर्थात कई आयुर्वेदिक दवाओं का निर्माण किया जाता है |

जैसे – कैशोर गुग्गुल, महायोगराज गुग्गुलु, चन्द्रप्रभावटी, सिंहनाद गुग्गुल, त्रिफला गुग्गुलु आदि |

धन्यवाद |

About स्वदेशी उपचार

स्वदेशी उपचार आयुर्वेद को समर्पित वेब पोर्टल है | यहाँ हम आयुर्वेद से सम्बंधित शास्त्रोक्त जानकारियां आम लोगों तक पहुंचाते है | वेबसाइट में उपलब्ध प्रत्येक लेख एक्सपर्ट आयुर्वेदिक चिकित्सकों, फार्मासिस्ट (आयुर्वेदिक) एवं अन्य आयुर्वेद विशेषज्ञों द्वारा लिखा जाता है | हमारा मुख्य उद्देश्य आयुर्वेद के माध्यम से सेहत से जुडी सटीक जानकारी आप लोगों तक पहुँचाना है |

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.