जानें अनन्तमूल का वानस्पतिक परिचय – औषधीय गुण एवं फायदे

अनन्तमूल का वानस्पतिक परिचय – औषधीय गुण एवं फायदे 

सर्वत्र भारत वर्ष में पाई जाने वाली एक जंगली लता (बेल) है | विशेषकर बाँदा से अवध, अवध से सिक्कम तक एवं शिलोंग की पहाड़ियों में अधिक देखने को मिलती है |

वानस्पतिक परिचय – इसकी लताएँ गहरे लाल रंग की होती है | पते तीन – चार अंगुल लम्बे जामुन के पतों के समान दिखाई देते है | इन पतों पर सफ़ेद रंग की लकीरें होती है एवं पतों को तोड़ने पर उनमे से दूध निकलता है | अनन्तमूल के फुल छोटे और सफ़ेद रंग के होते है | इन पर फलियाँ लगती है और इनके फटने पर इनमे से रुई निकलती है |

अनन्तमूल
credit – wikipedia

अनन्तमूल के पौधे की जड़ लम्बी, गोल और टेढ़ी – मेढ़ी होती है | जड़ के ऊपर की छाल का रंग लाल होता है | इसकी जड़ में एक विशिष्ट सुगंध आती है जो इसकी पहचान का द्योतक है | अगर जड़ से सुगंध न आये तो उसे आयुर्वेद चिकित्सा में उपयोगी नहीं माना जाता | दरशल जड़ में एक प्रकार का उड़नशील द्रव्य होता है | यही द्रव्य इसे औषध उपयोगी बनाता है |

यह दो प्रकार की होती है, एक सफ़ेद और दूसरी काली | सफ़ेद को गौरिषर एवं काली को कालिसर कहते है |

अनन्तमूल के औषधीय गुण 

आयुर्वेद के अनुसार अनन्तमूल शीतल, मधुर, शुक्रजनक, भारी स्निग्ध, कड़वी, सुगन्धित तथा कोढ़, कंडू, ज्वर, देह की दुर्गन्ध, मन्दाग्नि, श्वांस, खांसी, अरुचि आम, त्रिदोष, विष, रुधिर विकार, प्रदर रोग, कफ, अतिसार, तृषा, दाह, रक्तपित एवं वात को हरने वाली होती है |

इसे मूत्रविरेचक, पसीना लानेवाली एवं बलकारक माना जाता है | आम्यिक प्रयोग में धातुपरिवार्तक, रक्तशोधक एवं चरम रोगों में प्रयोग किया जाता है | अनन्तमूल की फांट बना कर रोगी को देने से मूत्र की मात्रा 3 से 4 गुनी हो जाती है | अगर इसका उपयोग गिलोय के साथ मिलाकर किया जाए तो इसके गुण और अधिक बढ़ जाते है |

अनन्तमूल के फायदे या उपयोग 

  1. बालकों के लिए यह औषधि अमृत समान है | इसको वायविडंग के साथ देने से मरणउन्मुख बच्चे भी नवजीवन प्राप्त कर जाते है |
  2. अनन्तमूल के पतों को जलाकर राख करके उसको शहद के साथ आंजने से या इसकी जड़ को बासी पानी में घिसकर आंजने से आँख की फूली नष्ट हो जाती है |
  3. अनन्तमूल की जड़ को घिसकर चावल के धोवन के साथ पिलाने से या उसको आँख में आंजने से सर्पदंश में लाभ मिलता है |
  4. दुधेली के पते के रस में अनन्तमूल की जड़ का चूर्ण एक चावल के बराबर देने से सात दिन में बवासीर में लाभ होता है |
  5. खाँखरे के फुल का पानी बनाकर उस पानी में अनन्तमूल की जड़ के चूर्ण को मिलाकर देने से रुका हुआ पेशाब आने लगता है |
  6. इसकी जड़ के चूर्ण को गाय के दूध के साथ देने से पथरी और मूत्र की पीड़ा बंद हो जाती है |
  7. अनन्तमूल की शीतल क्वाथ दिन में तीन बार ढाई-ढाई तोला पिलाने से कंठमाला, फोड़े, फुंसी और उपदंश सम्बन्धी बिमारियों में फायदा मिलता है |
  8. जिन स्त्रियों को गर्मी की वजह से या और किसी कारण से गर्भपात होता हो या बालक जन्म लेते ही मर जाता हो, उस स्थिति में स्त्री के गर्भवती होते ही अनन्तमूल का शीतल कषाय देते रहने से गर्भपात होअना बंद हो जाता है | अत्यंत निरोगी, हष्ट-पुष्ट और गौरवर्ण बालक पैदा होता है | इसके पतों को पीसकर दांतों के नीचे दबाने से दन्तरोग दूर होता है |
  9. इसकी छोटी जड़ को केले के पते में लपेटकर आग में भुनकर जीरे और शक्कर के साथ पीसकर घी में मिलकर चटाने से वीर्य और मूत्र सम्बन्धी रोगों में लाभ मिलता है |
  10. चोपचीनी के साथ इसके चूर्ण को खाने से सिरदर्द में आराम मिलता है | अगर जड़ को घिसकर गरम करके माथे पर लेप किया जाए तो वह भी सिरदर्द में फायदेमंद होता है |
  11. घाव होने पर इसका लेप करने से लाभ मिलता है |

आलेख – प्रेमकुमार जी 

धन्यवाद ||

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