अंकोल वनस्पति – परिचय, औषधीय गुण एवं तेल निकालने की विधि

अंकोल / Alangium lamarckii

सम्पूर्ण आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति वनस्पतियों एवं प्राकृतिक संसाधनों पर टिकी है | अगर आप आयुर्वेद को जानना चाहते है तो आपके लिए सभी वनस्पतियों एवं औषध जड़ी – बूटियों का ज्ञान होना जरुरी है | क्योंकि वनस्पतियों के गुण एवं जड़ी – बूटियों की पहचान से ही व्रह्द्ध आयुर्वेद के कुछ हिस्से को सिखा जा सकता है | प्राचीन समय से ही ऋषि – मुनि इस बात का ख्याल रखते थे की उन्हें अधिक से अधिक वनस्पतिओं का ज्ञान हो एवं साथ ही नए पेड़ पौधों के गुणों को जाना एवं पहचाना जाए |

हमारा भी यही उद्देश्य है कि आम जनता एवं हमारे नियमित पाठकों को वनस्पतिओं के औषधीय गुणों एवं महत्व की जानकारी देते रहें | स्वदेशी उपचार पर आपको 150+ औषधीय पौधों की जानकारी विस्तृत रूप से मिल जायेगी | औषधि परिचय की इसी कड़ी में आज हम दुर्लभ अंकोल वनस्पति के बारे में लिखेंगे |

अंकोल
credit – wikimedia.com

परिचय – अंकोल आज के समय में अतिदुर्लभ वनस्पतिओं में गिना जाता है | इस पौधे की दो प्रजातियाँ है सफ़ेद और काला अंकोल | सफ़ेद अंकोल तो मिल जाता है , लेकिन काला अंकोल मुश्किल से मिल पाता है | पौधे की ऊंचाई 25 से 40 फीट तक होती है | तना 2’5 फीट से 3 फीट तक मोटाई लिए होता है | शाखाओं का रंग सफ़ेद होता है | अंकोल के पते ” कनेर” के पतों के सामान दिखाई पड़ते है | इनकी लम्बाई 2 से 5 इंच तक होती है एवं चौड़ाई आधा से डेढ़ इंच होती है | पतझड़ ऋतू में इनके पते झड़ जाते है एवं वैसाख के महीने में पौधे पर नए पते आते है |

अंकोल के पतों से तीव्र गंध आती है एवं ये स्वाद में कडवे होते है | पौधे के फल कच्ची अवस्था में नीले रंग के और पकने पर बैंगनी रंग के हो जाते है |

अंकोल के औषधीय गुण 

स्वाद में कड़वा, कषैला, चरपरा तीखा होता है | गुणों में लघु (हल्का) रुखा एवं चिकना होता है | अंकोल उष्ण वीर्य होता है अर्थात इसकी तासीर गरम होती है | यह पारे को शुद्ध करने वाला, दस्त लाने वाला, सभी प्रकार के विष को नष्ट करने वाला एवं कफ, वात का शमन करने वाला होता है | बिच्छु का दंश हो या सांप का दंश इसके सेवन से सभी प्रकार के विष उतर जाते है |

अंकोल शूल (दर्द), कृमि, सुजन, अम्लपित, रुधिर विकार को नष्ट करने वाला होता है | इसके बीज शीतल होते है एवं ये धातु और वीर्य का वर्द्धन करते है |

अंकोल बीज का तेल निकालने की विधि 

आयुर्वेद में तेल निकालने के लिए बहुत विधियाँ बताई गई है | अंकोल के बीजों का तेल निकालने के लिए पाताल यंत्र का इस्तेमाल किया जाता है | पाताल यंत्र का निर्माण करने के लिए सबसे पहले जमीन में एक हाथ गड्ढा खोदते है और इस गडे में भी एक दूसरा छोटा गड्डा खोदते है | अब अंकोल के बीजों को घड़े में रखकर ऊपर से जाली लगा देतें है ताकि घड़ा उल्टा करने पर भी बीज बाहर न निकलें | अब घड़े पर सछिद्र डक्कन रखकर कपडमिटटी से मुंह बंद कर देते है |

छोटे गड्डे में बर्तन रख कर ऊपर से घड़े के मुंह से ढँक कर पुरे गड्डे में मिट्टी भर देतें है | घड़े के पेंदे पर चार – पांच किलो कंडे रखकर आग लगा देते | स्वांगशीत होने पर मिटटी हटाकर घड़े के निचे रखे बर्तन से तेल प्राप्त कर लेते है |

अंकोल के फायदे या स्वास्थ्य उत्पाद 

यहाँ हमने अंकोल वृक्ष के स्वास्थ्य उपयोग को बताया है | इसका विभिन्न प्रकार से सेवन करने से बहुत से रोगों में लाभ मिलता है |

  • चूहे आदि के काट लेने पर अंकोल के वृक्ष की छाल को पानी में घीसकर दंश पर लगाने एवं पानी में पीसकर पिने से चूहे का जहर जल्द ही उतर जाता है | जहर के कारन हुई जलन से छुटकारा मिलता है |
  • इसकी लकड़ी को जलाकर राख बना ले | इस राख को नाशुर में भरने से नाशुर नष्ट हो जाता है |
  • बवासीर में जड़ की छाल को निकाल कर इसका चूर्ण बना ले | इस चूर्ण के साथ कालीमिर्च की फांकी देने से बवासिर में अच्छा परिणाम मिलता है |
  • मौसमी ज्वर में जड़ के चूर्ण को 1 से 2 ग्राम देने से ही मौसमी भुखर उतर जाती है |
  • भयंकर दमे के रोग में अंकोल की जड़ को निम्बू के रस में घोटकर सेवन करवाने से भयंकर से भयंकर दमा ठीक हो जाता है |
  • सांप के दंश लेने पर अंकोल की जड़ को दश तोला लेकर उसे कूटकर दो सेर पानी में उबालना चाहिए | जब एक चौथाई पानी बचे तब निचे उतर कर ठंडा करलें | इस क्वाथ में गाय का गरम घी मिलाकर पीने से सांप का जहर उतर जाता है | साथ ही नीम की अंतरछाल का चूर्ण मिलाकर आठ दिन तक पीना चाहिए |
  • पागल कुते को काटने पर सुदर्शन चूर्ण के साथ अंकोल की जड़ का चूर्ण सेवन करने से पागल कुते का जहर उतर जाता है |
  • अगर आपके चेहरे पर दाग हो तो बेसन में हल्दी मिलाकर अंकोल तेल से लेप बना लें | इस लेप का प्रयोग चेहरे पर करने से दाग चले जाते है | चेचक के दाग भी इसी प्रकार से मिटासकते है |
  • जड़ की चूर्ण का सेवन पाचन प्रक्रिया को ठीक करता है | इसके सेवन से जलोदर एवं अजीर्ण में आराम मिलता है |
  • सुजाक में फलों के गुदे को तिल के क्षार एवं शहद के साथ मिलाकर देने से आराम मिलता है |
  • धारधार हथियार से चोट लगने पर अंकोल के बीजों के तेल में रुई भिगों कर घाव पर पट्टी चढाने से खून आना बंद हो जाता है | घाव भी जल्दी भरता है | यह उपचार परीक्षित है | अन्य उपचारों से जहाँ महीने तक घाव नहीं भर पाता वहाँ इसके उपचार से जल्द ही घाव भर जाता है |

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