बच्चों के पेट में कीड़े की आयुर्वेदिक दवा – जानें इसके कारण, लक्षण एवं उपचार

बच्चों के पेट में कीड़े की आयुर्वेदिक दवा – जानें इसके कारण, लक्षण एवं उपचार

छोटे बच्चों को सबसे अधिक होने वाली शारीरिक समस्या है कृमिरोग | आयुर्वेद में ऐसे 20 प्रकार के कृमि (कीड़े) बताये गए है जो बच्चों एवं बड़ों को अक्सर परेशान करते है | बच्चों में यह सर्वाधिक होने वाला रोग है | क्योंकि छोटे बच्चे मिटटी में खेलना, मिट्टी खाना या संक्रमण के अधिक नजदीक रहते है अत: उन्हें पेट में कीड़ों की समस्या अधिक होती है |

पेट में कीड़ों के कोई प्रभावी लक्षण नहीं पहचाने जा सकते | लेकिन पेट में दर्द होना, बच्चों में भूख की कमी, उल्टी – दस्त, गुदा मार्ग के पास खुजली आदि की समस्या होने पर पेट में कीड़ों की सम्भावना माना जा सकता है | जब भी बच्चा पेट के कीड़ों की समस्या से ग्रषित होगा तो उसे भोजन से अरुचि होगी | पौष्टिक खाना खिलाने के बाद भी बच्चे की शारीरिक व्रद्धी रुक जाएगी | वह नियमित अन्तराल से पेट दर्द की शिकायत करेगा |

बच्चों के पेट में कीड़े की दवा
image credit – indiatoday.in

आयुर्वेद अनुसार कृमिरोग की निदान एवं संप्राप्ति (कैसे होता है ?)

आयुर्वेद के अनुसार बच्चों में पेट के कीड़े दो कारणों से होते है

  1. आहार जन्य
  2. विहार जन्य

1. आहार जन्य

  • मधुर एवं अम्ल पदार्थों का अत्यधिक सेवन
  • द्रव बहुल पदार्थों का सेवन
  • पिष्टमय पदार्थों का सेवन
  • मिष्टान्न (मीठे) पदार्थों का अधिक सेवन करने से
  • अजीर्ण की अवस्था में भी आहार ग्रहण करने से
  • मृतिकाभक्षण जन्य अर्थात मिट्टी खाने से |

2. विहार जन्य कारण

  • दिन में सोना
  • व्यायाम की कमी

संप्राप्ति (Pathogenesis)

श्लेष्मा की अधिकता के कारण अमाशय में उत्पन्न होने वाले कफज कृमि वृद्धि को प्राप्त होकर अमाशय में ऊपर एवं निचे घूमते है | इनमे से कुछ चमड़े की मोटी तंत के सामान होते है तथा कुछ केंचुए के सामान होते है एवं कुछ नए जन्मे छोटे आकार के होते है | आयुर्वेद के अनुसार इनका रंग श्वेत एवं तमाभ्र के समान होता है | आयुर्वेद में अन्त्राद्, उद्रावेष्ट, हृद्याद, महागुद, चुरू, दर्भकुशुम एवं सुगंध इस प्रकार से सात प्रकार के पेट के कीड़े माने है |

बच्चों में पेट के कीड़ों के लक्षण या लाक्षणिक चिन्ह

  • ज्वर (Fever)
  • विवर्णता (Discolouration of Skin)
  • उदरशूल / पेट दर्द  (Abdomen Pain)
  • वजन की कमी
  • भूख न लगना
  • हृदयरोग
  • अंगो में स्थिलता
  • भ्रम
  • भोजन में अरुचि
  • अतिसार (Diarrhoea)
  • छर्दी (उल्टी होना)
  • अजीर्ण
  • हाथ पैरों में सुजन
  • जननागों में सुजन
  • यकृत व्रद्धी
  • प्लीहावृद्धि
  • गंड शोथ
  • खून की कमी (एनीमिया)

पेट में कीड़ों के प्रकार

बच्चों में मुख्य रूप से 4 प्रकार के कीड़ों का प्रकोप अधिक होता है | यहाँ हमने इन सभी उदरकृमियों का संक्षिप्त वर्णन किया है |

1. अंकुशमुख कृमि

इस प्रकार के पेट के कीड़े ग्रामीण क्षेत्रों में या गंदगी वाले शहरी क्षेत्रों में यह बालकों में अधिक पायी जाती है | इन कृमियों का मुख अंकुश के समान होता है जिसकी सहायता से आंतो की भितियों से चिपके रहते है | प्रत्येक कृमि प्रतिदिन बालक की आँतों से 0.1 से 0.5 मिली रक्त को चुस्ती रहती है | इस व्याधि को Ancylostomiasis कहते है | मल परिक्षण में इनके अन्डो की उपस्थिति पायी जाती है | बालक के मल के साथ ये बहार निकलते है | इसके अंडे गीली मिट्टी में रहकर कुच्छ दिनों में लार्वा का रूप धारण कर लेते है | इस अवस्था में ये तीन – चार मास तक जीवित रह सकते है | बालक के नंगे पाँव रहने से ये त्वचा के अन्दर प्रविष्ट होकर लसिका संह्वन द्वारा हृदय के दक्षिण निलय में पहुँच जाते हैं वहाँ से ये फुफ्फुस , कंठनाडी, अन्नप्रणाली में होते हुए अपने मूल अधिष्ठान पक्वाशय में आकर रुक जाते है तथा 4 सप्ताह में इनके आकर में वृद्धि हो जाती है |

2. गंडूपद कृमि (Ascaris Lumbricoids)

यह मुख्यत: बालकों में पाया जाता है | यह 20 से 40 सेमी लम्बा होता है | पीड़ित बालकों के मल त्याग से निकले हुए अन्डो से स्वस्थ बालकों में पहुँचता है | ये कीड़े अत्यंत चंचल व गतिशील होते है तथा प्राय: आंतो में कुंडली के रूप में रहते है | ये पेट के कीड़े कभी कभार मल के साथ गुदामार्ग से बाहर भी आ जाते है | गंडूपद कृमि आँतों के अन्दर ही अंडे देते हैं एवं यहाँ पर नए पेट के कीड़ों का जन्म होता है तथा ये अंडे मल के साथ बाहर निकलकर दुसरे स्वस्थ बालको में पहुँच जाते है | कभी – कभी ये कीड़े कुंडलित होकर आँतों को पूरी तरह से अवरुद्ध कर देते है | जिससे पितवाहिनी में अवरोध उत्पन्न करके पीलिया रोग की उत्पत्ति होती है |

3. स्फीतकृमि (Tape Worms)

यह लगभग 8 से 10 फीट लम्बा फीते के समान चौड़ा व् चपटा होता है जो अपने गोल शिर में स्थित बदिशों द्वरा आंतों में चिपका रहता है | इनके शरीर में छोटे – छोटे अनेक पर्व होते हैं प्रत्येक पर्व में अंडे होते है | परिपक्व होने पर अंतिम कुछ पर्व मल के द्वारा बाहर निकलते है जिसका आकर कद्दू के बीज के समान होता है |

4. तंतुकृमि (Thread Worms)

ये कृमि तंतु के समान श्वेत वर्ण के तथा बहुत छोटे आकार के होते है | बच्चों में ये रात के समय गुदा मार्ग से बाहर निकलते है | इस प्रकार के पेट के कीड़े होने पर गुद्प्रदेश में खुजली होना , जलन होना , प्रवाहिका, गुदभ्रंश, शैयामुत्र, प्रतिश्याय आदि लक्षण प्रकट होते है |

इन सभी प्रकार के पेट के कीड़ों के होने पर लक्षण सभी के समान ही प्रकट होते है | कुच्छ लक्षण इनके प्रकारों पर निर्भर करते है |

बच्चों में पेट के कीड़ों का उपचार 

  • उदरकृमि नाशक चूर्ण – वायविडंग, कबीला, काबुली हर्रे का बक्कल – ये चारों चीजें एक – एक तौला ले | इन्हें कूटपीसकर कपद्छान चूर्ण बना लें | इस चूर्ण का सेवन 2 ग्राम की मात्रा में बच्चों को सुबह – शाम गाय के दही के साथ सेवन करवाने से पेट के कीड़े मर जाते है |
  • कृमि नाशक वटी – निशोथ, शुद्ध हिंग, सुखा पोदीना, वायविडंग, सेंधानामक, काबुली हर्रे का बक्कल और कबीला – इन सातों चीजों को 5 – 5 ग्राम लेकर इन्हें कूट पीसकर चूर्ण बना ले | इस चूर्ण में थोडा जल मिलकर खरल में घोट कर, गोलियां बना लें | इन्हें धुप में सुखा कर प्रयोग करें | यह योग पेट के कीड़ों को नष्ट करता है |
  • बच्चों के पेट में कीड़े मारने के लिए अनार का रस निकाल कर सेवन करवाना चाहिए |
  • लहसुन की चटनी बना कर बालकों को सेवन करवाना चाहिए |
  • नीम की पतियों को सुखाकर चूर्ण बना लें | इस चूर्ण को शहद के साथ सेवन करवा सकते है |
  • तुलसी के पतों का रस निकालकर बच्चों को सेवन करवाने से पेट के कीड़े जल्द ही मर जाते है |

बच्चों के पेट के कीड़े मारने की आयुर्वेदिक दवा 

आयुर्वेद चिकित्सा में पेट के कीड़ों की समस्या में सामान्यत: कटु, तिक्त, कषाय, क्षार एवं उष्ण द्रव्यों का प्रयोग करवाया जाता है | दाड़िम, भल्लातक, विडंग, कम्पिल्ल्क और पलाश के बीज आदि इन्ही गुणों के होते है | साथ ही दीपन – पाचन एवं कफघन औषधियों का प्रयोग भी करवाया जाता है |

पेट के कीड़े मारने की आयुर्वेदिक दवा के नाम – इन आयुर्वेदिक औषध योगों का प्रयोग पेट के कीड़े मारने के लिए आयुर्वेद चिकित्सा में प्रयोग किया जाता है

  1. पलाशबिजादी चूर्ण
  2. विदंगाशव
  3. विडंगारिष्ट
  4. जन्मघुटी क्वाथ
  5. विडंग चूर्ण
  6. नवयाश लौह
  7. कृमिमुद्ग रस
  8. कृमिकुठार रस

धन्यवाद | 

 

 

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