गिलोय सत्व (अमृता सत्व) – को बनाने की विधि , औषधीय गुण, लाभ एवं फायदे |

गिलोय सत्व – गिलोय के कांड को कूटपीसकर एवं इसके स्टार्च को निकाल कर गुडूची सत्व का निर्माण होता है | आज कल बाजार में आरारोट के चूर्ण में गिलोय स्वरस की भावना देकर नकली गिलोय सत्व उपलब्ध करवाया जाता है | तभी इसके पूर्ण स्वास्थ्य लाभ प्राप्त नही होते |

आयुर्वेद में गुडूची अर्थात गिलोय को अमृत के समान गुणकारी माना गया है तभी इसे संस्कृत में अमृता भी कहते है | ज्वर, जीर्ण ज्वर, तृष्णा, छर्दी, अम्लपित, रक्ताल्पता, पीलिया , यकृत के विकारों में , सुजन , रक्त अशुद्धि, वातरक्त, एवं स्त्रियों के श्वेत प्रदर जैसे रोगों में कारगर औषधि साबित होती है |

गिलोय सत्व

 

इसके औषधीय गुणों में इसका रस तिक्त एवं कषाय होता है | गुणों में यह लघु एवं स्निग्ध होती है एवं इसका वीर्य अर्थात स्वाभाव या तासीर उष्ण होती है | पचने के बाद गिलोय का विपाक मधुर होता है | अपने इन्ही औषधीय गुणों के कारण यह त्रिदोष शामक का कार्य करती है | सम्पूर्ण शरीर के कायाकल्प के लिए भी गिलोय अति उत्तम औषधि साबित होती है |

बाजार में विभिन्न कम्पनियाँ जैसे बैद्यनाथ गिलोय सत्व, पतंजलि अमृता सत्व, डाबर एवं श्री मोहता आदि के सत्व आसानी से मिल जाते है | लेकिन अगर आप इसे घर पर बना कर उपयोग में लेते है तो यह अत्यंत बलवान औषधि साबित होती है | क्योंकि इसे घर पर आसानी से निर्मित किया जा सकता है |

गिलोय सत्व बनाने की विधि / शाश्त्रोक्त निर्माण प्रक्रिया 

यह आसानी से उपलब्ध होने वाली औषधीय बेल है | भारत के अधिकतर प्रान्तों में यह उगती है | किसी सड़क किनारे, घर के आँगन, सार्वजनिक गार्डन आदि में इसे ढूंढा जा सकता है |

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सबसे पहले अंगूठे जीतनी मोटी, ताज़ी एवं हरी गिलोय के कांड को बेल से काट लीजिये | अब इसे अच्छी तरह पानी से धोकर इसके छोटे – छोटे टुकड़े करलें | इन टुकड़ों को इमामदस्ते में डालकर अच्छी तरह कूट लें | अब इस कुटी हुई गिलोय को स्टील के बर्तन में डालकर इसमें चार गुना पानी मिलादें और हाथों से अच्छी तरह मसलें | जब पानी में खूब फेन आ जाए तो इसका सारा स्टार्च पानी में घुल जाता है |

अब बचे हुए गिलोय के टुकड़ों को पानी से निथार कर निकाल कर फेंक दें | बचे हुए पानी को साफ वस्त्र से दुसरे पात्र में छान कर रात भर के लिए इस पानी को स्थिर पड़ा रहने दें | लगभग 12 घंटे पश्चात गुडूची का सत्व बर्तन के तल में इकट्ठा हो जायेगा | तब इस बर्तन को हिलाए बिना जल को अलग करलें | सारे जल को अलग करने के पश्चात बर्तन के तल में कुच्छ मैदा जैसा पदार्थ बचता है जिसे सुखाकर – वस्त्र से छानकर किसी बर्तन में रख लें | यही गिलोय सत्व या सत होता है |

इस प्रकार से निर्माण करने पर आपको शुद्ध सत्व प्राप्त होता है जो बाजार में मिलने वाले गिलोय सत से कहीं उत्तम क्वालिटी का होगा , जिससे इसके रोगप्रभाव भी दुगने होंगे |

गिलोय सत्व की सेवन की मात्रा 

इसका सेवन 250 mg से 500 mg शहद के साथ किया जाता है | किसी भी औषध को ग्रहण करने से पहले वैध्य चिकित्सक का परामर्श आवश्यक होता है | अत: प्रयोग में लाने से पहले अपना परिक्षण किसी निपुण आयुर्वेदिक चिकत्सक से करवा लेना चाहिए |

गिलोय सत्व के फायदे या स्वास्थ्य लाभ (महत्व)

  • गुडूची सत्व त्रिदोष शामक औषधि है | इसके सेवन से शरीर में तीनो प्रकार के विकारों (वात,पित एवं कफ) का शमन होता है |
  • शरीर में बढ़ें हुए पित को संतुलित करने का कार्य करती है |
  • रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा कर शरीर को बल प्रदान करती है |
  • यह शुक्रल औषधि है |
  • ज्वर (बुखार), जीर्ण ज्वर एवं विषम ज्वर में प्रयोग की जाती है |
  • रक्तपित एवं राजयक्ष्मा (TB) में भी आयुर्वेदिक चिकत्सक इसका प्रयोग करवाते है |
  • यकृत के विकारों में गिलोय सत्व का प्रयोग लाभ देता है |
  • पेशाब में जलन एवं मूत्रकृच्छ (पेशाब का रुक – रुक कर आना) में भी इसका प्रयोग अन्य औषध योगों के साथ किया जाता है |
  • रक्त प्रदर की समस्या में फायदेमंद |
  • अपने एंटीओक्सिडेंट गुणों के कारण यकृत के कार्यो को सुचारू करता है एवं यकृत को ताकत भी प्रदान करता है |
  • शरीर की सभी प्रकार की जलन को शांत करता है एवं मूर्च्छा में भी उपयोगी है |
  • पीलिया रोग में इस औषधि का योग्पुर्वक सेवन करवाया जाता है |
  • डेंगू बुखार में गिलोय सत्व का सेवन किया जाता है |
  • त्वचा विकार जैसे – कंडू (खुजली) एवं कुष्ठ रोग में लाभदायक है |
  • अपचन एव भूख न लगने की समस्या में भी इसका प्रयोग किया जाता है |
  • अपस्मार एवं रक्तविकृतियों में फायदेमंद है |

किसी भी औषधि का सेवन चिकित्सक के निर्देशानुसार करना चाहिए | क्योंकि औषध की प्रकृति, गुण एवं रोग की स्थिति के आधार पर औषध का निर्धारण होता है | बिना जांचे परखे ली गई औषध लाभदायक नहीं होती |

धन्यवाद |

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