खैर (खदिर) / Acacia Catechu in Hindi

प्राय: सम्पूर्ण भारत में पाया जाने वाला एक जंगली वृक्ष है | भारत में उत्तरप्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में अधिकतर पाया जाता है | इसका वृक्ष 15 से 20 फीट ऊँचा मध्यम प्रमाण का होता है | प्राचीन समय से ही इस वृक्ष का उपयोग स्वास्थ्य एवं सेहत के लिए घरेलू एवं आयुर्वेद दोनों में किया जाता रहा है | संस्कृत में इसे खदिर नाम से पुकारा जाता है | खदिर का अर्थ होता है रोगों को नष्ट करने वाला और शरीर में स्थिरता लाने वाला | यह बबूल की ही एक प्रजाति मानी जा सकती है | गाँवों में आज भी इसकी गौंद ओर छाल का प्रयोग सेहत के लिए किया जाता है |

खैर (खदिर)

आयुर्वेद में भी इसकी छाल और निर्यास अर्थात गौंद को ही औषध उपयोग में लिया जाता है | इसकी छाल कृष्णभ भूरे रंग की 1/2 इंच तक मोटी होती है जो भीतर से चूरे रंग की होती है | खैर की शाखाएं पतली, उपपत्रों के स्थान पर जोड़े और टेड़े कांटे लगे होते है |

पेड़ की पतियाँ बबूल (कीकर) के सामान ही होती है | पत्र 10 से 15 सेमी. लम्बे होते है जिनपर 40 से 50 के लगभग पक्ष लगे रहते है और प्रत्येक पक्ष पर 60 से अधिक पत्रक अर्थात पतियाँ होती है जिनकी लम्बाई लगभग 1 से 2 इंच तक होती है | पौधे पर वृषा ऋतू में लगने वाले पुष्प छोटे एवं सफ़ेद या हल्के पीले रंग के 2 से 3 इंच लम्बे होते है |

खदिर की फली 2 से 5 इंच लम्बी , पतली, धूसर, चमकीली, सिकुड़ी हुई एवं आगे की और से गोल होती है | प्रत्येक फली में 5 से लेकर 8 तक बीज होते है | फली हेमंत ऋतू में लगती है |

खैर का रासायनिक संगठन

खदिर की छाल से कत्था बनाया जाता है | इसके सारभाग से लगभग 3 से 10% तक कत्था प्राप्त होता है | इसके सारभाग में कैटेचिन 4% और कैटचुटैनिक एसिड 7% तक होते कभी – कभी यह 17% तक भी होते है | इसके अलावा खैर के वृक्ष से निर्यास प्राप्त होता है जो अधिक पुराने वृक्षों से प्राप्त किया जाता है | इसके सारभाग जल में उबाल कर कत्था प्राप्त किया जाता है |

खैर (खदिर) के गुण – धर्म

इसका रस तिक्त एवं कषाय होता है | गुणों में यह लघु और रुक्ष होती है | खैर शीत वीर्य होती है एवं विपाक में कटु होती है | अपने इन्ही गुणों के कारण यह कफ एवं पित्त का शमन करने वाली होती है | तिक्त एवं कषाय होने के कारण कफ का एवं शीतवीर्य होने के कारण पित्त का शमन करती है |

मात्रा, प्रयोज्य अंग और विशिष्ट योग

औषध उपयोग में इसकी छाल और निर्यास का उपयोग किया जाता है | आयुर्वेद में इसके इस्तेमाल से खदिरारिष्ट, खादिरादी क्वाथ, खादिराष्टक एवं खादिरादी वटी आदि बनाई जाती है | सेवन की मात्रा में इसके चूर्ण का प्रयोग 1 से 3 ग्राम तक करना चाहिए | क्वाथ का 50 – 100 मिली तक एवं खदिरसार को आधे से एक ग्राम तक लेना चाहिए |

खैर के स्वास्थ्य लाभ या फायदे

  • आयुर्वेद में इसे कुष्ठघन माना गया है | फोड़े – फुंसियो एवं घाव आदि में इसकी छाल को पीसकर प्रभावित स्थान पर प्रयोग करने से लाभ मिलता है |
  • खैर से बनने वाली खादिरादी वटी को चूसने से सभी प्रकार के मुंह के रोग मिटते है |
  • मसूड़ों से खून आने या दांतों में कीड़े लगे होतो इसके कत्थे से दांतों को साफ़ करने से जल्द ही इन समस्याओ से छुटकारा मिलता है |
  • कुष्ठ जैसे रोग में भी इसके कत्थे को पानी में डालकर नहाने से लाभ मिलता है |
  • शीतवीर्य होने के कारण पित्त व्रद्धी होने पर प्रयोग करने से पित्त शांत होता है |
  •  कफ वृद्धि होने पर इसके काढ़े का प्रयोग करने से लाभ मिलता है |
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