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आयुर्वेद के अनुसार गर्भवती की डाइट प्लान

आयुर्वेदानुसार गर्भवती महिला के लिए आहार एवं औषध की व्यवस्था |

गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान अपने आहार का ध्यान रखना भी परम आवश्यक है | गर्भावस्था महिला के जीवन की एसी अवस्था होती है , जो गर्भवती एवं शिशु दोनों की वर्द्धि और विकास को प्रभावित करते है | इस अवस्था में महिला जिस प्रकार का आहार ग्रहण करती है, गर्भवती और शिशु दोनों पर इसका प्रभाव पड़ता है | गर्भावस्था के 9 महीने तक गर्भवती को संतुलित एवं पोषक तत्वों से युक्त आहार का सेवन करना चाहिए |

आयुर्वेद के अनुसार गर्भवती की डाइट प्लान

स्वदेशी उपचार की इस पोस्ट में हम आपको आयुर्वेद के अनुसार गर्भिणी माता के आहार के बारे में बताएँगे | आयुर्वेद के विभिन्न ग्रंथो में गर्भवती के लिए आहार की व्यवस्था हर महीने अनुसार बताई गई है | चलिए जानते है इस आहार व्यवस्था को |

आयुर्वेद के अनुसार गर्भवती महिला का आहार / What is The Diet for Pregnant Woman in Ayurveda ?

गर्भावस्था के पहले महीने में 

गर्भावस्था के पहले महीने में गर्भिणी स्त्री को ठंडे दूध या जल का सेवन करना चाहिए | साथ ही पौष्टिक और संतुलित भोजन को अपनाना चाहिए | आयुर्वेद के ग्रन्थ भावप्रकाश में पहले महीने में गर्भवती को मुलेठी, सोगौंन के बीज, अश्वगंधा और देवदार आदि औषधियों को दूध के साथ लेना चाहिए | जैसे ही गर्भ ठहरने का पता चले तो पहले महीने में गर्भवती द्वारा मधुर, शीत और द्रव्यों पदार्थो का सेवन करना आयुर्वेद के अनुसार फायदेमंद होता है |

दुसरे महीने में आहार का सेवन 

दुसरे महीने में गर्भिणी को मधुर गण की औषधियों (गेंहू, चावल, काकोली, द्राक्षा, महुआ आदि) से सिद्ध दूध का सेवन करना चाहिए | भावप्रकाश में अश्मंतक, तिल (काले) और शतावरी को दूध में मिलाकर गर्भिणी को सेवन करवाना लाभदायक होता है |

तीसरे महीने में गर्भिणी का आहार 

आयुर्वेद के ग्रन्थ चरक संहिता के अनुसार इस महीने में गर्भिणी महिला को दूध में घी व शहद मिलाकर सेवन करनी चाहिए | लेकिन घी और शहद को बराबर मात्रा में मिलाकर सेवन नहीं करना चाहिए , इनको हमेशां विषम मात्रा में लेना चाहिए | आचार्य सुश्रुत के अनुसार पहले महीने से लेकर तीसरे महीने तक महिला को मधुर , शीतल और लघु आहार को ग्रहण करना चाहिए |

गर्भावस्था के चौथे महीने में गर्भिणी का आहार 

चौथे महीने में गर्भ स्थिरता को प्राप्त कर लेता है | इस लिए इस महीने में स्त्री का शरीर अधिक भारी लगता है | इस महीने में गर्भ का हृदय भी बन जाता है इसलिए चौथे महीने से माता को दौहृद पुकारा जाता है | आचार्य चरक के अनुसार इस महीने में महिला को दूध में 2 तौला की मात्रा में मक्खन को मिलाकर सेवन करना चाहिए |

आचार्य सुश्रुत ने चौथे महीने से गर्भिणी को दूध एवं घी के साथ इच्छानुसार सात्म्य भोजन का सेवन करना चाहिए | इस महीने में गर्भिणी की इच्छा अलग – अलग प्रकार के भोजन करने की होती है , अत: एसे में अपनी इच्छानुसार भोजन करना चाहिए | लेकिन ग्रहण किया जाने वाला आहार आपके लिए फायदेमंद हो | महर्षि सुश्रुत ने कहा है की अगर इस समय अपनी इच्छा को दबाया जाए तो होने वाला बच्चा विकृत अंग वाला पैदा होता है |

गर्भावस्था के पांचवे महीने में आहार का सेवन – आयुर्वेद के अनुसार 

पांचवे महीने में गर्भ में चेतना की उत्पति हो जाती है | इस महीने में दूध एक साथ घी के सेवन का वर्णन मिलता है | भावप्रकाश के अनुसार पांचवे महीने में गर्भवती को वृहती, कंटकारी एवं वट आदि औषधियों का कल्क के साथ दूध का सेवन करना चाहिए |

छठे महीने में गर्भिणी का आहार 

आयुर्वेद के आचार्य सुश्रुत के अनुसार छठे महीने में गर्भवती को गोक्षुर (गोखरू) में पकाए घी और यवागू का सेवन करना चाहिए | आचार्य चरक के अनुसार इस महीने में मधुर गण की औषधियों से दूध को सिद्ध करके उसमे से निकाले गए घी का सेवन करना चाहिए |

वहीँ भावप्रकाश के अनुसार पृश्निप्रणी , सहिजन, गोक्षुर एवं गंभारी में से उपलब्ध किसी भी औषधि के कल्क के साथ दूध का सेवन करना चाहिए |

सातवें महीने में आहार की व्यवस्था – आयुर्वेदानुसार 

सातवे महीने में भी छठे महीने की तरह दूध के साथ घी का सेवन करना चाहिए | भावप्रकाश ने सातवें महीने में कमालविस, द्राक्षा, कसेरू, मुलेठी और मिश्री इन सभी औषधियों में से उपलब्ध औषधियों के कल्क का सेवन दूध के साथ करना चाहिए |

आयुर्वेद के अनुसार आठवें महीने में आहार का सेवन 

आठवें महीने में आचार्य सुश्रुत ने बिल्व के काढ़े में वातहर एवं स्निग्ध द्रव्यों का सेवन करना चाहिए | इस महीने में बिल्व के क्वाथ में बला, अतिबला, नमक, शहद, दूध या घी को मिलाकर गर्भिणी को सेवन करना चाहिए | इससे गर्भिणी के पुराने मल का शोधन होता है एवं वायु का अनुलोमन होता है | इन औषधियों के सेवन पश्चात दूध एवं मधुर गण की औषधियों से तैयार तैल से अनुवासन बस्ती दी जानी चाहिए |

नौवें महीने में आहार की व्यवस्था 

आचार्य चरक के अनुसार इस महीने में मधुर वर्ग की औषधियों से सिद्ध तेल से अनुवासन बस्ती देनी चाहिए | साथ ही इसी सिद्ध तेल से योनी में पिचु धारण करना चाहिए, ताकि योनी में स्निग्धता आ जाये और मांसपेशियां शिथिल हो जाएँ और प्रशव ठीक ढंग से हो | अनुवासन बस्ती से वायु का अनुलोमन होता है जिससे सामान्य प्रसव होता है |

भावप्रकाश में औषध ग्रहण के लिए मुलेठी, दूर्वा, अश्वगंधा और सफ़ेद सारिवा इन सभी द्रव्यों को शीतल पानी में पीसकर दूध के साथ 1 : 4 के अनुपात में ग्रहण करना चाहिए |

धन्यवाद |

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