Mail : treatayurveda@gmail.com
यकृत

यकृत / Liver – सरंचना , कार्य और लीवर की सामान्य बीमारियाँ

यकृत / Liver in Hindi

यकृत मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है | इसका रंग रक्ताभ धूसर होता है अर्थात लालिमा के साथ भूरे रंग का होता है | शरीर में इसका कार्य पित्त (Bile) का निर्माण करना होता है | हमारे शरीर में यकृत और पितीय तंत्र रचनात्मक और क्रियात्मक रूप से नजदीकी तौर पर सम्बन्धित रहते है | यह डाईफ्राम के दाहिने भाग के निचे स्थित रहता है | यकृत से सम्बन्धित सामान्य बीमरियों का जिक्र हम निचे करेंगे | सबसे पहले इसकी सरंचना और कार्य का विवरण देखेंगे |

यकृत

” पुरुषों में यकृत का भार – 1.4 से 1.6 KG तक और महिलाओं में इसका भार – 1.2 से 1.4 KG तक होता है| “

Liver की सरंचना और निर्माण

लीवर (यकृत) का निर्माण दो मुख्य प्रकार की कोशिकाओं से होता है –

  • यकृतीय कोशिकाएं – ये यकृत की मुख्य उत्सर्जी कोशिकाएं होती है |
  • कुफर कोशिकाएं (Kupffer’s cells) – ये यकृतीय कोशिकाओं से पूर्ण रूप से भिन्न होती है तथा ये विशिष्ट तंत्र के अंतर्गत आती जिसे रेटिक्युला – एंडोथिलीअल तंत्र कहते है |

यकृत कई छोटे – छोटे खंडो (Lobules) से मिलकर बना होता है | प्रत्येक खंड (Lobule) में यकृत कोशिकाओं की एक श्रंखला होती है | इन यकृतीय कोशिकाओं के बिच में छोटी – छोटी पितिय कोशिकाएं रहती है , जो एक साथ मिलकर बड़ी वाहिकाएं बनाती है | जिससे एक बड़ी वाहिका बन जाती है जिसे Common hepatic duct कहा जाता है | आगे यह वाहिका पिताशय से आने वाली सिस्टिक वाहिका से जुड़कर उभय पित वाहिका (Common bile duct) बनाती है | Bile duct ड्यूओडीनम में खुलती है जो पिताशय संचयक का कार्य करता है एवं इसमें पित्त एकत्रित एवं गाढ़ा होता है |

यकृत के कार्य / Functions of Liver in Hindi

मानव शरीर में यकृत के बहुत से कार्य होते है | इसका मुख्य कार्य वसा, प्रोटीन व कार्बोहाइड्रेट के चयापचय करना होता है , साथ ही यह नष्ट हो चुकी कोशिकाओं के अवशेषों को नष्ट करने का कार्य भी करता है | इसके मुख्य कार्य है –

1. पित का चयापचय (Bile metabolism)

पित्त के चयापचय में यकृत का बहुत बड़ा योगदान होता है | पित्त वर्ण (Bile Pigments) और पित्त लवण (Bile Salts) दोनों का निर्माण यकृत की कोशिकाओं द्वारा होता है एवं इनका चयापचय भी यकृत में ही होता है |

  1. Bile pigment / पित्त वर्ण – लाल रक्ताणुओं का सामान्य जीवन काल 120 दिन का होता है | इसके बाद ये टूटकर नष्ट होने लगते है | जब ये नष्ट होते है तो पित्त वर्ण का निर्माण होता है | इन पित्त वर्णों में बिलीरुबिन वर्ण अधिक महत्वपूर्ण होता है | यह बिलीरुबिन यकृतीय कोशिकाओं द्वारा पितिय मार्ग में उत्सर्जित होता है और अंत में ड्यूडीनम में खली होता है | आगे यह Stercobilin में परिवर्तित हो जाता है | इसी से मल का रंग कुछ भूरा रहता है |
  2. Bile Salts / पित्त लवण – ये भी यकृतीय कोशिकाओं द्वारा ही बनते है तथा hepatic duct से गुजर कर पिताशय में संचय हो जाते है | अंत में ड्यूडीनम से निष्काषित भी हो जाते है |

2. कार्बोहाइड्रेट का चयापचय

यकृत कार्बोहाइड्रेट भोज्य पदार्थो के चयापचय में महत्वपूर्ण कार्य करता है | क्योंकि यह शरीर के उपयोग के लिए ग्लूकोज को ग्लाईकोजन के रूप में संचय करता करता है | इसीलिए यकृत उर्जा का बहुत बड़ा संचायक होता है , क्योंकि उर्जा बनाये रखने के लिए ग्लूकोज बहुत महत्वपूर्ण भोज्य पदार्थ है |

3. प्रोटीन का चयापचय

प्रोटीन के चयापचय में यकृत महत्वपूर्ण भाग अदा करता है | प्रोटीन के चयापचय के दौरान यूरिया का निर्माण होता है जिसे गुर्दे व्यर्थ पदार्थ के रूप में शरीर से बाहर निष्काषित करते है |

4. विटामिन B12 का संचय

विटामिन b12 के संचय के लिए यकृत अत्यंत महत्वपूर्ण है | शरीर में विटामिन ब१२ लाल रक्ताणुओं के प्रयाप्त निर्माण के लिए आवश्यक होता है |

5. प्रोथ्रोम्बिन का निर्माण और संचय

विटामिन k जो कुछ भोज्य पदार्थों में उपस्थित रहता है और बैक्टीरिया द्वारा अन्तो में भी बनता है | इसे प्रोथ्रोम्बिन बनाने के लिए यकृत में शोषित होना पड़ता है |

इनके अलावा यकृत हमारे शरीर में ग्लाईकोजन, आयरन, वसा, विटामिन ए व डी का भण्डारण भी करता है | शरीर से औषधियों, विषों, भारी धातुओं तथा टिन और पारद आदि को बाहर निकालने में सहायक है |

यकृत की बीमारियाँ / Liver Diseases in Hindi

यकृत हमारे शरीर में कई विशेष कार्य करता है | लेकिन जब कभी यकृत के प्रभावित और यकृत की विकृति होने के कारण शरीर में कई बीमारियाँ हो जाती है | यकृत की विकृति और प्रभावित होने के कारण शरीर में कई बीमारियाँ जैसे – पीलिया , हेपेटाईटिस, यकृत का सिरोसिस, लीवर का कैंसर आदि होती है | यहाँ हमने लीवर से सम्बंधित कई बिमारियों को संक्षिप्त में बताया है |

1. पीलिया

लीवर और पितिय मार्ग की अधिकांश बिमारियों में पीलिया बहुत ही सामान्य और पूर्वसूचक बीमारी है | पीलिया की बीमारी शरीर में बिलीरुबिन की अधिकता या लीवर के किसी भाग में अवरोधन या कोई बीमारी होने के कारण होती है | लीवर के शरीर में सही तरीके से कार्य नहीं करने के कारण पित्त सामान्य मार्ग से नहीं गुजर सकता इसलिए यह रक्त प्रवाह में पुन: शोषित हो जाता है जो पीलिया होने का मुख्य कारण भी होता है |

इस रोग को आसनी से पहचाना जा सकता है | क्योंकि पुरे शरीर में पीले रंग का आधिक्य रहता है | मुख्यत: आँखों के स्वेत पटल पर, नाखुनो पर, पेशाब में पीले का आधिक्य रहता है | पीलिया 5 प्रकार का होता है |

2. संक्रामक हेपेटाइटिस (Infectious Hepatitis)

संक्रामक हेपेटाइटिस वायरस संक्रमण के कारण होने वाला लीवर का तीव्र प्रदाह (जलन) है | इस बीमारी के 5 प्रकार पहचाने जा चुके है | जो निम्न है –

  1. हेपेटाइटिस A (HAV) – जब यह वायरस मनुष्य शरीर में उपस्थित रहता है तब यह रोगी के मल में उत्सर्जित होता है | पानी का संदूषण शेल फिश या सब्जियां संक्रमन का स्रोत हो सकती है | वायरस A हेपेटाइटिस की होने की अवधि 3 से 6 सप्ताह तक होती है |
  2. हेपेटाइटिस B (HBV) – इस प्रकार के स्ट्रेन से सीरम हेपेटाइटिस पैदा होती है | चूँकि यह संक्रमित व्यक्ति से रक्त का नमूना लेने के लिए उपयोग किये गये सिरिंज या नीडल्स को अपर्याप्त रूप से विसंक्रमित करने के कारण दुसरे व्यक्ति में फैलता है | इसलिए यह नाम दिया गया है | वैक्षिनेशन, एक्युपंचर या गोदने के बाद भी इस बीमारी के कुछ मामले देखे गये है | यहाँ तक की उंगलियों में संक्रमित रक्त के द्वारा सन्दुष्ण से भी हेपेटाइटिस हो सकती है |
  3. हेपेटाइटिस C (HCV) – यह A और B की तरह नहीं होता है , लेकिन यह भी रक्त-आधान (ब्लड ट्रांस्फ्यूजन, संक्रमित सुई और हिमोडायलेसीस) के बाद देखा गया है |
  4. हेपेटाइटिस D (HCV) – यह डेल्टा हेपेटाइटिस होता है | हेपेटाइटिस B के ही सामान होता है |
  5. हेपेटाइटिस E (HEV) – यह एक स्थानीयमारी है जो की हेपेटाइटिस A के सामान संक्रमित खाद्य पदार्थो या संक्रमित पानी से फैलता है |

3. यकृत का सिरोसिस (Cirrhosis of the liver)

यकृत के सिरोसिस में यकृत की स्वस्थ कोशिकाएं (Degeneration) मरने लगती है तथा इसमें तंतुमय कोशिकाओं का जाल बनने लगता है | ये जाल यकृत को पूर्ण रूप से जकड लेता है, इसकी वजह से लीवर कोशिकाएं दबकर मरने लगती है | यह प्रक्रिया धीरे – धीरे तब तक चलती रहती है जब तक की लीवर पूरी तरह से कार्य करना बंद नहीं कर देता या रोगी की मृत्यु नहीं हो जाती | अधिकांशत: यह रोग लम्बे समय तक अत्यधिक शराब पिने के कारण होता है | जो व्यक्ति शराब नहीं पीते है उनमे भी यह रोग किसी अज्ञात कारणों या पित्त वाहिनियों में लम्बे अवरोध के कारण यकृत की कोशिकाओं की क्षति के कारण होता है |

4. Hepato-encephalopathy 

यकृत के फ़ैल होने या सिरोसिस में Liver अमोनिया को यूरिया में चयापचय (Metabolize) करने में असमर्थ हो जाती है | जिसके कारण ब्लड में ammonia की मात्रा बढ़ जाती है तथा अमोनिया CNS अर्थात Central Nervous System के लिए जहरीला होता है | अत: CNS के कार्य में बाधा उत्पन्न हो जाती है , जिसे Hepato-encephalopathy कहते है |

5. यकृत का कैंसर / Carcinoma of liver

लीवर का कैंसर बहुत सामान्य होता है क्योंकि शरीर के विभिन्न अंगो का कैंसर बहुधा यकृत में फ़ैल जाता है , इस प्रकार लीवर में द्वितीयक कैंसर हो जाता है | यकृत का प्राम्भिक कार्सिनोमा जिसे heptoma कहते है , सिरोसिस से पीड़ित रोगियों में इसके पैदा होने की सम्भावना होती है |

धन्यवाद |

 

Content Protection by DMCA.com
Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Shopping cart

0

No products in the cart.

+918000733602

असली आयुर्वेद की जानकारियां पायें घर बैठे सीधे अपने मोबाइल में ! अभी Sign Up करें

You have successfully subscribed to the newsletter

There was an error while trying to send your request. Please try again.

स्वदेशी उपचार will use the information you provide on this form to be in touch with you and to provide updates and marketing.