सूर्यभेदी प्राणायाम – इसकी विधि , लाभ एवं सावधानियां |

सूर्यभेदी / सूर्यभेदन  प्राणायाम

सूर्यभेदी प्राणायाम
सुर्यभेदी प्राणायाम

सुर्यभेदी प्राणायाम की विशेषता होती है की इसमें पूरक क्रिया नाक के दांये छिद्र से की जाती है | नाक के दांये छिद्र को सूर्य स्वर और बांये को चन्द्र स्वर कहते है | दांये छिद्र से श्वास को अंदर लेने की क्रिया में प्राण उर्जा पिंगला नाड़ी अर्थात सूर्य नाड़ी से प्रवाहित होती है | श्वास छोड़ने की क्रिया बांये छिद्र से करने में प्राण उर्जा इडा नाड़ी या चन्द्र नाडी से प्रवाहित होती है | सूर्य भेदी प्राणायाम के नियमित अभ्यास से उम्र बढती है एवं कुंडलिनी जागरण में भी सहायता करता है |

सूर्यभेदी प्राणायाम करने की विधि

सूर्यभेदी प्राणायाम करने के लिए सबसे पहले शांत और स्वच्छ जगह को चुने |

  • सबसे पहले पद्मासन या सुखासन में बैठ जाए |
  • अपनी पीठ और गर्दन को सीधा रखे |
  • अब अपने बांये नाक को अनामिका अंगुली से बंद करे और दांये नासिका छिद्र से धीरे – धीरे श्वास अंदर ले |
  • जितना ले सके उतना श्वास अंदर ले और  |
  • अपने अंगूठे से दाहिने नासिका के द्वार को बंद करे एवं सामर्थ्य अनुसार कुम्भक करे |
  • अब दांये नासिका द्वार को बंद रखते हुए , बांये नासिका से धीरे – धीरे श्वास को बाहर छोड़े |
  • इस प्रकार सुर्यभेदी प्राणायाम का यह एक चक्र हुआ |
  • धीरे – धीरे अभ्यास से प्राणायाम के चक्रो को बढ़ाने की कोशिश करे |
  • नियमित अभ्यास से कुम्भक (श्वास को अंदर रोके रखना) के समय को बढ़ाने की कोशिश भी करे |

विशेष – कुंभक का समय धीरे – धीरे अभ्यास से बढ़ाते रहना चाहिए | हठयोग प्रदीपिका में लिखा है की कुम्भक तब तक करे जब तक पसीना न निकल जाए | लेकिन फिर भी अपने सामर्थ्य अनुसार कुंभक करना चाहिए | नियमित अभ्यास से कुम्भक के समय को बढाया जा सकता है |

और पढ़ेप्राणायाम क्या है एवं इसके प्रकार 

सुर्यभेदी प्राणायाम के लाभ / फायदे

  • नियमित अभ्यास से आयु में बढ़ोतरी होती है |
  • शरीर तेजवान और कांतिमय बनता है |
  • शरीर में गडबडाए वात और कफ को संतुलित करने में सहायक है |
  • पाचन तंत्र मजबूत बनता है |
  • शरीर में गर्मी बढती है जिससे वात एवं कफ का नाश होता है , एवं सर्दी – जुकाम , श्वास रोग आदि रोगों में लाभ मिलता है |
  • चेहरे की झुर्रियां मिटती है एवं चेहरा कांतिमय बनता है |
  • निम्न-रक्तचाप एवं मधुमेह में लाभ देता है |
  • कुंडलिनी जागरण में सहायता करता है |

सुर्यभेदी प्राणायाम करते समय सावधानियां

उच्च-रक्तचाप एवं उष्ण प्रकर्ति के व्यक्तियों को इसे नही करना चाहिए | जिन लोगो की पीत प्रकृति है वे भी इस प्राणायाम से दुरी बनाये | अत्यधिक गर्मी वाले प्रदेशों में इसे न करे | अगर आपकी प्रकृति कफज और वातज है तो आप उष्ण प्रदेशों में भी इसे कर सकते है |

धन्यवाद |

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