स्वेदन कर्म / Sudation Therapy – परिचय , प्रकार और महत्व |

स्वेदन कर्म / Sudation Therapy

आयुर्वेद की पंचकर्म चिकित्सा पद्धति में स्वेदन कर्म का विशिष्ट स्थान है। स्वेदन कर्म पंचकर्म का एक पूर्व कर्म है अर्थात रोगी व्यक्ति का पंचकर्म चिकित्सा पद्धति से इलाज करने से पूर्व कुछ विशिष्ट कर्म किये जाते हैं जैसे – अभ्यंग करना , स्वेदन करना । ये ही पंचकर्म पद्धति में पूर्व कर्म कहलाते हैं।

स्वेदन का अर्थ होता शरीर से स्वेद अर्थात पसीने को बाहर निकालना। इसे हम वर्तमान में प्रचलित स्टीम थेरेपी भी कह सकते हैं। लेकिन स्पा सेण्टर पर दी जाने वाली ये स्टीम थेरेपी स्वेदन कर्म से पूर्णतया भिन्न है। स्टीम बाथ में एक द्रोणी के माध्यम से पानी की गर्म भाप से नहलाया जाता है एवं इसके अपने महत्व हैं। लेकिन स्वेदन कर्म विशिष्ट रोग में विशिष्ट प्रकार से दिया जाता है। स्वेदन कर्म की विभिन्न विधियां होती है जो रोगी के रोग का परिक्षण करने के बाद तय की जाती हैं।

स्वेदन कर्म
स्वेदन कर्म

परिभाषाः- वह क्रिया जिसके अन्तर्गत शरीर का स्वेद या पसीना निकाला जाता है तथा जो शरीर की जकड़ाहट, भारीपन, ठण्डापन आदि को दूर करता है। उसे स्वेद या स्वेदन कर्म कहते हैं।

स्वेदन कर्म की विधि

‘स्वेदन’ करने से पूर्व व्यक्ति के रोग और प्रकृति का परिक्षण किया जाता है। उसी के आधार पर स्वेदनकर्म की विधि का चयन किया जाता है। इसे आप इस प्रकार समझ सकतें है कि जैसे कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से कमजोर है तो उसे मध्यम प्रकार का स्वेदन ही दिया जाता है । क्योंकि प्रबल स्वेदन सहन करने में असर्मथता होगी। चयनित विधि से व्यक्ति को उष्मा दी जाती है जिससे उसके शरीर से पसीना निकल सके। निर्धारित समय तक उष्मा देने पर शरीर का स्वेदन अच्छी तरह हो जाता है, जिसका परिक्षण चिकित्सक द्वारा किया जाता है।

स्वेदन कर्म की विधियां

केरलीय पंचकर्म में स्वेदन करने की बहुत सी विधियां है जिसके द्वारा स्वेदन कर्म किया जाता है। इनमें से कुछ जो प्रचलित विधियां है वे यहां बताई गई हैं।

1. संकर स्वेद

स्वेदन में प्रयोग होने वाले द्रव्यों जैसे तिल, उड़द, कुलत्थी आदि को कुट-पीसकर दरदरा किया जाता है। इन्ही स्वेदन द्रव्यों को वस्त्र में बांध कर पोटली बनाई जाती है। इस पोटली को सुखोष्ण अर्थात सुखी पोटली को ही गर्म करके शरीर पर स्वेदन किया जात है । इसे ही संकर स्वेद कहते है। इसका प्रयोग सीधे ही पीड़ित अंगो पर किया जाता है ताकि परिणाम बेहतर मिले। संकर का अर्थ मिश्रण से होता है इसलिए इस विधि में द्रव्यों का मिश्रण करके ही स्वेदन किया जाता है।

2. पत्थर स्वेद

इस विधि में व्यक्ति को सोने योग्य पत्थर की पटी पर गर्म औषध द्रव्य बिछाकर उपर सुलाया जाता है । इन औषध द्रव्यों के ऊपर मदार की पतियों से एक परत बनाई जाती है। इसके पश्चात व्यक्ति को कम्बल ओढ़ाकर इन औषधियों के कल्क पर चिकित्सक द्वारा निर्धारित समय तक सुलाया जाता है । इस विधि को ही पत्थर स्वेद कहते हैं।

3. नाड़ी स्वेद

नाड़ी स्वेद में एक यंत्र होता है जो औषधियों के क्वाथ निर्माण और भाप निर्माण में सहायक होता है। इस यंत्र के एक सीरे पर नलिका लगी होती है जिसके माध्यम से भाप बाहर निकलती है। दरःशल यह एक घड़ेनुमा यंत्र होता है जिसके एक मुहाने पर नलिका लगी होती है। इसमें औषध द्रव्यों एवं पानी को डालकर गर्म किया जाता है जब पानी की भाप बनने लगती है तो नलिका के माध्यम से प्रभावित अंग का सेक किया जाता है।

4. परिषेक स्वेद

इस विधि में व्यक्ति के रोग और प्रकृति के अनुसार सबसे पहले औषध युक्त तेल से मालिश की जाती है। अब व्यक्ति के शरीर पर उपर से तेल की एक धारा गिराई जाती है जो गर्म होता है। इसी विधि से शरीर को उष्मा देके शरीर से पसीना निकाला जाता है।

5. अवगाह स्वेद

इस विधि में व्यक्ति को बाथ टब में बैठाकर स्वेदन दिया जाता है। बाथ टब में औषध युक्त पानी होता है जो उष्ण होता है । इस टब में दशमुल क्वाथ, निर्गुण्डी क्वाथ, बलादि क्वाथ आदि का जल रहता है जिसमें व्यक्ति को बैठाकर इस गर्म जल से उसके अंगो का स्वेदन किया जाता है।

6. वाष्प स्वेदन

इस विधि में स्वेदन यंत्र में रोगी को सुलाकर या बैठाकर गर्म भाप के द्वारा शरीर को उष्मा दी जाती है जिससे व्यक्ति के शरीर से पसीना बाहर निकलने लगता है। यंत्र में औषध युक्त जल को भर के गर्म किया जाता है और गर्म पानी में से निकलने वाली भाप को सीधे यंत्र से जुड़े बाॅक्स में छोड़ा जाता है जिसमें रोगी को लेटाया रहता है।

स्वेदन के महत्व / Benefits of Sudation Therapy in Hindi

शरीर भी एक मशीनरी की तरह है जो सतत् चलता रहता है। लेकिन इस दौरान शरीर में बहुत से टाॅक्सिन इक्कठे होते रहते हैं। जिनको शरीर विभिन्न माध्यम से बाहर भी निकालता रहता है, जैसे मल-मूत्र के रास्ते, पसीने आदि के रास्ते। लेकिन फिर भी शरीर में बहुत से विष रह जाते हैं जिनको निकालने के लिए स्वेदन क्रिया करनी होती है।

  • स्वेदनकर्म करने से शरीर से बहुत से टाॅक्सिन शरीर से बाहर निकल जातें हैं।
  • स्वेदनकर्म करने से शरीर से पसीना निकल जाता है।
  • शरीर की जकड़न दूर होती है और शरीर में लचीलापन बढता है।
  • स्वेदन करने से शरीर का भारीपन भी खत्म होता है।
  • शरीर के अंगो में लचीलापन बढता है।
  • स्वेदन कर्म से त्वचा के सभी विकारों का नाश होता है और त्वचा में निखार आता है।
  • भोजन के प्रति रूची पैदा होती है। जिसके कारण व्यक्ति की भूख बढती है।
  • ‘शरीर में शीतलता का नाश होता है।
  • शरीर में व्यापत सभी प्रकार के दोषों का नाश होता है।
  • ‘शरीर में व्यापत वात का संतुलन होता है।
  • शरीर के सभी स्रोतों का शोधन होता है।
  • शरीर’ के सभी जोइंट्स में सक्रियता बढ़ती है।
  • आलस खत्म होता है।

धन्यवाद |

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