अक्षितर्पण / नेत्रतर्पण – सामान्य परिचय

अक्षितर्पण  

अक्षितर्पण दो शब्दों से मिलकर बना है – अक्षि + तर्पण  | अक्षि से तात्परिय है आँख और  तर्पण का अर्थ है भरना या तृप्त करना | आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के भाग पंचकर्म में आँखों के स्वास्थ्य के लिए इस विधा का इस्तेमाल किया जाता है | अक्षितर्पण नेत्रों के स्वास्थ्य को बनाये रखने और रोगों से दूर रखने की एक कला है | मुख्यतया आँखों की कमजोरी , नेत्रअभिष्यंद ( आँखे आना ), पलके ठीक से न खुलना , ग्लूकोमा आदि रोगों में अक्षि तर्पण किया जा सकता है एवं इसके परिणाम भी बहुत अच्छे प्राप्त होते है |
अक्षितर्पण / नेत्रतर्पण के फायदे
अक्षितर्पण
 

अक्षितर्पण की विधि 

अक्षितर्पण करने से पहले रोगी के शरीर का शोधन कर लेना चाहिए | रोगी को द्रोणी या टेबल पर पीठ के बल सीधे लेटा दिया जाता है | अब रोगी के आँखों के चारो और उड़द के आटे से बनी पिष्टी से दो अंगुल ऊँची दीवार ( पाल ) बना दी जाती है | रोगी की प्रकृति और रोग के अनुसार चयनित औषध घृत को एक कटोरी में डालकर गरम पानी के द्वारा पिघलाया जाता है | इस औषध घृत को रोगी के नेत्रकोशो पर पलकों के बाल तक भर दिया जाता है | घृत भरने के बाद रोगी को आंखे खोलने और बंद करने को कहा जाता है | इस प्रकार यह क्रिया अलग – अलग रोग एवं प्रकृति के अनुसार आधे मिनट से 4 मिनट तक करवाई जाती है |
सम्यक तरीके से अक्षितर्पण होने पर उड़द के आटे की बनाई गई पाल में छेद कर के औषध सिद्ध घृत को बाहर निकाल लिया जाता है | अक्षितर्पण के पश्चात विरेचन या धूमपान करवाया जाता है ताकि घृत के कारण बढे हुए कफ दोष का शमन हो सके |

तर्पण में सम्यक , हीन और अतियोग के लक्षण 

सम्यक – तर्पण ठीक प्रकार से होने पर रोगी के आँखों में प्रकाश सहने की शक्ति आ जाती है एवं आँखे निर्मल दिखाई पड़ती है |
हीन – तर्पण अगर हीन हुआ है तो इसके विपरीत असर दिखाई पड़ता है |
अतियोग – अधिक तर्पण होने पर कफज विकार उत्पन्न हो जाते है | रोगी की आंखे भारी और सिरदर्द की शिकायत भी हो सकती है |

 

अक्षितर्पण करवाने के पश्चात की क्रियाये 

अक्षितर्पण भली प्रकार से होने के पश्चात | उड़द के आटे की पिष्टी को हटा कर आँखों को अच्छी तरह साफ़ करवाया जाता है | औषध सिद्ध घृत के प्रयोग से कफ दोष उत्पन्न हो जाता है उसके प्रशमन के लिए धुम्रपान करवाया जाता है | रोगी को उष्ण जल से मुंह का प्रक्षालन करने को कहा जाता है | रोगी को धुप , धूल और अधिक प्रकाश वाली जगहों से दूर रखने को कहा जाता है |
अगर आप की भी आँखे कमजोर है | निकट द्रष्टि दोष , दूर द्रष्टि दोष , आँखों से पानी पड़ते रहना , कमजोर आँखे , जल्दी – जल्दी आँखों में इन्फेक्शन होना , धुंधलापन आदि रोगों में अक्षितर्पण एक बेहतरीन विकल्प है | इसलिए इन रोगों में एक बार अपने नजदीकी आयुर्वेदिक क्लिनिक से अक्षितर्पण करवाके देखे | 100% परिणाम मिलेगा |
 
धन्यवाद |

Related Post

मालिश के स्वास्थ्य लाभ / Health Benefits Of Massag... मालिश के फायदेHealth Benefits of Massage आयुर्वेद में मालिश को अभ्यंग कहा जाता है | आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में प्राचीन समय से ही अभ्यंग क...
क्यों अक्षय कुमार follow करते है आयुर्वेद || जाने ... वर्तमान समय में हम आधुनिकता के कारण इतने मुर्ख बन चुके है की जिस धरती पर आयुर्वेद का जन्म हुआ उसी धरा के लोगो ने इस चिकित्सा पद्धति को भुला दिया |...
सोरायसिस (Psoriasis) क्या है ? इसके कारण, लक्षण और... सोरायसिस क्या है ? (What is Psoriasis in Hindi) सोरायसिस - यह रोग त्वचा का बहुत ही सामान्य रोग है जो लगभग 10 साल से ऊपर के लोगों में अधिक देखने को मि...
शीर्षासन / Shirshasana – विधि , फायदे एवं सा... शीर्षासन / Shirshasana योगासनों में सबसे अधिक उपयोगी और फायदेमंद आसन है शीर्षासन | इसीलिए इस आसन को आसनों का राजा भी कहा जाता है | भले ही यह करने में...
Content Protection by DMCA.com

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.