नस्य कर्म से होता है आँख, नाक, गले एवं मस्तिष्क के विकारों का उपचार | जानिए क्या है नस्य कर्म एवं इसके फायदे

नस्य कर्म ऐसा कर्म या काम जो नाक के द्वारा किया जाता हो,अर्थात इसमे नाक के द्वारा ओषधि दी जाती है  और जो नाक के लिए हितकर हो उसे नस्य कर्म कहते है | जत्रु के उपर रहने वाले अर्थात गर्दन के उपर के अंगो के रोगों को समूल नष्ट करने के लिए नाक के द्वारा ओषधि दी जाती है नाक के द्वारा ओषधि  देने से शिर के सभी रोगों का नाश हो जाता है |

यह नेत्र -कर्ण -नासिका के रोग ,बालो का झड़ना ,बालो का असमय सफेद होना, सिरदर्द, मष्तिष्क के रोग, त्वचा पर होने वाली झुरिया, आखो के निचे के काले घेरे, बालों में रुसी होना आदि रोगों को | समूल नष्ट कर देता है | इस कर्म के द्वारा वृद्धावस्था देर से आती है, दांत, बाहू और उर:स्थल अर्थात सीना मजबूत और बलवान होते है | चहेरा कांतिमय रहता है | सिर के रोगों को नष्ट करने के कारण नस्य कर्म को शिरो विरेचन भी कहा जाता है |

नस्य कर्म

र पढ़ें: अभ्यंग क्या है ?

और पढ़ें: रक्तमोक्षण चिकित्सा क्या है ?

नस्य कर्म के फायदे | Health Benefits of Nasya Karma

मष्तिष्क विकारों में नस्य कर्म का महत्व:  जिस प्रकार नाक को शिर का द्वार समझा जाता है इस कारण नाक के द्वारा ओषधि देने से वह सम्पूर्ण शिर में व्याप्त होकर शिर के रोगों का नाश करती है और इससे तुरंत आराम मिलता है |नस्य कर्म से मष्तिष्क विकारो में, शिरदर्द, आधा शिरदर्द में बहुत आराम मिलता है |

नेत्र रोगों में: नेत्र रोग अर्थात आखोँ के रोगों में भी नस्य कर्म का बहुत महत्व है |नस्य कर्म के द्वारा आखों की ज्योति तेज होती है जिससे रतोधी जेसे रोगों भविष्य में भी नहीं होते है ,आखों में पानी गिरना और खुजली होने जेसी समस्या का भी नस्य कर्म समाधान है |

नासिका रोगों में: वात और कफ का शमन होने के कारण नासा द्वार खुल जाते है जिससे स्वसन सम्बन्धी रोगों से छुटकारा मिलता है |

गले के विकारो में: नस्य कर्म से कफ के निकल जाने से गले में खराश होना ,खुजली होना ,कफ के कारण दर्द होना ,गले में टोंसिस होना आदि रोगों में आराम मिलता है | दांत मजबूत होते है |

त्वचा रोगों में: त्वचा पर खुजली,फुसियाँ या दाग होना, समय से पहले झुरियां होना,आखों के निचे काले घेरे होना आदि रोगों में नस्य कर्म का उपयोग बहुत अच्छा रहता है | नस्य कर्म से गर्दन के उपर के अगों का शोधन होने से आखों में तेज प्रतीत होता है और चेहरा सदा कांतिमय रहता है |

त्रिदोषो के शोधन में: शोधन का अर्थ विरेचन से है ,नस्य कर्म के द्वारा शिर का शोधन किया जाता है अर्थात नस्य कर्म से वात ,पित और कफ तीनो दोषों को साम्य्वस्था में लाया जा सकता है | नस्य कर्म से नाक और गले से वातपित युक्त मल को बाहर निकला जाता है जिससे नाक और गले का अवरोध हट जाता है | तीनो दोषों के साम्य्वस्था में रहने के कारण व्र्दाव्स्था देर से आती है |

बालों के विकारों में: शरिर में कफ होने के कारण पोष्टिक तत्व बालों की जड़ो में नहीं पहुच पाते है जिससे  बालों का झड़ना ,असमय बालों का सफेद होना ,गंजापन ,बालों में रुसी होना ,बालों का दो मुँही होना जेसी समस्या उत्पन हो जाती है |नस्य कर्म के द्वारा कफ का निष्कासन हो जाता है जिससे पोष्टिक तत्व बालों की जड़ो तक पहुचकर उन्हें पूरा पोषण देते है और बालों के रोगों से छुटकारा मिलता है |

नस्य कर्म की विधि

नस्य कर्म को सुविधा की द्रष्टि से तीन भागो में पूरा किया जाता है |

  1. पूर्व कर्म
  2. प्रधान कर्म
  3. पश्चात कर्म

1 पूर्व कर्म: पूर्व कर्म अर्थात सबसे पहले यह जानते है की नस्य कर्म करवाने वाले को क्या रोग है अर्थात कोनसे रोग के लिए नस्य कर्म करवा रहा है,उसे पहले से ही कोई गंभीर बीमारी तो नहीं है  |उसके बाद रोगी का तापक्रम ,नाड़ी गति ,श्वसन गति ,रक्तचाप,वजन आदि की जाँच करने के बाद यह जाँच करते है की वह रोगी नस्य कर्म करने के योग्य है की नहीं |जिनकी उम्र 7 वर्ष से कम और 80 वर्ष से ज्यादा हो उन्हें नस्य नहीं दिया जाता है |नस्य कर्म के योग्य होने पर रोगी के बल ,प्रक्रति ,मनोबल के आधार पर नस्य से पहले स्नेहन और स्वेदन पूर्वकर्म किये जाते है |

स्नेहन कर्म _यह कर्म भी दो प्रकार का होता है बाह्य स्नेहन (मालिश करना),आभ्यांतर स्नेहन (इसमे रोगी को घी ,तेल जेसे चिकने द्रव्यों को पिलाया जाता है) |

स्वेदन कर्म _इस कर्म में रोगी के शरिर से उसके स्वेद (पसीना) को बाहर किया जाता है |

2. प्रधान कर्म: इस कर्म में रोगी को पूर्व की और मुख करके लेटाया जाता है ,उसकी आखों पर पट्टी बाधकर रोगी के सिर को पीछे की और झुकाकर नस्य पात्र या ड्राप्स से ओषधि को नासार्न्धो में डालते है यदि ओषधि द्रव रूप में न होकर चूर्ण रूप में हो तो किसी ट्यूब या नलिका में ओषधि चूर्ण को भरकर नाक में फूकते है |यदि धूम नस्य देना होतो ओषधि का धुआं करके धूम्र यंत्र द्वारा नाक से खीचा जाता है |

3. पश्चात कर्म: प्रधान कर्म करने के बाद फिर से रोगी का तापमान ,नाड़ी गति ,श्वसन गति ,वजन आदि की जाँच की जाती है और उसे गर्म जल पिलाया जाता है |उसके बाद उसे लघु आहार का सेवन कराया जाता है |

धन्यवाद |

Leave a Reply

Your email address will not be published.