लौह भस्म – निर्माण विधि, उपयोग एवं सावधानियां

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आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र में भस्मों के द्वारा उपचार की विधा संहिता काल से ही चली आ रही है | भस्मों का अगर सम्यक एवं निर्देशित मात्रा में प्रयोग किया जाए तो यह विभिन्न प्रकार के रोगों में बिना किसी नुकसान के लाभदायी सिद्ध होती है |

लौह भस्म आयुर्वेद की शास्त्रोक्त दवा है | इसका प्रयोग रसायन, वाजीकरण, कान्तिवर्द्धक, बल्य एवं वृष्य होता है | विभिन्न रोगों जैसे यकृत विकार, प्लीहा रोग, पीलिया, रक्त की कमी (एनीमिया), संधिवात आदि में लौह भस्म का प्रयोग अन्य औषधियों के साथ योग स्वरुप किया जाता है |

आयुर्वेद चिकित्सा में लौह भस्म बनाने के लिए तीक्ष्ण एवं कान्त लौहे का प्रयोग किया जाता है | लौह भेद से तीन प्रकार का माना जाता है मुंड लौह, तीक्ष्ण लौह एवं कान्त लौह | मुंड लौह का इस्तेमाल भस्म बनाने के लिए नहीं किया जाता |

लौहे के शोधन की विधि

घटक – लौहे के कष्टक वेधी पत्र – 5 भाग , त्रिफला – 16 भाग एवं जल – 128 भाग |

सबसे पहले त्रिफला को 8 गुना जल में भिगोकर रात भर के लिए रख दिया जाता है| सुबह इसे अग्नि पर चढ़ा कर क्वाथ बनाया जाता है, जब चौथा भाग बचे तब क्वाथ तैयार माना जाता है | अब लौहे के पत्रों को अग्नि पर चढ़ा कर गरम किया जाता है |

अच्छी तरह गरम होने के पश्चात इन पत्रों को त्रिफला क्वाथ में बुझा लेतें है | इस प्रकार से प्रत्येक लौह पत्र को त्रिफला क्वाथ में 7 बार इसी प्रकार बुझाया जाता है | इस प्रकार से लौहे की उत्तम शुद्धि मानी जाती है |

त्रिफला क्वाथ के साथ गोमूत्र समान मात्रा में मिलाकर भी लौहे के शोधन का विधान है | इस विधि में भी लौहे के पत्रों को तीव्र अग्नि पर गरम करके 7 बार त्रिफला क्वाथ एवं गोमूत्र में बुझाने से भी लौहे की उत्तम शोधन माना जाता है |

चलिए अब जानते है लौह भस्म कैसे बनती है | अर्थात आयुर्वेद के शास्त्रों अनुसार लौह भस्म निर्माण की विधि

लौह भस्म

लौह भस्म बनाने की विधि / Making Process in Hindi

भस्म बनाने के लिए शुद्ध तीक्षण एवं कान्त लौहे के जितने चूर्ण से भस्म बनानी हो उसके समभाग त्रिफला क्वाथ में दोगुन जल मिलाकर काढ़े का निर्माण किया जाता है | चौथा भाग बचने पर इसे छान लिया जाता है |

शुद्ध लौह चूर्ण को जल से प्रक्षालित करके एक खरल में डालकर उसमे त्रिफला क्वाथ को डालकर धुप में रख दिया जाता है | जब यह क्वाथ सुख जाता है तो फिर इसी प्रकार से त्रिफला क्वाथ को भर दिया जाता है | इस प्रकार से 7 बार यह प्रक्रिया दोहराई जाती है |

– अब लौह चूर्ण को अच्छी तरह जल से धोकर एक कड़ाही या हांड़ी में डालकर एवं त्रिफला क्वाथ डालकर अग्नि पर तीव्र पाक किया जाता है | जब क्वाथ सुख जाता है तब इसमें शतावरी या भृंगराज आदि कषाय डालकर फिर से तेज अग्नि पर पाक किया जाता है |

अब तीसरे पाक अर्थात पुटपाक हेतु इस लौहे के चूर्ण को जल से अच्छी तरह धोया जाता है | दोषों को दूर करने के लिए अन्य औषधियों के साथ खरल में मर्दन किया जाता है | अच्छी तरह मर्दन करके इसकी चक्रिकाएं बना कर सुखा लिया जाता है |

इन चक्रिकाओं को सरावसम्पुट में गजपुट उपलों के द्वारा पाक किया जाता है | ठन्डे होने पर निकाल कर फिर से पुटपाक दिया जाता है | जितने अधिक पुट दिए जाते है उतनी ही अच्छी लौह भस्म का निर्माण होता है |

पुट के आधार पर ही लौह भस्म सतपुटी (100 पूट) एवं लौह भस्म सहस्त्र्पुटी (1000 पुट) आदि का निर्माण होता है |

लौह भस्म का निरुत्थिकरण एवं परिक्षण

तैयार होने के पश्चात इसका निरुत्थिकरण एवं परिक्षण किया जाता है ताकि यह नुकसानदायक न हो | क्योंकि अशुद्ध लौह भस्म विभिन्न प्रकार के उपद्रव पैदा करके मृत्यु तक कर सकती है | अत: निरुत्थिकरण आवश्यक होता है |

लोहा भस्म, गोघृत एवं शुद्ध गंधक इन सभी को समान मात्रा में मिलाकर ग्वारपाठे की भावना दी जाती है | शुष्क होने पर गजपुट में पाक किया जाता है | इस विधि के द्वारा इसका निरुथिकरण हो जाता है |

अब इसे मित्रपंचक के साथ मिलाकर धमन करने पर यदि कोई परिवर्तन नहीं होता है तो इसे सम्यक भस्म माना जाता है एवं यह सेवन यौग्य होती है |

स्वास्थ्य उपयोग / Loh bhasma Uses In Hindi

  • रक्त की कमी अर्थात एनीमिया में यह अत्यंत लाभदायक आयुर्वेदिक दवा है |
  • रक्त में हिमोग्लोबिन की मात्रा को बढाती है |
  • शारीरिक दौर्बल्यता को दूर करके शरीर को बल प्रदान करने का कार्य करती है |
  • यकृत के विकारों में उपयोगी है | यह लीवर वृद्धि आदि रोगों में उपयोग में ली जाती है |
  • रक्तस्राव के कारण आई दुर्बलता को दूर करने में लौह भस्म फायदेमंद होती है | यह रक्त स्राव के कारण आई दुर्बलता को तीव्रता से दूर करती है |
  • पुरुषों के विकार जैसे यौन दुर्बलता एवं स्वपन दोष आदि में फायदेमंद है |
  • आँतों में कीड़ो के कारण आई रक्ताल्पता में लोहा भस्म उपयोगी है |
  • मोटापे की समस्या में भी अन्य औषधियों के साथ योग स्वरुप इस भस्म का प्रयोग किया जाता है |
  • अपच एवं अजीर्ण के कारण आई भूख की कमी में भी यह भस्म उपयोगी दवा साबित होती है |

उपयोग एवं सेवन की विधि

इसका सेवन आयुर्वेदिक चिकित्सक के निर्देशानुसार करना चाहिए | एक व्यस्क व्यक्ति के लिए इसकी सेवन की मात्रा 125 MG से 250 MG तक होती है | गर्भवती महिलाओं एवं बच्चों को इसका सेवन निषेध है |

अनुपान स्वरुप शहद, मक्खन, दूध एवं त्रिफला क्वाथ आदि का उपयोग करवाया जाता है

लौह भस्म के उपयोग की सावधानियां

भस्म आदि आयुर्वेदिक दवाओं का सेवन चिकित्सा निर्देशित मात्रा में ही करना चाहिए | अगर भस्म पूर्णत: शुद्ध है तो यह निर्देशित मात्रा में सेवन करना पूरी तरह सुरक्षित है | लेकिन शास्त्रों के अनुसार न बनी होने अर्थात अशुद्ध लौह भस्म स्वास्थ्य के लिए नुकसान दाई हो सकती है |

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