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जानें योग के द्वारा जीवन जीने की कला

योग का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में कुछ आसन, प्राणायाम, क्रियाएं एवं सांसो का उतार चढाव आदि दृश्य आने लगते है | लेकिन क्या ये कुछ आसन एवं क्रियाएं ही योग है ?

योग क्या है
yoga

जी बिल्कुल नहीं ! अगर आप ऐसा सोचते है तो निश्चिंत ही आप गलत है | हमें गर्व होना चाहिए कि सम्पूर्ण विश्व में प्रतिवर्ष 21 जून को मनाया जाने वाला योग दिवस हम भारतियों की ही देन है |

योग इन आसनों एवं क्रियाओं से कंही अधिक है | अगर व्यक्ति योग को जीवन में अजमाए तो इसे शुद्द जीवन जीने की कला या आधार कह सकते है |

गीता में कहा गया है कि ” योग स्वयं की स्वयं के माध्यम से स्वयं तक पहुँचने की यात्रा है” | इस सूत्र अर्थात कथन में योग का सम्पूर्ण सार छिपा है | इसे आप एक पूर्ण अध्यात्मिक विज्ञानं, चिकित्सा शास्त्र एवं जीवन शास्त्र कह सकते है |

योग के कुछ आसन एवं क्रियाएं आदि तो मात्र इसकी सतही सीमाएं है | इसका मुख्य उद्देश्य तो शुद्ध सात्विक जीवन जीते हुए आत्मा से परमात्मा होना है | इसे आत्मसात करके जीवन – जीने की शुद्ध सात्विक कला को जाना जा सकता है |

कैसे योग से जीवन जीने की कला सीख सकते है

सबसे पहले यह जान लेना चाहिए कि योग सभी धर्मो से ऊपर है | यह किसी एक धर्म का विशेष अवयव नहीं है | इसे धार्मिक मानना एवं बनाना दोनों की गलत सोच का परिणाम है | जीवन जीने की कला के रूप में योग को समझने के लिए इस उदाहरण को आप देख सकते है |

1 . मानव अवस्था

मानव शरीर की एक अवस्था है कि जैसा हम सोचते है वैसा ही घटित होता है | उदाहरण के लिए अगर हमें अधिक क्रोध आता है तो आप देखेंगे की शरीर भी वैसी ही क्रियाएं करने लगता है | आँखे लाल हो जाती है, इनकी भोंहे तन जाती है | व्यक्ति का रक्त संचार बढ़ जाता है | व्यक्ति की उर्जा अनावश्यक रूप से नष्ट होने लगती है | वह मानसिक तनाव का रोगी हो जाता है |

इस प्रकार से उसकी सामाजिक छवि भी बिगड़ जाती है | उसे कोई पसंद नहीं करता | अपनी कमजोरियों के लिए वह नशे की तरफ बढ़ जाता है | नशे से पारिवारिक कलेस, धन की हानि एवं समाज में घ्रणित हो जाता है | इस प्रकार से व्यक्ति अपनी जिंदगी को जीते जी नरक बना लेता है |

योग कहता है कि तुम जैसे भी हो अन्दर से शुद्ध एवं स्पष्ट हो | अपनी आदतों को सुधारों जीवन जीने की सही कला सीखो | अपनी बुरी आदतों को छोड़ दो | शरीर एवं आत्मा के स्वास्थ्य के लिए मेहनत करो | सभी से प्रेम करो, क्रोध, लोभ, मोह एवं माया से छुटकारा पाओ | किसी से अपेक्षाएं मत रखो एवं स्वयं को जानो |

अब तुम देखोगे की जैसे ही तुमने इन्हें आत्मसात किया | सब कुछ बदला – बदला लग रहा है | किसी पर क्रोध करने का कोई कारण विद्यमान नहीं है | तुम्हे सारा संसार शांत दिखाई पड़ेगा | धीरे – धीरे अध्यात्म में रूचि बढ़ेगी एवं मोक्ष को प्राप्त होवोगे |

2. ‘यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे’

‘यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे’ यह कथन उपनिषद में कहा गया है | इस छोटे से कथन में गूढ़ बाते छिपी है | इस कथन का तात्पर्य है कि हमारा शरीर ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति ही है , अर्थात मनुष्य शरीर को छोटा ब्रह्माण्ड माना जा सकता है | क्योंकि जो शक्तियां एवं तत्व ब्रह्माण्ड का निर्माण करते है उन्ही शक्तियों एवं तत्वों से मनुष्य शरीर का निर्माण होता है |

अब हम देखते है कि पृथ्वी का वातावरण असंतुलित एवं दूषित होता जा रहा है | इससे हमारा ब्रह्माण्ड भी बीमार हो गया है | कहीं प्राकृतिक विपदाएं आ रही है तो कंही कुछ अन्य घटनाएँ घटित हो रही है | इसी प्रकार से गलत आहार – विहार से हमारा ब्रह्माण्ड रूपी शरीर एवं आत्मा भी अस्वस्थ हो गए है |

अगर शुद्ध सात्विक आहार – विहार करते हुए संतुलित जीवन जीया जाए एवं योग को आत्मसात किया जाये तो व्यक्ति अपने जीवन को निरोगी एवं सफल बना सकता है |

आप सभी रीडर्स को “21 जून योग दिवस” की हार्दिक शुभकामनाएं |

धन्यवाद |

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