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कुटकी क्या है – जानें इसके औषधीय गुण एवं फायदे

कुटकी / Picrorrhiza Kurrooa 

परिचय – इस औषधि को विभिन्न भाषाओँ में अलग – अलग नामों से जाना जाता है | हिंदी में इसे काली कुटकी, कडवी आदि एवं संस्कृत में तिक्ता, कान्ड़ेरुहा, चक्रंगी, कृष्णभेदी, चित्रांगी आदि नामों से जाना जाता है | यह औषधि हिमालय पर 9000 से 15000 फीट तक काश्मीर से लेकर सिक्किम के क्षेत्रों में अधिक पाई जाती है |

यह के मूल्यवान कटु पौष्टिक औषधि है | इसकी पतियाँ अंडे के समान आकार वाली होती है जिनके नीचे का भाग बड़ा एवं साइड से कटी हुई होती है | पतियों की लम्बाई 2 से 4″ तक होती है | इसके फुल पीले और गुच्छों में लगते है | कुटकी की जड़ एक अंगुल जितनी लम्बी और मच्छली के सदर्श (समान रूपवाली) होती है | पीली और काली इस प्रकार से इसके दो भेद होते है |

कुटकी

बाजार से खरीदते समय इस औषधि के बारे में ध्यान रखना चाहिए की इसके स्थान पर कडू नामक औषधि पकड़ा दी जाती है जो इसी के सामान होती है | लेकिन इस कडू औषधि का अधिक सेवन नुकसान दाई होता है | पहचान के लिए कुटकी की जड़ गहरे उदई रंग की होती है एवं 1 से 2 इंच तक लम्बी होती है | यह के तरफ से मोटी और एक तरफ से पतली मच्छली के आकार की होती है |

कुटकी के औषधीय गुण 

आयुर्वेद के अनुसार इसका रस तिक्त एवं कटू होता है | स्वभाव में शीतल होती है | गुणों में लघु एवं दीपन – पाचन गुणों से युक्त होती है | कुटकी का विपाक भी कटु एवं तिक्त होता है | यह बुखार खत्म करने वाली, दस्त लगाने वाली, कीड़ों को नष्ट करने वाली, क्षुधावर्द्धक, कफ एवं पित्त, मूत्ररोग, दमा हिचकी, जलन आदि में उपयोगी सिद्ध होती है |

रस – कटु

गुण – लघु एवं दीपन – पाचन |

वीर्य – शीत |

विपाक – कटु |

कुटकी के फायदे एवं स्वास्थ्य उपयोग 

आयुर्वेद के अनुसार यह एक उत्तम औषधि है जो बदहजमी, उदर रोग, हिचकी, आँतों की समस्या एवं कब्जियत रामबाण साबित होती है | इसके कटू पौष्टिक गुणों के कारण रस क्रिया को शुद्ध करती है एवं दीपन एवं पाचन गुणों से युक्त होती है | इसके अनुलोमिक धर्म की वजह से दस्त साफ़ लगता है अर्थात यह उत्तम विरेचक गुणों से युक्त होती है | आयुर्वेद चिकित्सा में इसके इस्तेमाल से विभिन्न औषधियां जैसे कुटकी वटी आदि का निर्माण किया जाता है |

  1. कुटकी के चूर्ण में बराबर मात्रा में शक्कर मिलाकर गर्म जल के साथ लेने से खुलकर दस्त लगते है |
  2. पितज ज्वर में कुटकी और नीम की छाल को मिलाकर क्वाथ तैयार करलें | इस क्वाथ को सुबह – शाम सेवन करने से जल्द ही ज्वर एवं तृष्णा से मुक्ति मिलती है |
  3. जिन लोगों को भूख कम लगती है | वे कुटकी के चूर्ण में सोंठ मिलाकर सेवन करने से सब प्रकार की मन्दाग्नि का नाश होकर खुलकर भूख लगती है |
  4. कुटकी चूर्ण का सेवन करने से बढ़ी हुई तिल्ली की समस्या खत्म होती है |
  5. अजीर्ण , अपच एवं बदहजमी के कारण पेट में दर्द होतो काली मिर्च के साथ बराबर मात्रा में कुटकी चूर्ण मिलाकर सेवन करने से पेटदर्द में आराम मिलता है |
  6. 20 ग्राम कुटकी को 250 ग्राम पानी में उबाल कर इसका क्वाथ बना लें | अब तिल तेल एवं बराबर मात्रा में यह क्वाथ लेकर आंच पर चढ़ा दें | जब तेल से सारा जल उड़ जाए तो इसे निचे उतारकर ठंडा करलें | इस कुटकी तेल की मालिश पेट एवं छाती पर करने से स्नायु की समस्या मिटती है |
  7. पीलिया रोग में भी आयुर्वेदिक चिकित्सक इसका बेहतरीन उपयोग बताते है | कुटकी चूर्ण की 3 माशे की मात्रा में मिश्री मिलाकर कुच्छ दिनों तक सेवन करने से पीलिया का रोग मिटाता है | यही प्रयोग दमे के रोग में करने से भी आराम मिलता है |
  8. श्वांस एवं कास (खांसी) में कुटकी और पीपल की छाल को लेकर इनका क्वाथ बना लें | इस क्वाथ के सेवन से श्वास की समस्या एवं बार – बार आने वाली खांसी में तुरंत रहत मिलती है |
  9. हिचकी अगर नहीं रुक रही हो तो यह अमाशय एवं पाचन की गड़बड़ी का परिणाम होती है | कुटकी चूर्ण को 2 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ मिलाकर चाटने से तुरंत आराम मिलता है | हिचकी आना बंद हो जाती है |
  10. जिन्हें भयंकर कब्ज की शिकायत रहती उन्हें कुटकी के क्वाथ का सेवन करना चाहिए | जलोदर की समस्या में दिन में तीन बार सेवन करने से अच्छी तरह दस्त लगकर इस रोग का नाश हो जाता है |
  11. कुटकी की जड़, मुलहठी, द्राक्षा एवं नीम की छाल आधा – आधा तोला लेकर 32 तोले पानी में औटाकर आठ टोला रहने पर छान कर पिने से ज्वर मिटाता है |

“स्वदेशी उपचार” शुद्ध आयुर्वेद को बढ़ावा देने का एक विकल्प है | ऑनलाइन बाजार में बहुत सी फर्जी वेबसाइट आयुर्वेद का नाम लेकर लोगों को गुमराह कर रही है | इनके पास आयुर्वेद के नाम पर कुच्छ नही है | अत: इस प्रकार की वेबसाइट से बचें | ये आपके ज्ञान को बढ़ाने की वजाय कुपित करती है | 

धन्यवाद 

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