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अपामार्ग

अपामार्ग (चिरचिटा) क्या है || जाने इसका सम्पूर्ण परिचय एवं फायदे या उपयोग

अपामार्ग / Apamarg (Achyranthes aspera Linn.)

updated – 26/10/2018

भारत में वर्षा ऋतू के साथ ही बहुत सी वनौषधियाँ पनपने लगती है | अपामार्ग जिसे चिरचिटा, चिंचडा या लटजीरा आदि नामों से जाना जाता है | यह भी एक वर्षायु पौधा है, जो प्राय: सम्पूर्ण भारत में वर्षा ऋतू के समय अपने आप जंगलों, बंजर भूमि, सड़क के किनारे या कूड़ा – करकट वाली जगह उग आता है | भारत में कई जगहों पर यह बारह माशी भी रहता है |

अपामार्ग का पौधा परिचय – इसका पौधा 1 से 3 फीट तक ऊँचा होता है | इसका कांड (तना) सरल एवं सीधा होता है पर्वों पर इसकी शाखाएं मोटी होती है | इसके पते 3 से 5 इंच लम्बे गोल, अंडाकार एवं आगे से नुकीले होते है | पौधे की शाखा एवं पते सूक्षम सफ़ेद रोमों से युक्त होती है | अपामार्ग की पुष्प मंजरी लगभग 1 फुट तक लम्बी होती है , जिसपर लाल, गुलाबी फुल लगे रहते है |

पौधे के इसी पुष्प दंड पर फल लगते है जो उलटे कर्म में होते है | इसके फल कांटेदार होते है जो कपड़ो पर आसानी से चिपक जाते है | इसी कारणवस इसे चिरचिटा या चिंचडा कहते है | शीत ऋतू में इसपर पुष्प एवं फल लगते है एवं ग्रीष्म ऋतू आने पर इसके फल पककर गिर जाते है |

अपामार्ग के फलों के भीतर से चावल के समान दाने निकलते है , जिन्हें “अपामार्गतन्डूलक” कहा जाता है | इस पौधे की पहचान का सबसे आसान तरीका इसके फल होते है | आप निचे दिए गए चित्र से भी इसे पहचान सकते है |

अपामार्ग

अपामार्ग के प्रकार

चिरचिटा या ओंघा मुख्यत: दो प्रकार का होता है – सफ़ेद अपामार्ग और लाल | वैसे गुणों में इन दोनों ही को समान माना जाता है | सिर्फ पौधे के रंग के आधार पर इन्हें सफ़ेद और लाल इन दो प्रकारों में बाँट दिया गया है | सफ़ेद अपामार्ग का तना, शाखा एवं पते हरे और सफेदी युक्त होते है एवं दुसरे प्रकार में तना, कांड एवं शाखाओं पर हलकी लालिमा होती है |

लाल एवं सफ़ेद अपामार्ग में रंग के भेद के अलावा बीजों में मुख्य अंतर देखा जा सकता है | लाल चिरचिटा के बीजों पर ऊपर की तरफ कांटे (नुकीले) युक्त होते है , जबकि श्वेत अपामार्ग के बीज जौ के बीजों के समान लम्बे होते है |

चिरचिटा के गुण – धर्म

रस – कटु, चरपरा |

गुण – लघु, रुक्ष एवं तीक्षण |

वीर्य – उष्ण |

विपाक – कटु |

इसको उत्तम वामक एवं दस्तावर औषधि माना जाता है | यह दीपन, रुचिकारक, कफनाशक, वात एवं हृदय रोग नाशक माना जाता है | इसका नस्य लेने से मष्तिष्क के कीड़े खत्म होते है | आयुर्वेद चिकित्सा में इसे नस्य, वमन, दाद, खाज-खुजली एवं रक्त शोधक माना जाता है |

रासायनिक संगठन

इसकी राख में विशेषत: पोटाश होता है | इसके अलावा चुना, लौह, क्षार आदि भी कुछ मात्रा में मिलते है | ये सभी तत्व इसकी जड़ की राख में सर्वाधिक पाए जाते है | पौधे की पतियों में भी मिलते है लेकिन इनका अनुपात जड़ की अपेक्षा कम होता है | बाजार में विभिन्न कम्पनियां इसके योग से अपामार्ग क्षार एवं तेल का निर्माण करती है | जिसका आयुर्वेद में चिकित्सकीय उपयोग किया जाता है |

विभिन्न भाषाओँ में नाम

संस्कृत – अपामार्ग (दोषों का संशोधक), शिखरी, अध: शल्य, मयूरक, खरमंजरी, प्रत्यकपुष्पा और अघट |

हिंदी – चिडचिडी, चिरचिटा, चिचड़ा, लटजीरा आदि |

बंगाली – अपांग |

मराठी – कटलती |

गुजराती – अघेडों |

तमिल – नाजुरिवी |

तेलगु – उत्तरेन |

अंग्रेजीPrickly chaff Flower.

लैटिनAchyranthes aspera Linn.

चिकित्सा में उपयोगी अंग एवं रोग प्रभाव

चिकित्सा में इसके मूल (जड़) एवं पंचांग का प्रयोग किया जाता है | इसकी मूल से क्षार का निर्माण होता है | पंचांग से स्वरस आदि का निर्माण किया जाता है | आयुर्वेद में इसे कफवातशामक, कफपितशंशोधन , दीपन एवं पाचन गुणों से युक्त माना जाता है एवं इन रोगों में इसका चिकित्सकीय उपयोग भी किया जाता है |

अपामार्ग के फायदे या उपयोग

  • इससे निर्मित क्षार को शहद के साथ सेवन करने से श्वास, कास एवं गुल्म आदि रोगों में तीव्रतम लाभ मिलता है |
  • इसकी जड़ को जलाकर भस्म बना ले | इसका सेवन पानी के साथ करने से संतान प्राप्ति की इच्छा पूर्ण होती है |
  • कफज विकार जैसे श्वास, खांसी एवं जुकाम में इसके पंचांग का क्वाथ बना कर सेवन करने से लाभ मिलता है |
  • पितज विकारों में भी यह अत्यंत फायदेमंद औषधि है | दीपन एवं पाचन के लिए इसकी जड़ का क्वाथ भोजन से पूर्व सेवन करना चाहिए | यह शरीर में बढ़ें हुए पित्त का संतुलन करने का कार्य करता है |
  • भोजन करने के पश्चात इसके पंचांग का गरम – गरम क्वाथ सेवन करने से शरीर में अम्लता का नाश होता है एवं साथ ही जमे हुए श्लेष्मा का निष्काशन होता है |
  • कटे – जले या किसी जहरीले जीव के काटने पर अपामार्ग के पतों या पंचांग का कल्क बना कर लेप करने से लाभ मिलता है |
  • सर्प, बिच्छु या कुते आदि के काटने पर चिचड़ा अर्थात चिरचिटा की जड़ को पानी में पीसकर पीलाने से लाभ मिलता है |
  • जोड़ो की सुजन में इसके पतों को पानी में पीसकर लेप करने से लाभ मिलता है |
  • आदिवासी दांतों की समस्या में भी इसका सेवन करते है | डंठल की दान्तुन बना कर उपयोग करने से दांतों में होने वाले दर्द से आराम मिलता है |
  • अपामार्ग के पंचांग का स्वरस निकाल कर नहाने के जल में मिलाए | इससे चर्म रोगों में फायदा मिलता है |

अपामार्ग से आयुर्वेदिक चिकित्सा 

  1. पुरानी दिमागी बीमारियों, पीनस रोग एवं अर्धाव्भेधक (आधे सिर का दर्द) आदि पीड़ादाई बिमारियों के कारण जब मष्तिष्क में कफ इक्कठा हो जाता है एवं कोई अन्य औषधि कार्य नहीं करती उस समय अपामार्ग के बीजों का चूर्ण करके रोगी को कुच्छ समय सुंघाने से मष्तिष्क में इक्कट्ठा कफ नाक के माध्यम से निकलने लगता है | अगर मष्तिष्क में कफ अधिक समय तक रहता है तो वहाँ पर कीड़े पड़ जाते है | इस चूर्ण को सूंघने से कीड़े मर कर झड़ने लगते है |
  2. जिन महिलाओं को प्रसव में देरी हो रही हो तो अपामार्ग की जड़ को – किसी लकड़ी के बने औजार (लोहे के बने औजार का विपरीत प्रभाव पड़ता है) से पुष्य नक्षत्र में खोदकर महिला के कमर पर किसी धागे की सहायता से बांध देना चाहिए | इससे प्रसव जल्दी होता है | लेकिन यह निपुण वैद्य को ही करना चाहिए | क्योंकि लम्बे समय तक बंधे रहने या किसी विपरीत प्रभाव के कारण ग्रभास्य बाहर आने का डर रहता है | अत: इस चिकित्सा का प्रयोग केवल चिकित्सक ही कर सकते है |
  3. अपामार्ग की जड़ कफ, खांसी एवं दमे को नष्ट करने की चमत्कारिक शक्ति रखती है | इसके सूखे पतों का धूमपान लेने से दमे में लाभ मिलता है |
  4. यह औषधि विषनाशक है | बिच्छु के काटे स्थान पर इसके पतों का रस लगाने से जहर उतर जाता है | अपामार्ग की जड़ को कूटकर इसका रस पानी में मिलाकर पिलाने से जल्द ही बिच्छु का जहर उतरने लगता है |
  5. कान से कम सुनाई देता हो या कोई कान का रोग हो तो उसमे अपामार्ग की जड़ का रस निकाल कर बराबर मात्रा में तिल का तेल मिलालें | अब इसे अग्नि पर गरम करके जल भाग को उड़ा दें | जब सारा जल उड़ जाए तो बचे हुए तेल की 2 – 2 बूंद कान में डालने पर कान से अच्छी तरह सुनाई देने लगता है |

सेवन की विधि 

चिकित्सकीय उपयोग करते समय इसके स्वरस का 10 से 20 मिली. तक एवं इससे निर्मित क्षार का इस्तेमाल 1/2 से 2 ग्राम तक किया जा सकता है | रोगानुसार सेवन के लिए वैद्य से परामर्श अवश्य लेना चाहिए |

धन्यवाद ||

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