अपामार्ग (चिरचिटा) क्या है || जाने इसका सम्पूर्ण परिचय एवं फायदे या उपयोग

अपामार्ग / Apamarg (Achyranthes aspera Linn.)

भारत में वर्षा ऋतू के साथ ही बहुत सी वनौषधियाँ पनपने लगती है | अपामार्ग जिसे चिरचिटा, चिंचडा या लटजीरा आदि नामों से जाना जाता है | यह भी एक वर्षायु पौधा है, जो प्राय: सम्पूर्ण भारत में वर्षा ऋतू के समय अपने आप जंगलों, बंजर भूमि, सड़क के किनारे या कूड़ा – करकट वाली जगह उग आता है |

अपामार्ग का पौधा परिचय – इसका पौधा 1 से 3 फीट तक ऊँचा होता है | इसका कांड (तना) सरल एवं सीधा होता है पर्वों पर इसकी शाखाएं मोटी होती है | इसके पते 3 से 5 इंच लम्बे गोल, अंडाकार एवं आगे से नुकीले होते है | पौधे की शाखा एवं पते सूक्षम सफ़ेद रोमों से युक्त होती है | अपामार्ग की पुष्प मंजरी लगभग 1 फुट तक लम्बी होती है , जिसपर लाल, गुलाबी फुल लगे रहते है |

पौधे के इसी पुष्प दंड पर फल लगते है जो उलटे कर्म में होते है | इसके फल कांटेदार होते है जो कपड़ो पर आसानी से चिपक जाते है | इसी कारण वस् इसे चिरचिटा या चिंचडा कहते है | शीत ऋतू में इसपर पुष्प एवं फल लगते है एवं ग्रीष्म ऋतू आने पर ये फल पककर गिर जाते है |

अपामार्ग के फलों के भीतर से चावल के समान दाने निकलते है , जिन्हें “अपामार्गतन्डूलक” कहा जाता है | इस पौधे की पहचान का सबसे आसान तरीका इसके फल होते है | आप निचे दिए गए चित्र से भी इसे पहचान सकते है |

अपामार्ग

अपामार्ग के प्रकार

चिरचिटा या ओंघा मुख्यत: दो प्रकार का होता है – सफ़ेद अपामार्ग और लाल | वैसे गुणों में इन दोनों ही को समान माना जाता है | सिर्फ पौधे के रंग के आधार पर इन्हें सफ़ेद और लाल इन दो प्रकारों में बाँट दिया गया है | सफ़ेद अपामार्ग का तना, शाखा एवं पते हरे और सफेदी युक्त होते है एवं दुसरे प्रकार में तना, कांड एवं शाखाओं पर हलकी लालिमा होती है |

चिरचिटा के गुण – धर्म

रस – कटु |

गुण – लघु, रुक्ष एवं तीक्षण |

वीर्य – उष्ण |

विपाक – कटु |

रासायनिक संगठन

इसकी राख में विशेषत: पोटाश होता है | इसके अलावा चुना, लौह, क्षार आदि भी कुछ मात्रा में मिलते है | ये सभी तत्व इसकी जड़ की राख में सर्वाधिक पाए जाते है | पौधे की पतियों में भी मिलते है लेकिन इनका अनुपात जड़ की अपेक्षा कम होता है | बाजार में विभिन्न कम्पनियां इसके योग से अपामार्ग क्षार एवं तेल का निर्माण करती है | जिसका आयुर्वेद में चिकित्सकीय उपयोग किया जाता है |

विभिन्न भाषाओँ में नाम

संस्कृत – अपामार्ग (दोषों का संशोधक), शिखरी, अध: शल्य, मयूरक, खरमंजरी, प्रत्यकपुष्पा और अघट |

हिंदी – चिडचिडी, चिरचिटा, चिचड़ा, लटजीरा आदि |

बंगाली – अपांग |

मराठी – कटलती |

गुजराती – अघेडों |

तमिल – नाजुरिवी |

तेलगु – उत्तरेन |

अंग्रेजीPrickly chaff Flower.

लैटिनAchyranthes aspera Linn.

चिकित्सा में उपयोगी अंग एवं रोग प्रभाव

चिकित्सा में इसके मूल (जड़) एवं पंचांग का प्रयोग किया जाता है | इसकी मूल से क्षार का निर्माण होता है | पंचांग से स्वरस आदि का निर्माण किया जाता है | आयुर्वेद में इसे कफवातशामक, कफपितशंशोधन , दीपन एवं पाचन गुणों से युक्त माना जाता है एवं इन रोगों में इसका चिकित्सकीय उपयोग भी किया जाता है |

अपामार्ग के फायदे या उपयोग

  • इससे निर्मित क्षार को शहद के साथ सेवन करने से श्वास, कास एवं गुल्म आदि रोगों में तीव्रतम लाभ मिलता है |
  • इसकी जड़ को जलाकर भस्म बना ले | इसका सेवन पानी के साथ करने से संतान प्राप्ति की इच्छा पूर्ण होती है |
  • कफज विकार जैसे श्वास, खांसी एवं जुकाम में इसके पंचांग का क्वाथ बना कर सेवन करने से लाभ मिलता है |
  • पितज विकारों में भी यह अत्यंत फायदेमंद औषधि है | दीपन एवं पाचन के लिए इसकी जड़ का क्वाथ भोजन से पूर्व सेवन करना चाहिए | यह शरीर में बढ़ें हुए पित्त का संतुलन करने का कार्य करता है |
  • भोजन करने के पश्चात इसके पंचांग का गरम – गरम क्वाथ सेवन करने से शरीर में अम्लता का नाश होता है एवं साथ ही जमे हुए श्लेष्मा का निष्काशन होता है |
  • कटे – जले या किसी जहरीले जीव के काटने पर अपामार्ग के पतों या पंचांग का कल्क बना कर लेप करने से लाभ मिलता है |
  • सर्प, बिच्छु या कुते आदि के काटने पर चिचड़ा अर्थात चिरचिटा की जड़ को पानी में पीसकर पीलाने से लाभ मिलता है |
  • जोड़ो की सुजन में इसके पतों को पानी में पीसकर लेप करने से लाभ मिलता है |
  • आदिवासी दांतों की समस्या में भी इसका सेवन करते है | डंठल की दान्तुन बना कर उपयोग करने से दांतों में होने वाले दर्द से आराम मिलता है |
  • अपामार्ग के पंचांग का स्वरस निकाल कर नहाने के जल में मिलाए | इससे चर्म रोगों में फायदा मिलता है |

सेवन की विधि 

चिकित्सकीय उपयोग करते समय इसके स्वरस का 10 से 20 मिली. तक एवं इससे निर्मित क्षार का इस्तेमाल 1/2 से 2 ग्राम तक किया जा सकता है | रोगानुसार सेवन के लिए वैद्य से परामर्श अवश्य लेना चाहिए |

धन्यवाद ||

 

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