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शिवलिंगी बीज 

परिचय – शिवलिंगी बरसात में पैदा होने वाली एक लता है | जो समस्त भारत वर्ष में बाग़ – बगीचों में देखि जा सकती है | यह चमकीली एवं चिकनी बेल होती है | शिवलिंगी की शाखाएं पतली होती है जो किसी दुसरे पेड़ के सहारे उपर चढ़ती है , इन शाखाओं पर रेखाए भी होती है |

शिवलिंगी के पत्र 1/2 से 3 इंच तक लम्बे होते है , ये हरे रंग के एवं सफेद रोमयुक्त खुरदरे होते है | इसकी शाखाओं पर छोटे – छोटे हरित पित वर्णी फुल लगते है | शिवलिंगी के फल गोलाकार होते है ये कची अवस्था में हरे एवं पकने पर लाल रंग के हो जाते है | इनके फलों को सामान्य भाषा में कंकाली भी कहा जाता है | इन्ही फलों को मसलने से शिवलिंगी के बीज प्राप्त होते है जिनका औषधीय उपयोग आयुर्वेद में किया जाता है |

वैसे शिवलिंगी का पौधा ही आयुर्वेद में उपयोगी माना गया है | इसके पंचांग का विभिन्न रोगों में उपयोग किया जाता है |

शिवलिंगी के औषधीय गुण धर्म 

शिवलिंगी के बीज गर्भ संस्थापक होते है | इसका रस कषाय एवं चरपरा होता है | यह उष्ण वीर्य की होती है | गुणों में यह स्निघ्ध होती है | इसके बीज उत्तम रक्त शोधक, त्वचा विकार नाशक, खून के बहाव को रोकने वाली , प्लीहा रोग नाशक होती है |

शिवलिंगी बीज के उपयोग या फायदे 

  • गर्भसंस्थापक – जिन महिलाओं की संतान जीवित न रहती हो या गर्भ न ठहरता हो वे शिवलिंगी के 27 बीज, गजकेशरी 6 ग्राम, पीपल की जटा 6 ग्राम – इन तीनो को पीसकर चूर्ण बना ले | अब इस चूर्ण की तीन टिकियाँ बना ले | गाय के दूध की खीर बना कर एवं इस खीर में गाय के दूध से निकाला हुआ घी डालकर साथ ही शक्कर डालें | अब इस तैयार खीर में यह एक पुडिया चूर्ण एवं 6 शिवलिंगी के बीज डालदें | पति के साथ सहवास करने के पश्चात इस खीर का सेवन करे | इस प्रकार से तीन दिन तक सेवन करने से गर्भ ठहर जाता है |
  • बार – बार गर्भ गिरना – जिन महिलाओं का न ठहरता हो अर्थात बार – बार गर्भ गिर जाता हो , वे मासिक धर्म के बाद शिवलिंगी के 1 बीज से शुरुआत करके प्रत्येक दिन एक – एक बीज बढ़ा कर 21 दिन तक शिवलिंगी के 21 बीज तक सेवन करना चाहिए | इससे गर्भ ठहर जाता है एवं गर्भ नहीं गिरता |
  • शिवलिंगी के फलों को साफ़ करके तेल में छोंक ले | इन फलों को 8 से 10 की मात्रा में खाने से कब्ज की समस्या खत्म होती है | साथ ही प्लीहा, कोढ़, विष, रक्तदोष, आंव, उदररोग आदि रोगों में लाभ मिलता है |
  • पित्त प्रकोप या पित्त ज्वर में शिवलिंगी के बेल का रस दूध और शक्कर के साथ सेवन करने से पित्त ज्वर का नाश होता है |
  • पुत्र प्राप्ति के लिए कहा गया है कि शिवलिंगी के बीज का 6 ग्राम चूर्ण और शंखपुष्पि की जड़ का 20 ग्राम चूर्ण – दोनों को मिलाकर मासिक धर्म के चौथे दिन से 5 ग्राम की मात्रा में सेवन करवाना चाहिए | पुत्र की प्राप्ति होती है | वैसे आज के समय में किवंदिती प्रतीत होती है | क्योंकि लड़के और लड़की का निर्धारण x एवं y गुणसूत्र के मिलान से होता है | अत: पुत्र प्राप्ति का यह नुस्खा गलत प्रतीत होता है , लेकिन हाँ इसके सेवन से गर्भ के सभी विकार दूर होते है |
  • शरीर की कायाकल्प – शरीर की कायाकल्प के लिए शिवलिंगी के पंचांग का चूर्ण बना ले और इसमें समान मात्रा में भृंगराज का चूर्ण मिलाकर सुबह के समय शहद के साथ सेवन करने से सम्पूर्ण शरीर का कायाकल्प होता है |

शिवलिंगी का सिद्ध योग 

शिवलिंगी का योग बनाने के लिए इसके ताजा फल 5 नग एवं 7 कालीमिर्च लें | अब इन फलों को कंडे की आग में पकाकर कालीमिर्च के साथ पत्थर पर पिसलें | अब इस पिसे हुई लुगदी से इसकी एक गोली बना ले | यह इसकी एक मात्रा हुई | इसका सेवन प्लीहा या यकृत व्रद्धी में सुबह के समय करना चाहिए | ज्वर की समस्या में इसे तीन – तीन घंटे के अंतराल से गरम जल से सेवन करना चाहिए |

शिवलिंगी योग के गुण – इसके व्यवहार से प्लीहा पूर्वक शीतज्वर (मलेरिया) रोग मिट जाता है | प्लीहा व्रद्धी में भी लाभदायक सिद्ध होता है | बच्चों में उम्र के हिस्साब से इसकी मात्रा को कम कर देना चाहिए |

Noteइस आर्टिकल का मकसद महज ज्ञान वर्धन है | आर्टिकल को लिखने के लिए आयुर्वेदिक ग्रंथो से जानकारी जुटाई गई है एवं  लिखने में भी पूर्ण सावधानी बरती गई है लेकिन फिर भी आयुर्वेदिक योग एवं दवा का सेवन चिकित्सक के परामर्शनुसार करना चाहिए | बैगर वैद्य के परामर्श ली गई दवा दुष्प्रभाव दिखा सकती है |

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