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काकड़ासिंगी

काकड़ासिंगी (कर्कटश्रंगी) – परिचय, गुणधर्म एवं उपयोग

काकडासिंगी (कर्कटश्रंगी) / Pistacia integerrima

इसका वृक्ष 25 से 30 फीट तक ऊँचा होता है | भारत में पंजाब, पश्चिमी हिमालय, टिहरी गढ़वाल और हिमाचल प्रदेश में पाए जाते है | काकड़ासिंगी की छाल भूरे और काले रंग की होती है | वृक्ष के पत्र 3 से 6 इंच लम्बे, नुकीले और भालाकृति के होते है एवं पत्रों की चौड़ाई 1 से 2 इंच होती है | अधिकांश समुद्र तल से 600 से 2500 मीटर की ऊंचाई पर अधिक होते है | इसका वृक्ष लम्बा होता है एवं आरंभ में यह मोटी होती है एवं बाद में धीरे – धीरे पतली होने लगती है |

काकड़ासिंगी

काकड़ासिंगी के पुष्प छोटे – छोटे और दलरहित होते है | फल गोल, धूसर, झुर्रीदार एवं पोले सिंग के सामान होते है |

काकड़ासिंगी का रासायनिक संगठन 

इसमें टेनिन 60%, गोंद 5% एवं इसके अलावा राल, रेवेदार एसिड पाया जाता है | साथ ही इसमें के पीले रंग का उड़नशील तेल मिलता है |

गुणधर्म एवं रोग प्रभाव 

कर्कटश्रंगी का रस कषाय और तिक्त होता है | विपाक में यह कटु एवं उष्ण वीर्य की होती है | गुणों में यह लघु, रुक्ष एवं उष्ण स्वाभाव की होती है | अपने इन्ही गुणों के कारण यह कृमि, कफ और वात को नष्ट करने वाली होती है | रोगप्रभाव में हिक्का, श्वास, छर्दी, अतिसार, गृहणी, बाल रोग, रक्तविकार, क्षय, वमन, प्यास, मूर्छा और अग्निमंध्य जैसे रोगों में प्रभावी औषधि साबित होती है |

प्रयोज्य अंग, मात्रा एवं विशिष्ट योग 

आयुर्वेद में इसके श्रंगाकार कोष का इस्तेमाल किया जाता है | इसका सेवन 500 mg से 2 gm तक करना चाहिए | आयुर्वेद चिकित्सा में इसके प्रयोग से बाल चातुरभद्रिका एवं स्र्न्गयादी चूर्ण का निर्माण किया जाता है |

काकड़ासिंगी के फायदे एवं औषधीय उपयोग 

  • वातरोगों और प्रसूतिज्वर में पिपरामुल , सोंठ तथा काकड़ासिंगी समान भाग में लेकर चूर्ण बना कर सेवन करने से लाभ मिलता है |
  • बच्चो के ज्वर, खांसी तथा वमन में यह बहुत लाभदायक है | काकड़ासिंगी, नागरमोथा, छोटी पीपर तथा अतिस – चारों को सम्भाग लेकर कूट- पीस कर चूर्ण करले | बच्चों की आयु अनुसार इसकी मात्रा शहद के साथ चटायें |
  • बिच्छु तथा सर्प का विष उतारने के लिए काकड़ासिंगी का अन्य औषधियों के साथ प्रयोग किया जाता है |
  • यदि मसूड़ों से खून गिरता हो तो इसके काढ़े से गरारे करने पर लाभ होता है |
  • काकड़ासिंगी और कायफल का चूर्ण लेने से दमा नियंत्रित रहता है |
  • पेट में जलन से होने वाली हिचकी, वमन तथा अतिसार में काकड़ासिंगी का सेवन गुणकारी होती है |

धन्यवाद |

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