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अडूसा (वासा) के पौधे का परिचय – जाने इसके औषधीय गुण एवं फायदे

अडूसा / वासा / Malabar Nut in HIndiआयुर्वेद संहिताओं में प्राचीन समय से ही अडूसा के उपयोग का वर्णन मिलता है | यह भारत के सभी प्रान्तों में पाया जाता है | हिमालय में 4000 से 5000 फीट तक की ऊंचाई में आसानी से देखि जा सकने वाली वनस्पति है |गाँवो में आज भी लोग इसका उपयोग अस्थमा (दमे), खांसी, ...

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गंभारी वनस्पति – जानें इसके फायदे, औषधीय गुण एवं उपयोग के नुस्खे

गंभारी / Gmelina arborea in Hindiआयुर्वेद चिकित्सा के ग्रन्थ चरक संहिता के अनुसार पुरातन समय से सुजन को दूर करने एवं वात का शमन करने के लिए गंभारी का प्रयोग किया जाता रहा है | यह वनस्पति भारत में विशेषत: दक्षिण भारत, कोंकण, सिलोन, पश्चिमी हिमालय, बंगाल, बिहार एवं झारखण्ड आदि में पाई जाती ...

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गोखरू है दिव्य वनौषधि – जाने इसका परिचय, फायदे, गुण एवं आयुर्वेद के अनुसार उपयोग विधि

गोखरू (गोक्षुर) / Gokharu in Hindiगोक्षुर को दिव्य कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि मानव स्वास्थ्य के लिए यह अत्यंत फायदेमंद है | किडनी की समस्या, मूत्र विकार, पौरुष शक्ति, श्वास, खांसी, एलर्जी, अर्श, दर्द, प्रमेह, पत्थरी एवं शुक्र दौर्बल्य जैसे रोगों में दिव्य औषधि की तरह काम करती है |...

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अजमोद वनस्पति परिचय – इसके औषधीय गुण एवं उपयोग

संस्कृत में इसे अजमोदा, वस्तुमोदा एवं प्रकटी आदि नामों से जाना जाता है | यह सम्पूर्ण भारत वर्ष में देखा जा सकता है | इसका उपयोग आयुर्वेद चिकित्सा में औषध स्वरुप एवं आम घरों में मसाले के रूप में भी किया जाता है | इसका पौधा धनिये के समान दीखता है एवं फल अजवायन के समान दिखाई देते है | अजोमोद को ...

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जाने बवासीर (Piles) की अचूक आयुर्वेदिक दवा एवं 100 % इलाज – 10 साल पुराना अर्श भी ठीक हो सकता है !

बवासीर / Pilesबवासीर के बारे में हम पहले भी यहाँ लिख चुकें है | यह रोग गुदा में अंकुर या मस्सों के कारण होते है, इन्हें ही अर्श या बवासीर कहा जाता है | ये मस्से गुदा के अन्दर या बाहर दोनों तरफ होते है | बाहर वाले को बाह्यार्श एवं अन्दर के मस्सों को आभ्यांतरार्श कहा जाता है | आयुर्वेद अनुसार ...

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ऊँटकटारा का वानस्पतिक परिचय – इसके औषधीय गुण एवं फायदे |

ऊंटकटारा / ब्रह्मदंडी / उष्टकंटक  परिचय - यह एक बहुशाखाओं युक्त पौधा होता है, जिसकी शाखाएं जड़ों से फूटती है | भारत में यह मध्यभारत , राजस्थान एवं दक्षिणी प्रान्तों में अधिक पाया जाता है | पौधे पर पीले रंग के ढोडे लगते है जिन पर चारों तरफ लम्बे काँटे होते है एवं काँटों के बिच गुलाबी रंग के फुल लगते ...

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जानें अनन्तमूल का वानस्पतिक परिचय – औषधीय गुण एवं फायदे

अनन्तमूल का वानस्पतिक परिचय - औषधीय गुण एवं फायदे  सर्वत्र भारत वर्ष में पाई जाने वाली एक जंगली लता (बेल) है | विशेषकर बाँदा से अवध, अवध से सिक्कम तक एवं शिलोंग की पहाड़ियों में अधिक देखने को मिलती है |वानस्पतिक परिचय - इसकी लताएँ गहरे लाल रंग की होती है | पते तीन - चार अंगुल लम्बे जामुन के ...

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नजला एवं जुकाम में अपनाएं ये 20 प्रमाणित आयुर्वेदिक उपाय

नजला एवं जुकाम में अपनाएं ये 20 घरेलु प्रमाणिक नुस्खे स्वदेशी उपचार नियमित रूप से अपने पाठकों के बीच आयुर्वेद चिकित्सा एवं परम्परागत घरेलु चिकित्सा पद्धति के प्रमाणिक नुस्खे समय - समय पर प्रस्तुत करते आया है | आज इसी कड़ी में हम सर्दियों के मौसम की सबसे बड़ी एवं आम समस्या "नजला एवं जुकाम" के लिए ...

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बच्चों की खांसी की आयुर्वेदिक दवा – खांसी नाशिनी वटी (घरेलु)

बच्चों की खांसी की आयुर्वेदिक दवा सर्दियों के मौसम में खांसी आदि कफज विकारों का प्रकोप अधिक रहता है | खासतौर पर बच्चे इस मौसम में सबसे अधिक खांसी की समस्या से पीड़ित रहते है | सर्दी लगने, जुकाम, दमे एवं कफज बुखार आदि के कारण अधिकतर बच्चे खांसी की समस्या से ग्रषित रहते है | बच्चों में यह खांसी कई ...

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स्वप्नदोष ठीक करने के प्रमाणित आयुर्वेदिक इलाज एवं दवाएं

स्वप्नदोष / Night Fall in Hindi  आयुर्वेद में स्वप्नदोष को प्रमेह का ही एक भाग माना जाता है, इसे स्वप्न-प्रमेह के नाम से भी पुकारा जाता है | जब नींद में किसी सुंदर स्त्री के मिलाप या छूने मात्र से ही वीर्यस्खलन हो जाए तो यह स्वप्न-दोष कहलाता है |यह रोग अप्राकृतिक रूप से वीर्य को नष्ट करने एवं ...

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जानें कामोद्दीपक तालमखाना के फायदे एवं घरेलु नुस्खें

तालमखाना क्या है  यह एक क्षुप जाति का पौधा है जो जलीय प्रदेशों में प्राप्त होता है | यह जमीन पर फैलती है एवं इसके पते लम्बे होते है, फुल नीले रंग के होते है | इसकी डालियां कांटेदार होती है | इस पौधे के फल गोल और कंटीले होते है | इस पौधे के बीजों को तालमखाना कहा जाता है |आयुर्वेद चिकित्सा में ...

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कुटकी क्या है – जानें इसके औषधीय गुण एवं फायदे

कुटकी / Picrorrhiza Kurrooa  परिचय - इस औषधि को विभिन्न भाषाओँ में अलग - अलग नामों से जाना जाता है | हिंदी में इसे काली कुटकी, कडवी आदि एवं संस्कृत में तिक्ता, कान्ड़ेरुहा, चक्रंगी, कृष्णभेदी, चित्रांगी आदि नामों से जाना जाता है | यह औषधि हिमालय पर 9000 से 15000 फीट तक काश्मीर से लेकर सिक्किम के ...

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