श्रंग भस्म (Shringa Bhasma) के कफज विकारों में उपयोग, सेवन विधि एवं बनाने का तरीका

श्रंग भस्म (Shringa Bhasma): मौसम परिवर्तन के साथ – साथ अनेक श्वास सम्बन्धी व्याधियों का भी जन्म होता है जिनमे कफ जनित व्याधियाँ मुख्य प्रबल होती है जैसे – निमोनिया, खांसी, बुखार, बलगम का इकट्ठा होना, सुखी खांसी, जुकाम आदि | इन सभी व्याधियो में आयुर्वेद की क्लासिकल मेडिसिन श्रंग भस्म काफी फायदेमंद साबित होती है |

आज हम यहाँ आपको श्वास सम्बन्धी रोगों में श्रंग भस्म के उपयोग, सेवन विधि और  श्रंग भस्म बनाने की विधि के बारे में विस्तार से जानकारी देगे | श्रंग भस्म एक शास्त्रोक्त ओषधि है| बाजार में यह डाबर,पतंजली, बैधनाथ ब्रांड नाम से मिल जाती है |तो चलिए जानते है क्या है श्रंग भस्म और इसके फायदे आदि के बारे में

दवा का नामश्रंग भस्म (Shringa Bhasma)
दवा का प्रकार भस्म (Bhasma)
घटक हिरन का सिंग एवं आक
उपयोग श्वास सम्बन्धी व्याधियां
फार्मेसीपतंजलि, डाबर, बैद्यनाथ, धूतपापेश्वर

क्या है श्रंग भस्म | What is Shringa Bhasma

श्रंग भस्म हिरण के सींगो से बनाई जाने वाली भस्म है जो कफ जनित रोगों को मिटाने के साथ –साथ अनेक रोगों की रामबाण दवा है | यह बाजार में श्रंग भस्म के आलावा मृग श्रंग भस्म के नाम से भी मिलती है | आप इसे बाजार से भी खरीद कर उपयोग में ले सकते है | हम यहाँ आपको इसे बनाने की  विधि के बारे में बतायेगे कि कैसे आयुर्वेदिक फार्मासिस्ट एवं वैद्य जन इसका निर्माण करते है |

श्रंग भस्म के घटक द्रव्य एवं बनाने की विधि

  • बारहसिंगा हिरन का सिंग
  • आक

बनाने की विधि: बारहसिंगे के सींगों के शुद्ध सूखे टुकड़ो के वजन से 4 गुने आक के पतों को कूटकर लुगदी बनावे | इसमे से आधी लुगदी कपड़े पर बिछा उपर बारहसिंगे के सींगो के टुकड़े रख, शेष लुगदी को ऊपर रख पोटली बांधकर मजबूत, कपड़मिट्टी करे | पोटली के सींगों के टुकड़े एक दुसरे से न मिल जाये यह ध्यान रखे |

अब कपड़ मिट्टी सूखने के बाद गजपुट (अग्नि देने का प्रमाण) देने से सफेद रंग की मुलायम भस्म हो जाती है | कदाचित् भस्म में से कोई टुकड़ा काला या कच्चा रह जाये तो उसे आक के रस में 3 घंटे खर्ल्क्र टिकिया बना संपुट (अग्नि का प्रमाण) करे दूसरी बार गजपुट देने से उतम भस्म बन जाती है |

इस प्रकार से श्रंग भस्म का निर्माण होता है | यह शास्त्रीय योग है अत: इसका निर्माण भी शास्त्रोक्त विधि से किया जाता है | वैद्य या फार्मासिस्ट द्वारा ही इसका निर्माण किया जाना चाहिए |

श्रंग भस्म की सेवन विधि, मात्रा और अनुपान (Shringa Bhasma Anupana and Doses)

कोई भी दवा को सेवन करने की सही जानकारी मालूम होने पर दवा का रोग पर असर भी जल्दी होता है तो चलिए जानते है श्रंग भस्म सेवन की विधि और लेने की मात्रा और साथ में अनुपान |

मात्रा

  • 1 से 3 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम दोनों समय ले |

अनुपान:

  • कफ को बाहर निकालने के लिए मिश्री के साथ ले |
  • पतले कफ को सुखाने के लिए शहद या नागरबेल के पान के साथ सेवन करे |
  • क्षय (टीबी) में प्रवाल पिष्टी और गिलोय के रस के साथ सेवन करे |

श्रंग भस्म के चिकित्स्य उपयोग और फायदे | Clinical Uses and Benefits of Shringa Bhasma

निमोनिया –निमोनिया में छाती में कफ का संचय अधिक होता है कई बार निमोनिया ठीक होने के बाद भी कफ का जमाव रहता है यह कफ का जमाव कई दिनों तक रहने के कारण शरीर को बहुत हानि होती है |कफ दुर्गन्ध युक्त चिपचिपा, पीले रंग का निकलता है ऐसे कफ को जल्द से जल्द निकाल देना चाहिए और नये कफ की उत्पति रोकने के लिए श्रंग भस्म का प्रयोग मिश्री के साथ दिन में तीन बार करना चाहिए | श्रंग भस्म के प्रयोग से नये कफ के उत्पति नहीं होगी और शरीर बलवान बनेगा |

ह्रदय दुर्बलता में –श्रंग भस्म ह्रदय पोष्टिक है | ह्रदय में दर्द होने पर ह्रदय में विशेष विकृति न हो, केवल स्नायु निर्बल हुए हो तो ऐसी स्थिति में श्रंग भस्म को घी के साथ अवश्य देनी चाहिए |कई बार अधिक उपवास करने के कारण, अधिक मार्ग चलने के कारण या अधिक मानसिक कार्य करने के कारण ह्रदय में कमजोरी महसूस होती है ऐसे में श्रंग भस्म बहुत गुणकारी होती है |

कास (खांसी )-श्रंग भस्म कफ जनित खांसी में उतम प्रभावशाली है परन्तु वात जनित शुष्क कास में श्रंग भस्म का उपयोग नहीं करना चाहिए |कफ जनित कास में यह कफ को जल्द ही अपने स्थान से उखाड़ कर मल के द्वारा बाहर कर देती है |

ज्वर –कई बार छाती में कफ का संचय अधिक होने और अधिक दिनों तक रहने के कारण या कफ निकलने के बाद भी कोई एकाध भाग कफ का रहने के कारण ज्वर आने लगती है ऐसी स्थिती में भी श्रंग भस्म का प्रयोग बहुत लाभदायक होता है यह कफ को निकालने के साथ –साथ ज्वर के प्रभाव को भी कम कर देती है और रोगी की क्षीण हुई शक्ति को वापिस प्रबल कर देती है |

राजयक्ष्मा(टीबी ) –श्रंग भस्म का उपयोग करके निर्जन्तुक क्षय और जन्तु जन्य क्षय दोनों पर अनेक समय अनुभव किया है इसके योग से क्षय रोग के ज्वर और कास दोनों जल्दी दूर होते है | इतना ही नहीं क्षय के कीटाणुओं की वृद्धि को भी रोकने में श्रंग भस्म बहुत उपयोगी है यदि क्षय रोग की प्रथम अवस्था में रोगी को श्रंग भस्म का सेवन कराया जाये तो रोगी बहुत जल्दी ठीक हो जाता है |

श्वसन सम्बन्धी विकारों में –कास रोग के साथ साथ कितनो को ही श्वास रोग होता है | रोग होने पर बार –बार खांसी आती है |अधिक देर तक खांसने से रोगी श्वास का भर जाता है और रोगी को कई बार तो बेठे –बेठे रात काटनी पडती है |शीतकाल में यह अधिक होता है ऐसी दशा में रोगी को तुरंत श्रंग भस्म का प्रयोग शहद के साथ दिन में 2 -3 बार करना चाहिए |

बालशोष में –बालको की बालशोष व्याधि जिसमे बालक बहुत कमजोर हो जाता है, हाथ –पैर शुष्क और पेट घड़े के समान हो जाता है इस व्याधि में श्रंग भस्म को प्रवाल पिष्टी के साथ मिलाकर देने से बहुत अच्छा नतीजा मिलता है |

सिरदर्द –जुकाम के कारण होने वाले सिरदर्द में भी श्रंग भस्म को घी के साथ सेवन करना चाहिए जिससे तुरंत लाभ मिलता है |

वेसे तो श्रंग भस्म का प्रयोग विशेषकर कफ जनित व्याधियो में किया जाता है परन्तु इसमे अनेक गुण होने के कारण इसे दाह, अम्लपित रोगों को रोकने के साथ –साथ नीद लाने के लिए भी शहद और घी के साथ प्रयोग किया जाता है |

धन्यवाद |

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