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बवासीर / Piles

बवासीर के बारे में हम पहले भी यहाँ लिख चुकें है | यह रोग गुदा में अंकुर या मस्सों के कारण होते है, इन्हें ही अर्श या बवासीर कहा जाता है | ये मस्से गुदा के अन्दर या बाहर दोनों तरफ होते है | बाहर वाले को बाह्यार्श एवं अन्दर के मस्सों को आभ्यांतरार्श कहा जाता है | आयुर्वेद अनुसार गुदा में तीन आवर्त (आंटे) होते है – १. संवरनी, २. विसर्जनी ३.प्रवाहिणी | इन्हीं तीनो अवर्तों में मस्से होते है | इसे दुर्नाम एवं दुशचिकित्सीय माना जाता है क्योंकि बवासीर कब्ज और यकृत की गड़बड़ी के कारण कभी – कभी अधिक फुल कर फट जाती है जिससे इनमे रक्त निकलता है एवं पीड़ा होती है |

यह रोग आज के समय में सामान्य सा हो गया है | खान-पान एवं रहन सहन के कारण इस रोग से पीड़ित होने वालों की संख्या बढ़ रही है | यह अत्यंत पीड़ादायी रोग है | लम्बे समय तक बवासीर की समस्या मृत्युदाई मानी जाती है | आयुर्वेद चिकित्सा में इसके 6 प्रकार माने जाते है , खुनी एवं बादी बवासीर भी इसी के प्रचलित प्रकार है | आज हम यहाँ इसके कारण, लक्षण एवं इसकी दवा बताएँगे जो आपकी 10 साल पुरानी बवासीर / piles को भी ठीक कर सकती है |

  • वातज बवासीर
  • पित्तज
  • कफज बवासीर
  • संनिपातज
  • रक्तज बवासीर
  • सहज

जानें बवासीर (अर्श) के संभावित कारण

यहाँ हमने इसके प्रकारों के अनुसार कारणों का वर्णन किया है | अर्श या पाइल्स के 6 प्रकार माने जाते है, इन्ही प्रकारों के अनुसार हमने इनके संभावित कारणों का वर्णन किया ताकि आपको समझने में आसानी हो |

1 . वातज बवासीर – कब्ज, अजीर्ण, कड़वा – कषैला भोजन या रुखा ठंडा भोजन, अत्यधिक रति क्रीडा, उपवास रखना एवं ठन्डे में लापरवाही या गरम – ठन्डे में जाना, धुप – हवा, कसरत आदि का अधिक सेवन वातज बवासीर उत्पन्न करने के संभावित कारण मने जाते है | सर्दियों में इस प्रकार का बवासीर अधिक दर्ददायक हो जाता है |

2. पित्तज बवासीर – खट्टा, नमकीन एवं तेलिय खाद्य पदार्थो का अधिक सेवन, कसरत अधिक करना, धुप एवं आग के सामने अधिक रहना, गरम प्रदेश जैसे पश्चिमी राजस्थान आदि का वासी होना, क्रोध करना , गरम पदार्थो का अधिक सेवन करना आदि इसके कारण माने जाते है | गर्मियों में पित्तज पाइल्स अधिक पीड़ादाई होता है |

3. कफज बवासीर – मिट्ठे, चिकने, ठन्डे, खट्टे एवं गुरु – स्निग्ध पदार्थो का अधिक सेवन करना | आलसी स्वाभाव, दिन में सोना, शीतल प्रदेशों या पूर्व प्रदेशों में रहने वालों को कफज प्रकार का बवासीर होने की सम्भावना होती है |

4. सन्नीपातज – इस प्रकार के बवासीर में तीनों दोष प्रधान होते है या तीनो प्रकार के आचरण गलत हो अर्थात वात-पित-कफ इन तीनों दोषों की प्रधानता हो | इस प्रकार के बवासीर को सन्निपातज माना जाता है |

5. सहज बवासीर – यह अनुवांशिक अर्श माना जाता है अर्थात जो माता – पिता से संतान में आता है | यह संतान के जन्म के समय माता – पिता के गलत आचरण के कारण यह संतान को होता है |

6. रक्तज – इसमें बवासीर के फटने से खून गिरना सबसे अधिक पाया जाता है | कब्ज एवं यकृत की गड़बड़ी के कारण इस प्रकार का बवासीर बनता है |

बवासीर के लक्षण क्या – क्या है

वातज अर्श के मस्से सूखे होते है , पितज के मुंह नीले, लाल या पीले होते है | कफज प्रकार के मस्से कठोर एवं गहरी जड़ वाले होते है | सहज मस्से का मुंह अन्दर की तरफ होते है | सन्निपात्ज के मस्से तीनो ही प्रकार के माने जाते है |

  • वातज अर्श में मस्सा शुष्क एवं चुनचुनाहट युक्त होता है |
  • ये खुरदरे, हल्के रक्त वर्णी एवं कड़े होते है |
  • इनमे उष्ण एवं स्निग्ध भोजन का सेवन लाभदायी होता है |
  • रोगी में कब्ज बनी रहती है |
  • रोगी की त्वचा, आँखे, नाख़ून एवं मल – मूत्र काले पड़ जाते है |
  • पितज प्रकार के लक्षण में मासान्कुर का मुख नीले रंग का वर्ण लाल पीला तथा काला होता है |
  • इसमें पतला दुर्गन्ध युक्त रक्तस्राव |
  • गुदा पाक एवं दाह होता रहता है |
  • रोगी को तृष्णा (प्यास), मूर्च्छा एवं बैचेनी होती रहती है |
  • रोगी का मल पतला, नीला पीला व् आम्युक्त होता है |
  • कफज प्रकार का अर्श अधिक गहरा होता है |
  • यह हल्की पीड़ा युक्त सघन, श्वेत, स्निग्ध, स्तब्ध, गोल, गुरु, स्थिर, पिच्छल और खुजली युक्त होते है |
  • बांस के अंकुर व मुन्नका के समान अर्श होता है |
  • रोगी में मुख वरैश्य, अरुचि, पीनस, प्रमेह आदि का खतरा रहता है |
  • रोगी में वमन, मूत्रकृच्छ, मष्तिष्क जाड्य और नपुंसकता आदि का समस्या देखि जा सकती है |

जानें बवासीर की गारन्टीड दवा

स्वदेशी उपचार जल्द ही बवासीर की दवा लेकर आपके समक्ष उपस्थित होगा | हमने अर्श के लिए दवा का निर्माण किया है जो 20 साल पुरानी बवासीर भी पूर्णत: गारंटी के साथ ठीक कर देगी | इस दवा की सिर्फ 20 ही खुराक आपको लेनी होगी, अर्थात केवल 20 दिनों तक ही आपको सुबह खाली पेट दवा का सेवन करना है |

इसे हम “स्वदेशी अर्शान्तक चूर्ण” नाम से निकालेंगे | जिसकी सुचना आपको यहीं पर मिलेगी या आप हमारी ऑनलाइन शॉप के माध्यम से भी सुचना प्राप्त कर सकते है | अभी हम दवा का निर्माण कर रहें है |

बवासीर के अचूक इलाज एवं स्वदेशी चिकित्सा

वातज बवासीर के लिए – आक के पीले पते और पांचो नमक (काला नमक, सैन्धव नमक, विड लवण, समुद्र नमक, रेह नमक) – इनको तेल और खटाई में पीसकर, मिटटी के कुल्हड में भर कर ऊपर से सराई रख कर कपड-मिटटी कर दें और गजपुट में रखदें | स्वांग शीतल होने पर निकाल लें | इस प्रकार से क्षार को मध्ये या अथवा गर्म जल के साथ सेवन करने से वातज – बवासीर में आराम आ जाता है | इसे बादी बवासीर में उत्तम दवा मानी जाती है |

पित्तज बवासीर का घरेलु इलाज – काले तिलों का चूर्ण, नागकेसर और मिश्री- सबको पीसकर, मक्खन में मिला कर खाने से पित्तज अर्श में आराम मिलता है | सुगंधबाला और सोंठ को बराबर- बराबर ले कर कूट-पीसकर छान लें | इसकी 2 माशे की एक मात्रा चावलों के जल में पीसकर और शहद मिला कर पीने से पितज प्रकार का अर्श नष्ट हो जाता है | पितज अर्श में जुलाब देकर (विरेचन) दवा का सेवन करना चाहिए |

कफज के लिए – अदरख का काढ़ा नित्य पीने से कफज बासिर नष्ट हो जाती है | अदरख के आभाव में सोंठ भी प्रयोग कर सकते है | दुसरे नुस्खे में चित्रक , हाउबर, हिंग और नमक – इन चारों को कूट – पीसकर कर मट्ठे में मिलाकर पीने से पाइल्स में आराम मिलता है | पंचकोल का क्वाथ तैयार करके सेवन करना फायदेमंद रहता है |

अर्श या बवासीर की अन्य चिकित्सा या औषधियां

  1. कड़वे नीम एक पके हुए फोन का गुदा निकाल लें |इसे 3 माशे की मात्रा में लेकर, इसमें 6 माशे गुड मिलाकर सात दिन तक खाने से पाइल्स में आराम मिलता है |
  2. करंज, चीते की छाल, सेंधा नमक, इन्द्र्जौ और अरलु की छाल – इन सबको बराबर लेकर चूर्ण बना लें | उस चूर्ण को छाछ के साथ लेने से खुनी, बादी और सहज पाइल्स में आराम मिलता है |
  3. प्याज के महीन – महीन टुकड़े कर के धुप में सुखा लें | सूखे टुकड़ो में से 1 तोला प्याज ले कर घी में तलें | फिर उसमे 1 माशे तिल और 2 तोले मिश्री मिलाकर रोज सबेरे खाएं | इससे लाभ मिलता है |
  4. प्याज के रस में घी और चीनी मिला कर खाने से भी आराम मिलता है |
  5. नागकेसर, मिश्री और मक्खन – इन तीनों को मिलाकर खाना भी फायदेमंद रहता है |
  6. खिरेंटी और पिठवन के द्वारा पेया बना कर पीने से खुनी अर्श नष्ट होता है |
  7. खुनी पाइल्स सबसे अधिक पीड़ादाई होता है | इसमें लाजवंती, कमल, मोचरस, लोध्र और चन्दन – इनको बकरी के दूध में ओउटा कर पीने से काफी आराम मिलता है |
  8. बवासीर में खून आता हो तो इमली जला कर उसमे थोड़ी सी शक्कर मिलाकर खाने से खून आना बंद हो जाता है |
  9. महानीम के बीज 11 और शक्कर 6 माशे मिलाकर, जल के साथ रोज खाएं | इस दवा से खुनी अर्श जल्द ही नष्ट हो जाती है |
  10. चिरचिटे के बीज चावलों के धोवन में पीसकर पीने से अर्श नष्ट हो जाती है |

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