चित्रकादि वटी

आयुर्वेद में वटी औषधियों का बहुत बड़ा महत्व है | इस प्रकार की औषधियां रोगी को लेने में आसान होती है एवं रोग पर असर भी जल्दी दिखाती है | इसीलिए प्राचीन समय से ही आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र में वटी का प्रयोग होता आया है | चित्रकादि वटी भी वटी कल्पना के तहत तैयार होने वाली आयुर्वेदिक दवा है | इसका उपयोग विभिन्न रोगों के उपचारार्थ आयुर्वेदिक चिकित्सक करते है |

चित्रकादि वटी में मुख्यातया 9 द्रव्य होते है | चित्रक की मूल ( जड़ ) , पिपरा मूल, जवाखार, सज्जिखर, नमक, त्रिकटु चूर्ण, भुनी हुई हिंग, अजमोदा और चक | मुख्या द्रव्य चित्रक के नाम पर ही इसे चित्रकादि वटी कहते है | चित्रक को चिता या चितावर भी कहते है | यह सम्पूर्ण भारत में पाई जाती है | इसके फुल लाल – नीले और सफ़ेद रंग के हो सकते है | चित्रक की जड़ ही मुख्यरूप से काम में ली जाती है | चित्रक की जड़ के चूर्ण का प्रयोग अगर नकसीर हो तो 1 ग्राम की मात्रा में करना चाहिए | इससे नकसीर की समस्या में रहत मिलती है | चित्रकादि वटी को 1 ग्राम से अधिक की मात्रा में नहीं लेना चाहिए |
चित्रकादी वटी के लाभ
नीला चित्रक

चित्रकादि वटी बनाने की विधि

सबसे पहले चित्रक मूल , पिपरामुल , जवाखार , सज्जिक्षार , नमक , त्रिकटु चूर्ण , भुनी हुई हिंग , अजमोदा और चक इन सब को 20 -20 ग्राम की मात्रा में लेकर इनका बारीक़ चूर्ण बना लेवे | अब अनार के रस को इतनी मात्रा में लेवे की यह 90 ग्राम चूर्ण इसमे अच्छी तरह रम जावे | अब अनार के रस में इन सभी के चूर्ण को अच्छी तरह घोट ले और इनकी मटर के दाने के बराबर गोलिया बना ले | चित्रकादि वटी तैयार है |
मात्रा और सेवन विधि :- 2 से 4 गोली प्रतिदिन सुबह – शाम कुछ खाने के बाद पानी के साथ सेवन करे | बच्चो को 1 गोली काफी है | किसी भी आयुर्वेदिक दवा का सेवन चिकित्सक के परामर्शानुसार करना चाहिए |
फायदे :- यह गोली गैस की समस्या , पेट में आने वाली आंव और पेट को साफ करने का काम करती है |
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